गंगा स्तुति, गंगा चालीसा, गंगा आरती और गंगा नदी के पौराणिक तथ्य

Ganga Saptami

यहां पढ़ें मां गंगा की स्तुति, पावन चालीसा, गंगा मैया की आरती और पौराणिक
तथ्य...

श्री गंगा स्तुति : देवी सुरेश्वरी भगवती गंगे
देवि! सुरेश्वरि! भगवति! गंगे!
त्रिभुवनतारिणि तरलतरंगे।
शंकरमौलिविहारिणि विमले
मम मतिरास्तां तव पदकमले ॥1 ॥

हे देवी! सुरेश्वरी! भगवती गंगे! आप तीनों लोकों को तारने वाली हैं। शुद्ध तरंगों से युक्त, महादेव शंकर के मस्तक पर विहार करने वाली हे मां! मेरा मन सदैव आपके चरण कमलों में केंद्रित है।
भागीरथीसुखदायिनि मातस्तव
जलमहिमा निगमे ख्यातः ।
नाहं जाने तव महिमानं
पाहि कृपामयि मामज्ञानम् ॥ 2 ॥

हे मां भागीरथी! आप सुख प्रदान करने वाली हो। आपके दिव्य जल की महिमा वेदों ने भी गाई है। मैं आपकी महिमा से अनभिज्ञ हूं। हे कृपामयी माता! आप मेरी रक्षा करें।

हरिपदपाद्यतरंगिणी गंगे
हिमविधुमुक्ताधवलतरंगे।
दूरीकुरुमम दुष्कृतिभारं
कुरु कृपया भवसागरपारम् ॥ 3 ॥

हे देवी! आपका जल श्री हरि के चरणामृत के समान है। आपकी तरंगें बर्फ, चंद्रमा और मोतियों के समान धवल हैं। कृपया मेरे सभी पापों को नष्ट कीजिए और इस संसार सागर के पार होने में मेरी सहायता कीजिए।

तव जलममलं येन निपीतं
परमपदं खलु तेन गृहीतम्।
मातर्गंग त्वयि यो भक्तः किल
तं द्रष्टुं न यमः शक्तः ॥ 4 ॥
हे माता! आपका दिव्य जल जो भी ग्रहण करता है, वह परम पद पाता है। हे मां गंगे! यमराज भी आपके भक्तों का कुछ नहीं बिगाड़ सकते।

पतितोद्धारिणि जाह्नवि गंगे
खंडित गिरिवरमंडित भंगे।
भीष्मजननि हे मुनिवरकन्ये !
पतितनिवारिणि त्रिभुवन धन्ये ॥ 5 ॥

हे जाह्नवी गंगे! गिरिवर हिमालय को खंडित कर निकलता हुआ आपका जल आपके सौंदर्य को और भी बढ़ा देता है। आप भीष्म की माता और ऋषि जह्नु की पुत्री हो। आप पतितों का उद्धार करने वाली हो। तीनों लोकों में आप धन्य हो।

कल्पलतामिव फलदां लोके
प्रणमति यस्त्वां न पतति शोके।
पारावारविहारिणिगंगे
विमुखयुवति कृततरलापंगे॥ 6 ॥

हे मां! आप अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करने वाली हो। आपको प्रणाम करने वालों को शोक नहीं करना पड़ता। हे गंगे! आप सागर से मिलने के लिए उसी प्रकार उतावली हो, जिस प्रकार एक युवती अपने प्रियतम से मिलने के लिए होती है।

तव चेन्मातः स्रोतः स्नातः
पुनरपि जठरे सोपि न जातः।
नरकनिवारिणि जाह्नवि गंगे
कलुषविनाशिनि महिमोत्तुंगे। ॥ 7 ॥

हे मां! आपके जल में स्नान करने वाले का पुनर्जन्म नहीं होता। हे जाह्नवी! आपकी महिमा अपार है। आप अपने भक्तों के समस्त कलुषों को विनष्ट कर देती हो और उनकी नरक से रक्षा करती हो।

पुनरसदंगे पुण्यतरंगे
जय जय जाह्नवि करुणापांगे ।
इंद्रमुकुटमणिराजितचरणे
सुखदे शुभदे भक्तशरण्ये ॥ 8 ॥

हे जाह्नवी! आप करुणा से परिपूर्ण हो। आप अपने दिव्य जल से अपने भक्तों को विशुद्ध कर देती हो। आपके चरण देवराज इंद्र के मुकुट के मणियों से सुशोभित हैं। शरण में आने वाले को आप सुख और शुभता प्रदान करती हो।

रोंगं शोकं तापं पापं हर मे
भगवति कुमतिकलापम्।
त्रिभुवनसारे वसुधाहारे
त्वमसि गतिर्मम खलु संसारे ॥ 9 ॥

