एक नहीं दो बच्चे पैदा करें-मृदुला सिन्हा

पुनः संशोधित शुक्रवार, 19 सितम्बर 2014 (19:35 IST)
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-संगीता शुक्ला
नई दिल्ली। गोवा की नवनियुक्त राज्यपाल मृदुला सिन्हा गोवा की सामाजिक समरसता से प्रभावित  हैं, लेकिन साथ ही वे वहां के स्थानीय लोगों के पलायन को लेकर चिंतित भी हैं। वे राज्यपाल के इस नए दायित्व को पूरा करना और लोगों की नजरों में खरा उतरने को एक बड़ी चुनौती मानती हैं। 
 
वीएनआई के साथ एक विशेष बातचीत मे उन्होंने कहा कि गोवा की सामाजिक समरसता देखकर  मुझे खुशी हुई। गोवा में पर्यटक तो बहुत आते हैं लेकिन स्थानीय लोग आजकल वहां से पलायन कर रहे हैं। वे क्यों पलायन कर रहे हैं इसका कारण जानने की मैं कोशिश करूंगी।
 
पारंपरिक भारतीय मुल्यों को जीवंतता से जीने के साथ-साथ महिला अधिकारों की भारतीय व्याख्या की पक्षधर श्रीमती सिन्हा को एक मलाल है कि पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी जिन्होंने उन्हें राजनीति सिखाई, वे अपने राज्यपाल बनने की खबर भी वाजपेयी के खराब स्वास्थय के चलते उन्हें नहीं बता पाईं। श्रीमती के अनुसार भाजपा ने राजनीतिक मंच से महिलाओं की अनेक समस्याओं को किस प्रकार दूर किया जाए इस बारे में सदैव सोचा है। उन्हें आगे बढ़ने के अवसर दिए और खुशी की बात है कि महिलाओं ने बीते वर्षों में बहुत प्रगति की हैं।
 
गोवा की अपनी नई जिम्मेवारियों के बारे में राज्यपाल इसे एक बड़ी चुनौती मानती हैं। उनका कहना है कि गोवा में सामाजिक समरसता है, जिसे देखकर मुझे खुशी हुई। गोवा में पर्यटक तो बहुत आते हैं लेकिन स्थानीय लोग आजकल वहां से पलायन कर रहे हैं। तो वे क्यों पलायन कर रहे हैं, इसका कारण जानने की मैं कोशिश करूंगी। दूसरा बिंदु, सारे देश में एक गोवा ही ऐसा राज्य है, जहाँ यूनिफॉर्म सिविल कोड है। समान नागरिक संहिता है। उसका क्या प्रभाव है इस बात का भी मैं अध्ययन करना चाहूंगी। 
 
गोवा में साक्षरता है, लेकिन फिर भी भ्रूण हत्या वहाँ भी होती है। ये तमाम बाते चिंतन का विषय हैं। आधुनिकता और पारंपरिक भारतीय मुल्यों के सम्मिश्रण पर बल देने वालीं सिन्हा का कहना है कि समाज मे लड़कियों की कमी है। सारे देश में पढ़े-लिखे लोगों के द्वारा एक ही बच्चे का जो चलन चला है, उसे बदलना चाहिए क्योंकि घर में एक बच्चा बहुत एकाकी हो जाता है, उसे चीजें बांटकर खाने-खिलाने की संस्कृति नहीं पता और न हीं उसे शरारत करना आता है, अपने भाई-बहनों के साथ बातें शेयर करना भी वह नहीं सीख पाता है। 
 
आधुनिक माता-पिता कहते हैं कि इस महंगाई के जमाने में एक ही बच्चा बहुत है, लेकिन सीमित संसाधनों के बावजूद समाज में वह घुले मिले, सौहार्द बढ़े, उसके लिए इस बात की जागृति लानी होगी की वे कम से कम दो बच्चों के बारे में विचार करें। श्रीमती सिन्हा ने कहा कि भारतीय नारी की स्वातंत्र्य की परिभाषा हमारी अपनी होनी चाहिए? 'वुमन लिव' का नारा जब आया, तब हमने कहा कि भारतीय महिला इस प्रकार कि मुक्ति नही चाहती है वह नहीं चाहती है कि वह अपने प्राकृतिक स्वभाव को छोड़ सके। जैसे कि वह स्वाभाविक ही अपने घर परिवार बच्चों की देखभाल करती है क्योंकि हरेक स्त्री का यही प्राकृतिक स्वभाव होता हैं, स्त्री जन्म देती है, परिवार को चाहती है। हम धुरी हैं। यदि हम इससे हट जाएंगे तो हमारे पास अपना कुछ नहीं रहेगा। 
 
राजनीति में रुचि के संदर्भ में पूछे जाने पर उन्होंने बताया कि राजनीति में मेरी रुचि नहीं थी, मेरे पति जनसंघ में आए और सक्रिय हुए फिर घर में भी नेताओं का आना-जाना लगा रहा। इस प्रकार 1967 के चुनाव में धीरे-धीरे मेरी रुचि राजनीति में बढती गई। 1980 में मैं अटलबिहारी वाजपेयी की चुनाव संयोजिका थी। फिर धीरे धीरे जुड़ाव बढता गया। मुझे महिला मोर्चा की प्रथम अध्यक्ष बनाया गया। केन्द्रीय समाज कल्याण बोर्ड की अध्यक्ष रही, राष्ट्रीय महिला आयोग से भी जुड़ी रही।
 
उन्होंने बताया कि पति डॉ. रामकृपाल सिन्हा राजनीति में सक्रिय रहे। वे राज्य सरकार में कैबिनेट मंत्री और केन्द्र सरकार में राज्यमंत्री रहे। विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्राध्यापक पद से सेवानिवृत्त डॉ. सिन्हा भाजपा के केन्द्रीय कार्यालय के प्रभारी रहे। श्रीमती सिन्हा से पार्टी में अपने प्रिय नेता के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि वैसे तो सभी नेता साथ मिलकर ही काम करते हैं, लेकिन फिर भी सबसे प्रिय नेता मैं अटलजी को कह सकती हूं क्योंकि उन्होंने ही मुझे राजनीति में सक्रिय किया और सिखाया। उनके बाद आजकल जो न केवल मेरे लेकिन सभी के फेवरिट नेता हैं, वे हैं नरेन्द्र मोदी। 



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