भारत की आधी से ज्यादा आबादी बोलती है हिन्दी, फिर भी हिन्दी राष्ट्रभाषा क्यों नहीं?

वेबदुनिया न्यूज डेस्क| Last Updated: मंगलवार, 7 जून 2022 (16:02 IST)
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केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने हिन्दी दिवस के मौके पर 'एक देश एक भाषा' की बात कहकर नए विवाद को हवा दी थी। उनके इस बयान का काफी विरोध हुआ था। इसके बाद उन्होंने हाल ही में एक बार फिर बयान दिया कि हिन्दी को विकल्प के तौर पर लिया जाना चाहिए, इसके जवाब में तमिलनाडु के पूर्व मुख्‍यमंत्री पन्नीर सेलवम ने कहा कि लोग अपनी मर्जी से हिन्दी सीख सकते हैं, इसे थोपा नहीं जाना चाहिए। दक्षिण के अन्य नेताओं समेत संगीतकार रहमान ने भी इसका विरोध किया था।

राजनीतिक गलियारों से उठकर यह विवाद अब फिल्मी सितारों तक पहुंच गया। दरअसल, फिल्म केजीएफ की अपार सफलता के बाद दक्षिण भारतीय फिल्मों के सितारे किच्चा सुदीप ने यह कहकर विवाद को हवा दी कि अब हिन्दी राष्ट्रीय भाषा नहीं रही, इसके जवाब में हिन्दी फिल्मों के 'सिंघम' अजय देवगन ने कह दिया कि हिंदी राष्ट्रीय भाषा नहीं है तो आप अपनी फिल्मों को हिंदी में डब करके क्यों रिलीज करते हैं? हिंदी हमारी मातृभाषा और राष्ट्रीय भाषा थी, है और हमेशा रहेगी। हालांकि बाद में सुदीप ने सफाई देते हुए कहा कि सर, जिस कॉन्टेक्स्ट में मैंने वह बात कही, मुझे लगता है कि मेरी उस बात को बहुत अलग तरीके से लिया गया है। शायद मैं अपनी बात को बेहतर ढंग से आपके सामने तभी रख सकूं, जब मैं आपसे मिलूंगा।
बापू ने कहा था : राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का मानना था कि हिन्दी में पूरे देश को एकता के सूत्र में बांधने की क्षमता है। इसी के मद्देनजर बापू ने 1918 में हिन्दी प्रचार सभा की स्थापना भी की थी। हिन्दी दिवस के मौके पर अमित शाह ने भी लगभग बापू की बात को ही दोहराया था। उन्होंने कहा था- आज देश को एकता की डोर में बांधने का काम अगर कोई भाषा कर सकती है तो वह सर्वाधिक बोली जाने वाली हिंदी भाषा ही है। तब AIMIM चीफ असदुद्दीन ओवैसी, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, डीएमके नेता स्टालिन, कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी समेत अन्य दक्षिण भारतीय नेताओं ने इस बयान का कड़ा विरोध किया था।
सबसे ऊपर हिन्दी : हिन्दी भले ही राष्ट्रभाषा नहीं है, लेकिन इसे राजभाषा का दर्जा जरूर प्राप्त है। वर्तमान में यह सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। हिन्दी 52.8 करोड़ लोगों यानी देश की 43.6% आबादी की मातृभाषा है। वहीं अन्य भाषा-भाषियों को शामिल कर लिया जाए तो हिन्दी बोलने वाले कुल आबादी का 57.10 फीसदी हो जाते हैं। भौगोलिक स्थिति की दृष्टि से देखें तो हिंदी जानने वाले देश के आधे से अधिक क्षेत्र को कवर करते हैं।

