जरूरत है प्रभावी कानून की

देर आयद दुरूस्त आयद

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26/11 को मुंबई में हुए आतंकी धमाकों ने पूरे विश्व को दहला दिया और यह सोचने पर विवश कर दिया कि क्या आज हम लाचार हैं या हमारे का लाचार है, जिसके कारण कुछ अंतराल को छोड़कर देश के विभिन्न हिस्सों में आतंकी अपने नापाक मकसद को अंजाम देने में सफल हो रहे हैं?

इस बार नववर्ष हमारे लिए खुशियाँ लाने के बजाय टीस व दर्द व आँसू लेकर आया, जिनमें छुपी थी, स्मृतियाँ उन रोते-बिलखते लोगों के विलाप की, जिन्होंने अपने परिजनों को इन धमाकों में खोया था।

इस वर्ष हम अपना 60 वाँ 'गणतंत्र दिवस' मना रहे हैं, जिसका अर्थ है आज हमारे संविधान को लागू हुए पूरे 60 बरस बीत चुके हैं लेकिन फिर भी हमें महसूस होता है कि देश का कानून देश की सुरक्षा के लिए पर्याप्त व प्रभावी सिद्ध नहीं हो रहा है। तभी तो कभी पोटा, कभी मकोका और कभी टाडा के रूप में नए कानून बनाए जाते हैं परंतु कुछ समय बाद ये भी अप्रभावी सिद्ध होते हैं। क्या आज देश को एक ऐसे कानून की आवश्यकता है, जो आतंकी घटनाओं पर पूरी तरह से अंकुश लगा सके? इस विषय पर हमने कुछ प्रमुख लोगों से चर्चा की।

(भाजपा प्रवक्ता) :-
'देश की कानून व्यवस्था अलग विषय है और देश की आतंरिक सुरक्षा अलग। आज देश का कानून देश की सुरक्षा के लिए पर्याप्त नहीं है। आईपीसी, सीआरपीसी देश में हमले करने वाले आतंकियों को पकड़ने में मददगार नहीं हो सकते हैं। इसी आवश्यकता को ध्यान में रखकर एनडीए सरकार के कार्यकाल में पोटा कानून को लागू करने पर जोर दिया गया था परंतु सरकार ने उस वक्त इसे नकार दिया था लेकिन जब बाद में सरकार को अपने कार्यकाल के अंतिम समय में महसूस हुआ कि आज देश को पोटा की आवश्यकता है तब सरकार ने इसे लागू किया। मैं तो इसे यही कहूँगी कि देर आयद दुरूस्त आयद।

मैं मानती हूँ कि किसी राज्य विशेष का विषय नहीं है अत: कोई राज्य उसे नियंत्रित करना चाहे, यह संभव नहीं है। आज देश में पोटा और टाडा से भी प्रभावी कानून की आवश्यक्ता है। यदि हम दूसरे देशों की बात करें तो अमेरिका में आतंकियों से निपटने के लिए अलग से प्रभावी कानून बना है, जो सराहनीय है।

पुलिस के समक्ष यदि कोई अपराधी अपना जुर्म कबूलता है तो उसके बयान को मान्य करना चाहिए परंतु पोटा या टाडा या निया कानून में यह व्यवस्था नहीं है शायद इसीलिए मुबंई हमलों के मुख्य आतंकी कसाब को पोटा या टाडा की बजाय 'मकोका' कानून के अंतर्गत गिरफ्तार करना पड़ा। मुझे लगता है कि सरकार ने आतंक को रोकने के लिए निया कानून बनाया, वो एक अच्छा प्रयास है परंतु यह भी सच है कि आज हमें इससे भी बेहतर, प्रभावी व पुख्ता कानून की आवश्यक्ता है।'

(सासंद) :-
'हम तो हमेशा से कहते आए हैं कि कानून में समय-समय पर संशोधन होना चाहिए। हमारी सरकार ने तो आतंकवाद के खिलाफ प्रभावी कानून के रूप में 'पोटा' को लागू करने पर जोर भी दिया था। मैं मानती हूँ कि कानून बनना जितना ज्यादा जरूरी है। उससे भी अधिक उसका पाल न किया जाना जरूरी है, तभी कानून प्रभावी कहलाएगा।'

गायत्री शर्मा|
निष्कर्ष के रूप में यदि कहा जाए भले ही हम अपनी सुरक्षा व्यवस्था को पुख्ता बनाने के लाख प्रमाण दे परंतु आज भी हम असुरक्षित है। हमारे कभी सेना के जवानों की कमी महसूस होती है तो कभी अश्त्र-शस्त्रों की। कभी सब कुछ होता है तो हम समय पर उसका इस्तेमाल नहीं कर पाते हैं। अब वक्त आ गया है जब हम सब को एकजुट होकर देश की सुरक्षा के विषय पर गंभीरता से विचार करना होगा और इस देश को आतंकमुक्त बनाने की दिशा में कदम उठाना होगा।



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