हे भगवती! मेरे समस्त रोग, शोक, ताप, पाप और कुमति को हर लो आप त्रिभुवन का सार हो और वसुधा का हार हो,हे देवी! इस समस्त संसार में मुझे केवल आपका ही आश्रय है।

अलकानंदे परमानंदे कुरु
करुणामयि कातरवंद्ये ।
तव तटनिकटे यस्य निवासः
खलु वैकुंठे तस्य निवासः ॥ 10 ॥

हे गंगे! प्रसन्नता चाहने वाले आपकी वंदना करते हैं। हे अलकापुरी के लिए आनंद-स्रोत हे परमानंद स्वरूपिणी! आपके तट पर निवास करने वाले वैकुंठ में निवास करने वालों की तरह ही सम्मानित हैं।

वरमिह नीरे कमठो मीनः
किं वा तीरे शरटः क्षीणः ।
अथवाश्वपचो मलिनो दीनस्तव
न हि दूरे नृपतिकुलीनः ॥ 11 ॥

हे देवी! आपसे दूर होकर एक सम्राट बनकर जीने से अच्छा है आपके जल में मछली या कछुआ बनकर रहना अथवा आपके तीर पर निर्धन चंडाल बनकर रहना।

भो भुवनेश्वरि पुण्ये धन्ये
देवि द्रवमयि मुनिवरकन्ये ।
गंगा स्तवमिमममलं नित्यं पठति
नरे यः स जयति सत्यम् ॥ 12 ॥

हे ब्रह्मांड की स्वामिनी! आप हमें विशुद्ध करें। जो भी यह प्रतिदिन गाता है, वह निश्चित ही सफल होता है।

येषां हृदये गंभक्तिस्तेषां
भवति सदा सुखमुक्तिः ।
मधुराकंता पञ्झटिकाभिः
परमानन्दकलितललिताभिः ॥ 13 ॥

जिनके हृदय में गंगा जी की भक्ति है। उन्हें सुख और मुक्ति निश्चित ही प्राप्त होते हैं। यह मधुर लययुक्त गंगा
स्तुति आनंद का स्रोत है।

गंगा स्तोत्रमिदं भवसारं
वांछितफलदं विमलं सारम् ।
शंकरसेवक शंकर रचितं पठति
सुखीः तव इति च समाप्तः ॥ 14 ॥

भगवत चरण आदि जगद्गुरु द्वारा रचित यह स्तोत्र हमें शुद्ध-विशुद्ध और पवित्र कर वांछित फल प्रदान करे।

श्री गंगा मां की आरती

ॐ जय गंगे माता, श्री गंगे माता।
जो नर तुमको ध्याता, मनवांछित फल पाता।
ॐ जय गंगे माता...

चन्द्र-सी ज्योत तुम्हारी जल निर्मल आता।
शरण पड़े जो तेरी, सो नर तर जाता।
ॐ जय गंगे माता...

पुत्र सगर के तारे सब जग को ज्ञाता।
कृपा दृष्टि तुम्हारी, त्रिभुवन सुख दाता।
ॐ जय गंगे माता...

एक ही बार भी जो नर तेरी शरणगति आता।
यम की त्रास मिटा कर, परम गति पाता।
ॐ जय गंगे माता...
आरती मात तुम्हारी जो जन नित्य गाता।
दास वही जो सहज में मुक्ति को पाता।
ॐ जय गंगे माता...
ॐ जय गंगे माता...।।


श्री गंगा चालीसा- 'जय जग जननि अघ खानी'


दोहा
जय जय जय जग पावनी जयति देवसरि गंग ।
जय शिव जटा निवासिनी अनुपम तुंग तरंग ॥

चौपाई
जय जग जननि अघ खानी, आनन्द करनि गंग महरानी ।
जय भागीरथि सुरसरि माता, कलिमल मूल दलनि विखयाता ।।

जय जय जय हनु सुता अघ अननी, भीषम की माता जग जननी ।
धवल कमल दल मम तनु साजे, लखि शत शरद चन्द्र छवि लाजे ।।

वाहन मकर विमल शुचि सोहै, अमिय कलश कर लखि मन मोहै ।
जडित रत्न कंचन आभूषण, हिय मणि हार, हरणितम दूषण ।।

जग पावनि त्रय ताप नसावनि, तरल तरंग तंग मन भावनि ।
जो गणपति अति पूज्य प्रधाना, तिहुं ते प्रथम गंग अस्नाना ।।
ब्रह्‌म कमण्डल वासिनी देवी श्री प्रभु पद पंकज सुख सेवी ।
साठि सहत्र सगर सुत तारयो, गंगा सागर तीरथ धारयो ।।

