प्राण को दादा फालके पुरस्कार

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नई दिल्ली। बल्लीमारान की गलियों से तक के सफर में अपनी बेहतरीन अदायगी की छाप छोड़ने वाले मशहूर को भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान दादा साहेब फालके पुरस्कार से नवाजा जाएगा।


उन्हें यह सम्मान दिए जाने के फैसले का उनके बेटे सुनील सिकंद ने स्वागत किया है। प्राण को 3 मई को विज्ञान भवन में आयोजित समारोह में सम्मान दिया जाएगा। अपने 6 दशक के करियर में 400 से अधिक फिल्में कर चुके प्राण ने 1998 में अभिनय को अलविदा कह दिया था।

पिछले कई साल से प्राण के नाम की चर्चा फालके पुरस्कार के लिए होती रही लेकिन उन्हें यह सम्मान नहीं मिला। पिछले साल भी प्राण को यह पुरस्कार दिए जाने की अटकलें थीं लेकिन मशहूर बांग्ला अभिनेता सौमित्र चटर्जी को चुना गया।

यह पूछने पर कि क्या देर से सम्मान मिलने का उन्हें दुख है? सुनील ने कहा कि यह खुशी का पल है और इस समय विवादित बयानबाजी की कोई जरूरत नहीं है। हम इस पल का आनंद लेना चाहते हैं।


उन्होंने यह भी बताया कि प्राण का पुरस्कार लेने दिल्ली जाना संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि वे 93 वर्ष के हैं और हाल ही में अस्पताल से उन्हें छुट्टी मिली है। मुझे नहीं लगता कि वे पुरस्कार लेने जा सकेंगे।
पुरस्कार मिलने पर प्राण की प्रतिक्रिया के बारे में पूछने पर सुनील ने कहा कि उन्होंने टीवी पर यह खबर देखी है। वे और हम सभी खुश हैं। खलनायकी और चरित्र अभिनय को नए आयाम देने वाले प्राण ने कई किरदारों को इस शिद्दत से जिया कि सिनेमा के इतिहास में वे अमर हो गए। फिर वह ‘जंजीर’ का शेरखान हो या ‘कस्मे वादे प्यार वफा...गाता फिल्म ‘उपकार’ का मलंग। उन्होंने दिलीप कुमार से लेकर अमिताभ बच्चन तक हर बड़े कलाकार के साथ काम किया और अपनी उपस्थिति बराबरी से दर्ज कराई।
उन्होंने 90 के दशक के आखिर में उम्र संबंधी बीमारियों के कारण फिल्मों में काम करना बंद कर दिया था। पुरानी दिल्ली के बल्लीमारान में 12 फरवरी 1920 को जन्मे प्राण ने अपने अभिनय करियर की शुरुआत 1942 में दलसुख पंचोली की फिल्म ‘खानदान’ से की। उन्होंने 40 के दशक में 'यमला जट', 'खजांची', 'कैसे कहूं' और 'खामोश निगाहें' जैसी फिल्मों में काम किया।
उन्होंने 1945 और 46 में लाहौर में करीब 22 फिल्मों में काम किया लेकिन 1947 में विभाजन के कारण उनके करियर को अल्प विराम लग गया था। इसके बाद उन्होंने 1948 में देव आनंद और कामिनी कौशल की ‘जिद्दी’ के साथ बॉलीवुड में अपने करियर की शुरुआत की।

दिलीप कुमार, देव आनंद और राज कपूर की 50 और 60 के दशक की फिल्मों में प्राण खलनायक के रूप में नजर आने लगे। दिलीप कुमार की ‘आजाद’, ‘मधुमति’, ‘देवदास’, ‘दिल दिया दर्द लिया’ या देव आनंद की ‘जिद्दी’, ‘मुनीमजी’ और ‘जब प्यार किया से होता है’ और राज कपूर की ‘आह’, ‘जिस देश में गंगा बहती है’ और ‘दिल ही तो है’ में उनके अभिनय को काफी सराहा गया।
60 के दशक में मनोज कुमार की फिल्मों का भी अभिन्न हिस्सा रहे प्राण। ‘उपकार’ (1967) में मलंग के किरदार को कौन भूल सकता है जिस पर ‘कस्मे वादे प्यार वफा सब, बातें हैं बातों का क्या...गीत फिल्माया गया था। ‘शहीद’, ‘पूरब और पश्चिम’, बेईमान’, ‘संन्यासी’ और ‘पत्थर के सनम’ जैसी मनोज कुमार की कई सुपरहिट फिल्मों में प्राण ने काम किया।
एक दौर ऐसा भी था, जब प्राण को फिल्म के नायकों से अधिक पारिश्रमिक मिलने लगा था। 70 के दशक में प्राण ने खलनायक की बजाय अधिक चरित्र भूमिकाएं कीं। उन्हें 2000 में स्टारडस्ट ने ‘सहस्राब्दी का सर्वश्रेष्ठ खलनायक’ चुना। उन्हें 2001 में भारत सरकार ने पद्मभूषण सम्मान से नवाजा। (भाषा)



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