कितनी बढ़ी हिन्दी : भारत में हिन्दी दशकों से आधी से ज्यादा आबादी की प्रमुख मातृभाषा है। हर जनगणना के बाद हिन्दी को बोलने वालों की संख्या में इजाफा ही हुआ है। 1971 से 2011 के बीच, हिंदी भाषी 20.2 करोड़ से बढ़कर 52.8 करोड़ हो गए। अर्तात 40 साल में हिंदी वाले 161% बढ़े। चूंकि कोरोना के चलते 2021 में जनगणना नहीं हो पाई। यदि यह आंकड़ा भी जोड़ लिया जाए तो यह संख्या और बढ़ जाएगी। दूसरी ओर, बांग्ला 1971 में 8.17% लोगों के साथ दूसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली मातृभाषा थी। हालांकि 2011 की जनगणना के बाद इसकी संख्या बढ़ने के बजाय घटकर 8.03 प्रतिशत रह गई। पंजाबी बोलने वालों की संख्या इस अवधि में 2.57% से बढ़कर 2.74% हो गई।
‍फिर भी सबसे ज्यादा बोली जाती है हिन्दी : उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान, हरियाणा आदि राज्यों में हिंदी प्रमुख भाषा है। जनगणना की बात करें तो हिंदी के तहत 65 मातृभाषाएं सूचीबद्ध है। इनमें भोजपुरी, राजस्थान, ब्रज, अवधि, छत्तीसगढ़ी आदि भी हैं। अकेली भोजपुरी 5 करोड़ लोगों की मातृभाषा है। जनगणना में तय किया गया था कि भोजपुरी हिंदी है। यदि हिंदी से अन्य भाषाओं (बोलियां, जिन्हें भाषा के रूप में संवैधानिक दर्जा हासिल नहीं है) को हटा दिया जाए, तो भी आंकड़ा 38 करोड़ रहेगा। जो कि अन्य भाषाओं के मुकाबले काफी ज्यादा है।

...और दक्षिण भारतीय भाषाओं की स्थिति क्या है : चूंकि का झंडा दक्षिण भारत में सबसे ज्यादा उठाया जाता है, ऐसे में यह बताना जरूरी हो जाता है कि दक्षिण भारतीय भाषाओं की स्थिति क्या है। हालांकि इसमें भी कोई संदेह नहीं कि विगत वर्षों में दक्षिण भारतीय भाषाओं को बोलने वालों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। हिंदी स्वाभाविक रूप से देश में सबसे ज्यादा बोली और समझी जाने वाली भाषा है। बांग्ला और मराठी क्रमश: दूसरे और तीसरे स्थान पर हैं। दक्षिण भारतीय भाषाओं में सबसे ऊपर तेलुगू है, ये 6.7% लोगों की भाषा है। तमिल बोलने वालों की संख्या 5.7 फीसदी है, जबकि 3.6 फीसदी लोगों के साथ कन्नड़ 8वें नंबर है। विगत 40 सालों में मातृभाषा के रूप में कन्नड़ बोलने वाले 101%, तमिल बोलने वाले 83.14%, तेलुगू बोलने वाले 81.26% और मलयालम बोलने वाले 58.8 फीसदी लोग बढ़े हैं।
भाषाई दंगों में गई थी कई निर्दोषों की जान : 1937 में चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के नेतृत्व में मद्रास प्रेसीडेंसी में कांग्रेस सरकार का गठन हुआ था। 1938 में इस सरकार ने माध्यमिक विद्यालयों में हिन्दी को अनिवार्य करने का फैसला लिया। राज्य में आत्म सम्मान आंदोलन का नेतृत्व कर रहे पेरियार की जस्टिस पार्टी ने असका कड़ा विरोध किया। उस समय यह पार्टी विपक्ष में थी। हिन्दी के इसी विरोध ने कुछ समय बाद पूरे राज्य में आंदोलन का रूप ले लिया। राजगोपालाचारी सरकार के 1939 में इस्तीफा देने के बाद अंग्रेज गवर्नर ने 1940 में हिन्दी अनिवार्य करने के फैसले को वापस ले लिया। इस फैसले के बाद आंदोलन तो थम गया, लेकिन पेरियार के आंदोलन के बाद हिन्दी का विरोध हमेशा ही जारी रहा। कालांतर में यह लड़ाई भाषा से इतर हिन्दी बनाम द्रविड़ गौरव की हो गई। इस उत्तर बनाम दक्षिण का विरोध भी कह सकते हैं। क्योंकि हिन्दी सबसे ज्यादा दक्षिण भारत में ही बोली जाती है।

1963 में संसद में राजभाषा विधेयक पेश किया गया। तत्कालीन राज्यसभा सांसद और डीएमके नेता अन्नादुरई ने संसद में इसका विरोध किया। विधेयक के पास होने के बाद मद्रास राज्य की सड़कों पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। 25 जनवरी को मदुरै में दंगा भड़क गया। दंगों कि यह आग इतनी फैली कि रेलवे स्टेशनों के हिन्दी के नामों से लेकर साइन बोर्डों तक को हटा दिया गया। भाषाई दंगों की आग में कई निर्दोष लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के आश्वासन के बाद ही शांति स्थ‍ापित हो सकती।