अगम तरंग उठयो मन भावन, लखि तीरथ हरिद्वार सुहावन ।
तीरथ राज प्रयाग अक्षैवट, धरयौ मातु पुनि काशी करवट ।।

धनि धनि सुरसरि स्वर्ग की सीढ़ी, तारणि अमित पितृ पद पीढी ।
भागीरथ तप कियो अपारा, दियो ब्रह्‌म तब सुरसरि धारा ।।

जब जग जननी चल्यो लहराई, शंभु जटा महं रह्‌यो समाई ।
वर्ष पर्यन्त गंग महरानी, रहीं शंभु के जटा भुलानी ।।
मुनि भागीरथ शंभुहिं ध्यायो, तब इक बूंद जटा से पायो ।
ताते मातु भई त्रय धारा, मृत्यु लोक, नभ अरु पातारा ।।

गई पाताल प्रभावति नामा, मन्दाकिनी गई गगन ललामा ।
मृत्यु लोक जाह्‌नवी सुहावनि, कलिमल हरणि अगम जग पावनि ।।

धनि मइया तव महिमा भारी, धर्म धुरि कलि कलुष कुठारी ।
मातु प्रभावति धनि मन्दाकिनी, धनि सुरसरित सकल भयनासिनी ।।

पान करत निर्मल गंगाजल, पावत मन इच्छित अनन्त फल ।
पूरब जन्म पुण्य जब जागत, तबहिं ध्यान गंगा महं लागत ।।
जई पगु सुरसरि हेतु उठावहिं, तइ जगि अश्वमेध फल पावहिं ।
महा पतित जिन काहु न तारे, तिन तारे इक नाम तिहारे ।।

शत योजनहू से जो ध्यावहिं, निश्चय विष्णु लोक पद पावहिं ।
नाम भजत अगणित अघ नाशै, विमल ज्ञान बल बुद्धि प्रकाशै ।।

जिमि धन मूल धर्म अरु दाना, धर्म मूल गंगाजल पाना ।
तव गुण गुणन करत सुख भाजत, गृह गृह सम्पत्ति सुमति विराजत ।।

गंगहिं नेम सहित निज ध्यावत, दुर्जनहूं सज्जन पद पावत ।
बुद्धिहीन विद्या बल पावै, रोगी रोग मुक्त ह्‌वै जावै ।।
गंगा गंगा जो नर कहहीं, भूखे नंगे कबहूं न रहहीं ।
निकसत की मुख गंगा माई, श्रवण दाबि यम चलहिं पराई ।।

महां अधिन अधमन कहं तारें, भए नर्क के बन्द किवारे ।
जो नर जपै गंग शत नामा, सकल सिद्ध पूरण ह्‌वै कामा ।।

सब सुख भोग परम पद पावहिं, आवागमन रहित ह्‌वै जावहिं ।
धनि मइया सुरसरि सुखदैनी, धनि धनि तीरथ राज त्रिवेणी ।।

ककरा ग्राम ऋषि दुर्वासा, सुन्दरदास गंगा कर दासा ।
जो यह पढ़ै गंगा चालीसा, मिलै भक्ति अविरल वागीसा ।।

दोहा
नित नव सुख सम्पत्ति लहैं, धरैं, गंग का ध्यान ।
अन्त समय सुरपुर बसै, सादर बैठि विमान ॥
सम्वत्‌ भुज नभ दिशि, राम जन्म दिन चैत्र ।
पूण चालीसा कियो, हरि भक्तन हित नैत्र ॥

।।इतिश्री गंगा चालीसा समाप्त।।


पौराणिक तथ्य :


- भारत में गंगा जल का प्रयोग हर शुभ कार्य के लिए किया जाता है।

- शिव जी की जटाओं से निकलने के कारण इसके जल को बहुत ही पवित्र माना जाता है।

- पौराणिक मान्यताओं के अनुसार गंगा का स्वर्ग से धरती पर आगमन हुआ था।

- पुराणों में गंगा को स्वर्ग की नदी माना गया है इसीलिए इसका जल सबसे पवित्र माना जाता है।

- गंगा जल की एक विशेषता यह है कि गंगा का पानी कभी सड़ता नहीं है। अत: यह बहुत ही पवित्र जल माना जाता है।

- गंगा को पापमोचनी नदी कहा जाता है। अत: गंगा जल में स्नान करने से सभी तरह के पाप धुल जाते हैं।

- गंगा के पवित्र जल में स्नान करने से मोक्ष प्राप्त होता है। इसीलिए इसे मोक्षदायिनी नदी भी कहा गया है।


- पौराणिक मान्यता के अनुसार मरते समय व्यक्ति को गंगा जल पिलाने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।

- महर्षि वाल्मीकि ने गंगा के किनारे ही रहकर महाग्रंथ रामायण की रचना की थी।


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