श्री बलदाऊ के जीवन की 20 रोचक जानकारियां

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भगवान श्रीकृष्‍ण के बड़े भाई बलरामजी को ही कहते हैं। भाद्रपद के कृष्‍ण पक्ष की षष्ठी को उनकी जयंती मनाई जाती है जिसे हलछठ भी कतहे हैं। इस बार यह पर्व 28 अगस्त 2021 शनिवार को रहेगा। आओ जानते हैं बलदाऊजी के संबंध में 20 रोचक जानकारियां।

1. पुराणों के भगवान शेषनाग ने देवकी के गर्भ में सप्तम पुत्र के रूप में प्रवेश किया था। कंस इस गर्भ के बालक को जन्म लेते ही मार देना चाहता था। तब भगववान श्रीहरि ने योगमाया को बुलाया और कहा कि आप देवकी के इस गर्भ को ले जाकर रोहिणी के गर्भ में डाल आओ। इस तरह बलरामजी ने वसुदेवजी की पहली पत्नी रोहिणी के गर्भ से जन्म लिया जो यशोदा मैया के यहां रहती थी।

2. देवकी के पेट से गर्भ को खींचकर निकालकर उसे रोहिणी के गर्भ में डालने की इस क्रिया को संकर्षण कहा जाता है। गर्भ से खींचे जाने के कारण ही बलरामजी का नाम संकर्षण पड़ा।
3. लोकरंजन करने के कारण बलरामजी राम कहलाए और बलवानों में श्रेष्ठ होने के कारण वे कहलाए।

4. वे अपने साथ हमेशा एक हल रखते थे इसलिए उन्हें हलधर भी कहा जाता था।

5. बलराम का सबसे प्रमुख अस्त्र हल और मूसल है। सामान्य व्यक्ति हल उठाकर उसे हथियार के रूप में प्रयोग नहीं कर सकता लेकिन बलरामजी उसे उठा उसका हथियार के रूप में प्रयोग कर लेते थे।
6. कहते हैं कि एक बार कौरव और बलराम के बीच किसी प्रकार का कोई खेल हुआ। इस खेल में बलरामजी जीत गए थे लेकिन कौरव यह मानने को ही नहीं तैयार थे। ऐसे में क्रोधित होकर बलरामजी ने अपने हल से हस्तिनापुर की संपूर्ण भूमि को खींचकर गंगा में डुबोने का प्रयास किया। तभी आकाशवाणी हुई की बलराम ही विजेता है। सभी ने सुना और इसे माना। इससे संतुष्ट होकर बलरामजी ने अपना हल रख दिया। तभी से वे हलधर के रूप में प्रसिद्ध हुए।
7. दूसरी कथा के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण की पत्नी जाम्बवती का पुत्र साम्ब का दिल दुर्योधन और भानुमती की पुत्री लक्ष्मणा पर आ गया था और वे दोनों प्रेम करने लगे थे। इसलिए एक दिन साम्ब ने लक्ष्मणा से गंधर्व विवाह कर लिया और लक्ष्मणा को अपने रथ में बैठाकर द्वारिका ले जाने लगा। जब यह बात कौरवों को पता चली तो कौरव अपनी पूरी सेना लेकर साम्ब से युद्ध करने आ पहुंचे। कौरवों ने साम्ब को बंदी बना लिया। इसके बाद जब श्रीकृष्ण और बलराम को पता चला, तब बलराम हस्तिनापुर पहुंच गए और बलराम ने अपना रौद्र रूप प्रकट कर दिया। वे अपने हल से ही हस्तिनापुर की संपूर्ण धरती को खींचकर गंगा में डुबोने चल पड़े। यह देखकर कौरव भयभीत हो गए। संपूर्ण हस्तिनापुर में हाहाकार मच गया। सभी ने बलराम से माफी मांगी और तब साम्ब को लक्ष्मणा के साथ विदा कर दिया।
8. बलराम की पत्नी रेवती कई युग बड़ी थी। वह सतयुग की महिला थी और लगभग कई फुट लंबी थी। गर्ग संहिता के अनुसार रेवती के पिता ककुद्मी सतयुग में अपनी पुत्री के साथ ब्रह्मा जी से मिलने गए। वहां उन्होंने रेवती के लिए किसी योग्य वर की प्रार्थना की। ब्रह्मदेव ने हंसते हुए कहा कि जितना समय आपने यहां बिताया है उतने समय में पृथ्वी पर 27 युग बीत चुके हैं और अभी द्वापर का अंतिम चरण चल रहा है। आप शीघ्र पृथ्वी पर पहुंचिए। वहां शेषावतार बलराम आपकी पुत्री के सर्वथा योग्य हैं। जब रेवती पृथ्वी पर आकर बलराम से मिली तो उनकी लम्बाई में बड़ा अंतर था। तब बलरामजी ने अपने हल के प्रभाव से रेवती की ऊंचाई 7 हाथ कर दी थी और बाद में दोनों को विवाह हुआ।
9. रासलीला के समय वरुणदेव ने अपनी पुत्री वारुणी को तरल शहद के रूप में वहां भेजा। जिसकी सुगंध और स्वाद से बलरामजी एवं सभी गोपियां को मन प्रफुल्लित हो उठा। बलराम रासलीला का आनंद यमुना नदी के पानी में लेना चाहते थे। जैसे ही बलराम ने यमुना को उन सबके समीप बुलाया। यमुना ने आने से मना कर दिया। तब क्रोध में बलराम ने कहा कि मैं तुझे अपने हल से बलपूर्वक यहां खींचता हूं और तुझे सैंकड़ों टुकड़ो में बंटने का श्राप देता हूं। यह सुनकर यमुना घबरा गई और क्षमा मांगने लगी। तब बलराम ने यमुना को क्षमा किया। परन्तु हल से खींचने के कारण यमुना आज तक छोटे-छोटे अनेक टुकड़ों में बहती है।
10. एक बार बलरामजी को अपने बल पर बड़ा घमंड हो चला था तब श्रीकृष्‍ण की प्रेरणा से एक दिन द्वारिका के बगीचे में हनुमानजी प्रवेश करके वहां फल फूल खाते हुए बहुत उत्पात मचाते हैं। द्वारिका के सैनिक घबराकर बलरामजी के पास जाकर कहते हैं कि कोई वानर द्वारिका में घुसकर उत्पात मचा रहा है। फिर बलरामजी और हनुमाजी का युद्ध होता है जिसमें बलरामजी पसीना पसीना होकर कहते हैं कि हे वानर! तू जरूर कोई मायावी वानर है बता तेरी सचाई क्या है अन्यथा में अपना हल निकालता हूं। फिर बलरामजी कहते हैं- तुम यूं नहीं मानोगे, मुझे अपना हल निकालना ही होगा। ऐसा कहकर बलरामजी अपने हल का आह्‍वान करते हैं। यह देखकर हनुमानजी श्रीकृष्ण से कहते हैं कि बचाइये प्रभु बचाइये ये तो अपना हल निकाल रहे हैं। ये तो शेषनाग का अवतार हैं। इनके हल से तो तीनों लोक नष्ट हो जाते हैं। तब श्रीकृष्‍ण रुक्मिणी के संग वहां तुरंत आ जाते हैं और बलरामजी को रोकते हैं- रुकिए दाऊ भैया। और फिर श्रीकृष्‍ण बताते हैं कि ये हनुमानजी हैं। यह सुनकर बलरामजी चकित होकर उनसे क्षमा मांगते हैं।
11. बलरामजी के कौरव और पांडव दोनों से ही अच्छे संबंध थे इसीलिए वे महाभारत के युद्ध में शामिल नहीं हुए थे, क्योंकि उनके सामने धर्मसंकट था कि वे किसकी ओर से लड़ें।