क्या है त्रिभाषा फॉर्मूला : इसे पहली बार 1968 में इंदिरा गांधी सरकार द्वारा राष्ट्रीय शिक्षा नीति में शामिल किया गया था। इसके मुताबिक हिन्दी भाषी राज्यों में हिन्दी, अंग्रेजी के अलावा एक अन्य भारतीय भाषा, जबकि गैर हिन्दी भाषी राज्यों में अंग्रेजी हिन्दी और एक भारतीय भाषा। केन्द्र सरकार की नई शिक्षा नीति 2020 त्रिभाषा नीति का समर्थन किया गया है, लेकिन तमिलनाडु ने यह कहकर इसे खारिज कर दिया कि वह पिछले 50 वर्षों से दो भाषा सूत्र का पालन कर रहा है और उसी पर कायम रहेगा। यूपीए सरकार के कार्यकाल में तत्कालीन मंत्री कपिल सिब्बल ने त्रिभाषा फार्मूला पेश किया था। उनका कहना था कि बच्चों को मातृभाषा के अलावा हिन्दी तथा अंग्रेजी सिखाई जानी चाहिए। उनका कहना था कि मातृभाषा का ज्ञान सांस्कृतिक समन्वय कराएगा, जबकि हिन्दी राष्ट्रीय समन्वय कराएगी और अंग्रेजी लोगों को वैश्विक स्तर पर जोड़ेगी।
हालांकि दक्षिण भारतीय राज्यों खासकर तमिलनाडु में हिन्दी का विरोध इस आधार पर किया गया कि जब हिन्दी भाषी लोग तमिल नहीं सीखते तो हम क्यों हिन्दी सीखें।

विरोध की मुख्‍य वजह : हिन्दी विरोध की बड़ी वजह राजनीतिक ही रही है, जो कालांतर में सामाजिक स्तर पर पहुंच गई। हालांकि जानकारों का यह भी मानना है कि राजनीति से शुरू हुआ यह विरोध संभवत: अब रोजगार की वजह से भी है। यदि दक्षिण भारत के लोग हिन्दी बोलना और समझना शुरू कर देंगे तो स्वाभाविक रूप से हिन्दी भाषी लोगों को वहां जाकर व्यापार-व्यवसाय करने में और ज्यादा आसानी हो जाएगी। दूसरी ओर हमें यह भी देखने में आता है कि हिन्दी का विरोध करने वाले राज्यों के लोग जब हिन्दी भाषी राज्यों में रोजगार की तलाश में जाते हैं तो उन्हें हिन्दी बोलने में तनिक भी गुरेज नहीं होता। हालांकि हिन्दी भाषी लोगों को भी यह सोचना चाहिए कि यदि हम उन्हें हिन्दी बोलने समझने के लिए कह सकते हैं तो खुद दक्षिण भारतीय भाषाएं क्यों नहीं सीखते।

22 भाषाओं को संवैधानिक दर्जा : यूं तो भारत में 1600 से ज्यादा भाषा और बोलियां प्रचलन में हैं, लेकिन 22 भाषाओं को संवैधानिक दर्जा प्राप्त है। संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाओं का उल्लेख किया गया है। 1950 में 14 भाषाएं-
हिन्दी, गुजराती, मराठी, कश्मीरी, असमिया, बांग्ला, पंजाबी, उड़िया, संस्कृत, उर्दू, तमिल, तेलुगू, कन्नड़ और मलयायम इस सूची में शामिल थीं, जबकि 1967 में सिंधी भाषा को इस अनुसूची में शामिल किया गया। इसी तरह 1992 में कोंकणी, मणिपुरी, नेपाली को शामिल किया गया, 2003 में बोडो, डोगरी, मैथिली और संथाली इस अनुसूची का हिस्सा बनीं। संविधान का अनुच्छेद 29 यह संरक्षण प्रदान करता है कि भारत के नागरिकों के एक हिस्से को अलग भाषा, लिपि या संस्कृति अपनाने का अधिकार है।



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