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मनोरंजक प्रवासी कविता : पिकनिक

गुरुवार,मई 19, 2022
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अमेरिका की स्टेट नॉर्थ कैरोलाइना के शार्लिट शहर के 'साहित्य संगम' ग्रुप की पहली कविता गोष्ठी की रिपोर्ट यहां पेश की जा रही है।
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कैसे एक व्यक्ति की सोच, उठाया गया एक सार्थक कदम और प्रयास भविष्य निश्चित कर, अस्तित्व को मजबूत कर, सभी को एकजुट कर सभी की ख़ुशियों का कारण बन जाता है। भविष्य को लेकर देखा गया एक सपना साकार होकर भविष्य को वर्तमान में संजो लेता है।
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अमेरिका ने यारों, बूढ़ा कर दिया, वरना हम भी, जवान थे अच्छे-खासे।
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भरा आकाश और नभ मंडल बारूद और धुएं की बौछार है, सिसक रही मानवता ये कैसा नरसंहार है, जहां थी तारों की लड़ियां वहां बमों की भरमार है... कांप रहा नभमंडल सारा ये कैसा अत्याचार है
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रह रह कर मन उदास हो उठता है, एक अंधेरे कोने में सिमटने लगता है हजार दुख छिपाकर एक खुशी मनाएं कैसे, मां ठीक है लेकिन मामा चले गए
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जब सहन करते हैं, जब मर्यादा उलांघते हैं, जब आकांक्षाएं ऊंची रखते हैं, जब उम्मीदों को ठुकराते हैं, जब चाल चल जाते हैं
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एक समुंदर पानी का, एक समुंदर रेत का, एक जमीन बंजर एक पहाड़ विशाल, मध्य जीवन रिक्त है
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स्वास्थ, सद्‌बुद्धि, हिम्मत, मेहनत, चार पाए हैं ऐसी खटिया के जिन पर टिक कर, आराम से कटती है जिंदगी
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आज मेरी तस्वीरें चिढ़ा रही हैं मुझे, जब मैं उनसे नजरें मिला रही हूं कुछ पुरानी तस्वीरें कॉलेज के दिनों की, प्रयोगशाला में सफेद कोट पहने
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सुंदर, नाजुक, कोमल-कोमल, मानो कोई खिली थी नन्ही-सी कली, देख-देख मैं मन ही मन खुश होती लहराती मेरे मन की बगिया
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याद आती है भारत की दिवाली ! यहां तो बस लगता है खाली खाली !! न यहां वह वातावरण है और न है संग ! व्यस्त जीवन के कारण न है वह उमंग!!
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अमेरिका के रेतीले प्रांत नेवादा में, अलकापुरी सी चमचमाती, रेगिस्तान के बीच बसी हुई, लास वेगास की भव्य नगरी।
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दिल्ली शहर इतना प्रदूषित (Polluted) हो चुका है कि वहां पर एक दिन रहकर सांस लेना यानी दस सिगरेट पीने के बराबर नुकसान करता है- ऐसा TV चैनल वाले अक्सर बताते रहते हैं,
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प्रवासी कविता : पर्वत

रविवार,अक्टूबर 3, 2021
अनंतकाल से अटल खड़ा है, पर्वत एक विशाल, उत्तुंग शिखर उसका चमके, जैसे कोई मशाल।
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आज बदली है सोच बदला है जमाना, दावे तो कई हैं फिर भी एक पदक ना ला सकी बेटी, कइयों के मुंह खुल गए, कइयों ने सांत्वना भी दी
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मुझे ऐसा लगे हर सुबह का सूरज आप हैं, अथाह समुंदर कोई और नहीं आप ही हैं पापा, पृथ्वी के माथे लगा चंद्र भी आप हैं, खिली बगिया का झूला भी आप ही तो हैं पापा,
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जिनके साथ बचपन में खेला, जिनसे सुनी लोरियां मैंने, जिनका साया छांव थी मेरी
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तू तो रही है सदा से आरजू मेरी मेरी भारत माता तू तो बसी है मेरे मन में पर क्या करूं यहां से तुझे न देखा जाता
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जीवन ज्योत जल जाती मानो तेरे आने से, लोग मुस्कुराते थे मेरे इतराने से
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मेरा उससे कोई नाता नहीं ना मैंने उसे देखा है कभी फिर भी वह लगती है अपनी दूर बैठी लगती है करीब-सी संसार छोटा होता जा रहा वह किसी तरह मिल गई
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ओ सिहरते खिले गुलाबी फूलों हो इतने शर्मीले धूप से शर्मा रहे टहनियों के पीछे हो छिप कर बैठे
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शोर में रहकर भी आज हम चुप्पी साधे हैं, चुप ही रहते हैं अक्सर समाचारों में क्या रखा, रोज की वही झिकझिक फिर कोई नया कांड नेताओं के चमचे ले झंडे खड़े हो जाते चौराहे !
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कशिश खत्म नहीं होगी, तेरे मेरे बीच आज तुम उदास बैठे हो मेरे सामने बिखरे हुए फूलों से !
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एक दीवाना था, सनसनाती बिजलियों को मस्ती में छेड़ा था, तूफ़ानों की बांहों को कस के मरोड़ा था, तमतमाते शोलों को हाथों में सजाया था
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कड़कती धूप में गन्ने का रस जैसे, सर्दियों में चाय की गरम सेंक जैसे जैसे रसमलाई नरम जैसे पकौड़े करारे है
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सौम्य सुदर्शन शामल सुंदर, नीलमणी सम रोचन उज्ज्वल, रणवीर धुरंधर वीर धनुर्धर, असुर निकंदन दशरथ नंदन
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ढ़ीठ होती हैं यादें, बेबाक होती हैं यादें, बेवक्त की बारिश सी सनकी होती हैं यादें, दुआ मरहम से भी लाइलाज होती हैं, पुराने ज़ख्मों सी ज़िद्दी होती हैं यादें
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दोस्तों के साथ मिल कहकहे लगाना, वो हंसना वो ठहाके लगाना, भूला हुआ हो जैसे एक फसाना! थिरकते हुए पैरों पर रातों की जवानी, कभी मस्ती, कभी शोखियों की रवानी,
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कितने परिवर्तनों की बात करें, कितने जुल्म सहे हैं यह गिनें कुछ परिवर्तन आया भी तो, क्या जुल्म होने बंद हो गए !
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चलो गांव लौट चलें फिर से बुलाएं बारिशों को, गड़गड़ाते बादलों संग झूमे हल्ला-गुल्ला खूब शोर मचाएं!
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एक सदी के बीत जाने पर, इम्तिहान लेती कुदरत महामारी के भेष में मिला हाथों की लकीरें सभी इंसानों की, दुनिया के लिए खड़ी करती एक चुनौती !
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यह कैसा वसंत आया, उल्लास नहीं जो लाया, संताप सब तरफ छाया, यहां कोरोना का साया।
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