12. महाभारत में वर्णित है कि जिस समय युद्ध की तैयारियां हो रही थीं और उधर एक दिन भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम, पांडवों की छावनी में अचानक पहुंचे। दाऊ भैया को आता देख श्रीकृष्ण, युधिष्ठिर आदि बड़े प्रसन्न हुए। सभी ने उनका आदर किया। सभी को अभिवादन कर बलराम, धर्मराज के पास बैठ गए। फिर उन्होंने बड़े व्यथित मन से कहा कि कितनी बार मैंने कृष्ण को कहा कि हमारे लिए तो पांडव और कौरव दोनों ही एक समान हैं। दोनों को मूर्खता करने की सूझी है। इसमें हमें बीच में पड़ने की आवश्यकता नहीं, पर कृष्ण ने मेरी एक न मानी। कृष्ण को अर्जुन के प्रति स्नेह इतना ज्यादा है कि वे कौरवों के विपक्ष में हैं। अब जिस तरफ कृष्ण हों, उसके विपक्ष में कैसे जाऊं? भीम और दुर्योधन दोनों ने ही मुझसे गदा सीखी है। दोनों ही मेरे शिष्य हैं। दोनों पर मेरा एक जैसा स्नेह है। इन दोनों कुरुवंशियों को आपस में लड़ते देखकर मुझे अच्छा नहीं लगता अतः में तीर्थयात्रा पर जा रहा हूं।
13. बलरामजी और श्रीकृष्णजी ने मिलकर कई युद्ध लड़े थे। कंस की मल्लशाला में श्रीकृष्ण ने चाणूर का वध किया था तो बलरामजी ने मुष्टिक का वध कर दिया था।

14. बलरामजी ने अकेले भी कई युद्ध लड़े थे जैसे वानर द्वीप तो उन्होंने पराजित किया था। जरासन्ध को बलरामजी ही अपने योग्य प्रतिद्वन्द्वी जान पड़े। यदि श्रीकृष्ण ने मना न किया होता तो बलराम जी प्रथम आक्रमण में ही उसे यमलोक भेज देते।

15. बलवानों में श्रेष्ठ होने के कारण उन्हें भी कहा जाता है। इनके नाम से मथुरा में दाऊजी का प्रसिद्ध मंदिर है। जगन्नाथ की रथयात्रा में इनका भी एक रथ होता है। यह गदा धारण करते हैं।

16. सुभद्रा बलरामजी की बहन थीं, जो उनकी सगी बहन थीं।

17. जगन्नाथजी की त्रिमूर्ति में कृष्ण, सुभद्रा ता बलराम तीनों साथ विराजमान हैं।
18. बलराम जी बचपन से ही अत्यन्त गंभीर और शान्त थे। श्री कृष्ण उनका विशेष सम्मान करते थे। बलराम जी भी श्रीकृष्ण की इच्छा का सदैव ध्यान रखते थे।

19. श्रीकृष्ण ने शंखचूड़ का वध करके उसका मुकूट बलरामजी को उपहार स्वरूप दिया था।

20. मौसुल युद्ध में यदुवंश के संहार के बाद बलराम ने समुद्र तट पर आसन लगाकर देह त्याग दी थी।




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