प्रयागराज कुंभ मेला, कौन है हिन्दुओं के असली शंकराचार्य?

आदि ने कुल और चार शंकराचार्यों की नियुक्ति की थी, लेकिन वर्तमान में दो दर्जन से अधिक शंकराचार्य हो चले हैं। पिछले बार के प्रयागराज के कुंभ में इस संबंध बहुत विवाद हुआ था। इस बार भी यह मुद्दा चर्चा में है। असली और नकली शांकराचार्यों के बीच की लड़ाई वर्षों पुरानी है। ऐसे में सवाल उठता है कि जनता किसे असली और किसे नकली मानें?

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आदि शंकराचार्य ने दशनामी साधु संघ की स्थापना की थी। इस वर्तमान में दशनामी संप्रदाय कहते हैं। यह दश संप्रदाय भारत की सभी सवर्ण, दलित, वनवासी और आदिवासी जातियों को मिलाकर बनाया था, जो आज भी अस्तित्व में है। दशनामी संप्रदाय के नाम इस प्रकार हैं:- गिरी, पर्वत, सागर, पुरी, भारती, सरस्वती, वन, अरण्य, तीर्थ और आश्रम।


उक्त दस संप्रदाय के साधुओं को दस क्षेत्र में बांटा गया। जिन संन्यासियों को पहाड़ियों एवं पर्वतीय क्षेत्रों में प्रस्थान किया, वे गिरी एवं पर्वत और जिन्हें जंगली इलाकों में भेजा, उन्हें वन एवं अरण्य नाम दिया गया। जो संन्यासी सरस्वती नदी के किनारे धर्म प्रचार कर रहे थे, वे सरस्वती और जो जगन्नाथपुरी के क्षेत्र में प्रचार कर रहे थे, वे पुरी कहलाए। जो समुद्री तटों पर गए, वे सागर और जो तीर्थस्थल पर प्रचार कर रहे थे, वे तीर्थ कहलाए। जिन्हें मठ व आश्रम सौंपे गए, वे आश्रम और जो धार्मिक नगरी भारती में प्रचार कर रहे थे, वे भारती कहलाए।


दस क्षेत्र के चार मठ :
उक्त क्षेत्र के सभी साधुओं को मिलाकर संघ बना। दस संघ को चार क्षेत्रों में बांटकर सभी क्षेत्रों में चार मठ स्थापित किए गए। इन चार मठों की विस्तृत जानकारी।


1. वेदान्त ज्ञानमठ:
श्रृंगेरी ज्ञानमठ भारत के दक्षिण में रामेश्वरम् में स्थित है।

2. गोवर्धन मठ :
गोवर्धन मठ भारत के पूर्वी भाग में उड़ीसा राज्य के पुरी नगर में स्थित है।

3.शारदा मठ
शारदा (कालिका) मठ गुजरात में द्वारकाधाम में स्थित है।


4. ज्योतिर्मठ :
उत्तरांचल के बद्रिकाश्रम में स्थित है ज्योतिर्मठ।


उक्त मठों के मठाधिशों को ही शंकराचार्य कहा जाता है। लेकिन उक्त चार मठों के अलावा तमिलनाडु में स्थित कांची मठ को भी शंकराचार्य द्वारा स्थापित किया हुआ माना जाता है किंतु यह विवादित माना गया है। इसके अलावा भी कई मठ हो चले हैं। मूलत: कांचीपुरम सही उक्त चार मठों को ही धार्मिक मान्यता प्राप्त है।


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शैवपंथ के आचार्यों को शंकराचार्य, मंडलेश्वर, महामंडलेश्वर आदि की पदवी से सम्मानित किया जाता है। उसी तरह वैष्णव पंथ के आचार्यों को रामानुजाचार्य, रामानंदाचार्य, महंत आदि की पदवी से सम्मानित किया जाता है। नागा दोनों ही संप्रदाय में होते हैं। मूलत: चार संप्रदायों (शैव, वैष्णव, उदासीन, शाक्त) के कुल तेरह अखाड़े हैं। इन्हीं के अंतर्गत साधु-संतों को शिक्षा और दीक्षा दी जाती है

प्रधान शंकराचार्य नियुक्त हो : कुछ विद्वानों का कहना है कि सभी शंकराचार्यों के ऊपर एक प्रधान शंकराचार्य नियुक्त कर दिया जानाचाहिए ताकि हिंदुओं को पता चले कि हमें किसके निर्णय का पालन करना चाहिए और किसको अपना धर्मगुरु मानना चाहिए। स्व:घोषित संन्यासी या बाबाओं का हिंदू धर्म से कोई संबंध नहीं है- जैसे संत आसाराम, निर्मल बाबा आदि सैकड़ों संत हैं जो हिन्दु धर्म के स्व:घोषित संत हैं

चतुष्पद की मांग : हालांकि शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद ने कुंभ क्षेत्र में चतुष्पद बनाए जाने की मांग कर रखी है। उनका मानना है कि इसमें चार शंकराचार्यो को बसाया जाए जिससे लोगों को यह जानकारी हो सके कि कौन शंकराचार्य असली हैं। उनकी इस मांग पर बखेड़ा हो चुका है

शास्त्रार्थ की व्यवस्था : पिछले कुंभ में सुमेरुपीठ के स्वामी नरेंद्रानंद दल-बल के साथ संगम तट पर शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद से शास्त्रार्थ करने पहुंच गए। हालांकि शंकराचार्य स्वरूपानंद ने पहले ही इस शास्त्रार्थ में नहीं आने की घोषणा कर दी थी। इसी बीच सुमेरुपीठ के स्वामी नरेंद्रानंद ने भी प्रयाग में को शास्त्रार्थ करने चुनौती दी थी।


सनातन धर्म संरक्षण समिति : सनातन धर्म संरक्षण समिति ने यहां शास्त्रार्थ की व्यवस्था कर रखी थी। सनातन धर्म संरक्षण समिति ने सभी शंकराचार्यो को यहां आमंत्रित किया था। इसे लेकर पिछले दिनों उन्होंने काशी में विद्वत परिषद के सामने असली और नकली शंकराचार्य के मसले पर शास्त्रार्थ की बात कही थी। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या शास्त्रार्थ में अनाधिकृत शंकराचार्य जीत जाते हैं तो क्या वे अधिकृत शंकराचार्य नियुक्त होंगे?


ये हैं अधिकृत शंकराचार्य : मेला प्रशासन अनुसार पूर्व वर्षो के उपलब्ध अभिलेखों एवं परंपराओं के अनुरूप कुंभ मेला 2019 से चारों पीठाधीश्वरों को शंकराचार्य के रूप में मान्यता देते हुए कुंभ मेला में भूमि एवं अन्य सुविधाएं प्रदान करता है। कुंभ मेला प्रशासन अनुसार आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार पीठों के अलावा कांचीपुरम पीठ के शंकराचार्यो को ही मान्यता है। अन्य जो भी शंकराचार्य की पदवी धारण किए हुए हैं, वह स्व:घोषित हैं।



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