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नर्मदा नदी की 3 प्रेम कहानियां, भावुक कर देंगी आपको भी

रविवार,सितम्बर 26, 2021
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एक पिता के लिए दुनिया में सबसे प्यारा क्या हो सकता है, ज़ाहिर तौर पर उसका जवान बेटा। अगर बेटा ज़िंदा न हो तो पिता चाहता है कि कम से कम बेटे का शव ही मिल जाए। हर आदमी दुनिया में किसी न किसी खूबसूरत उम्मीद का इंतज़ार करता है, लेकिन एक पिता अपने बेटे का ...
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पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह की मुख्यमंत्री पद से विदाई को अगर संकेत माना जाए तो साफ है कि कांग्रेस में अब करीब 3 दशक पुराने उस दौर की फिर शुरुआत हो गई है, जब कोई क्षत्रप आलाकमान को आंख दिखाने की हिम्मत नहीं करता था। हालांकि पार्टी की कमान अभी ...
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कैप्टन का कहना है कि उन्होंने सोनिया गांधी को ये सारी बातें बताईं, लेकिन उन्होंने फैसला किया तो वह जाने, लेकिन राष्ट्र के हित का ध्यान रखते हुए मैं सिद्धू का विरोध करूंगा। वास्तव में कांग्रेस या किसी पार्टी की राजनीति कमजोर या मजबूत हो , कोई पार्टी ...
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इन दिनों सबसे बड़ी जन चर्चा का मुद्दा यह है कि भाजपा अपनी ही पार्टी की राज्य सरकारों को मुख्यमंत्री सहित हटाकर दूसरी सरकारें क्यों बना रही है? किसी जमाने में इंदिरा गांधी का यही आचरण हुआ करता था, लेकिन तब वे वन वूमैन आर्मी हुआ करती थीं। उन्हें ...
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माफी की अवधारणा तो हर जगह है, लेकिन वो सिर्फ ‘सॉरी’ तक सीमि‍त है, आमातौर पर ‘सॉरी’ दिन में कई बार बोल दिया जाता है, उसमें कोई भाव नहीं, कोई प्रायश्‍चित नहीं। उसमें मन, कर्म और वचन शामिल नहीं है। लेकिन क्षमा को बतौर उत्‍सव भारत के अलावा कहीं नहीं ...
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इस बीच पंजाब की राजनीति में दो सवाल खड़े हो गए हैं, जिनके बारे में फि‍लहाल कुछ भी स्‍पष्‍ट तौर पर नहीं कहा जा सकता है। राज्‍य में नए मुख्‍यमंत्री के सवाल पर पैंच फंसता नजर आ रहा है।
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1985 में शिरोमणि अकाली दल में शामिल हुए, विधान सभा चुनाव जीते और सुरजीत सिंह बरनाला का सरकार में मंत्री बने। 1987 में बरनाला सरकार के आतंकवाद के दौर में बर्खास्त होने के बाद 1992 में वो फिर अलग हुए और अकाली दल (पंथिक) का गठन किया।
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मुगलों के एक नमक-हलाल वकील की तरह वे बोले-"मुस्लिम शासनकाल में एक भी हिंदू-मुस्लिम दंगा नहीं हुआ। पहला हिंदू-मुस्लिम दंगा तो औरंगजेब की मौत के सात साल बाद 1714 में अहमदाबाद में हुआ जो दो दिन तक चला था। वह होली के दिन गाय को जिबह करने के कारण शुरू ...
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इन तीनों भाइयों में दामोदर सबसे बड़े, बालकृष्ण उनके बाद और वासुदेव सबसे छोटे थे। ये आजादी के मतवाले वंदे मातरम का ओजस्वी गान किया करते थे, क्योंकि भजन कीर्तन में ये लोग अपने माता-पिता द्वारा बचपन में ही परिष्कृत कर दिए गए थे। बहुत कम लोग जानते होंगे ...
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देश के नागरिक इस वक्त एक नए प्रकार के ‘ऑक्सीजन’ की कमी के अदृश्य संकट का सामना कर रहे हैं। आश्चर्यजनक यह है कि ये नागरिक सांस लेने में किसी प्रकार की तकलीफ़ होने की शिकायत भी नहीं कर रहे हैं। मज़ा यह भी है कि इस ज़रूरी ‘ऑक्सीजन’ की कमी को नागरिकों ...
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आनंदीबेन पटेल को मोदी ने अपने उत्तराधिकारी के रूप में सामने रखा लेकिन उनके विरुद्ध पार्टी में ही असंतोष पैदा हो गया। फिर पाटीदार आरक्षण आंदोलन को जिस ढंग से उन्होंने हैंडल किया उसके विरुद्ध भी प्रतिक्रिया हो रही थी। हालांकि आनंदीबेन पटेल की अपनी कोई ...
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नरेन्द्र मोदी सत्ता में किसी आंदोलन की बदौलत नहीं आए हैं। वे कड़ी मेहनत, संघर्ष और आलोचनाओं की आग में तपकर, निखरकर सत्ता के शीर्ष सिंहासन पर बैठे हैं। उनके पास किसी का सहारा नहीं था, किसी का आशीर्वाद नहीं था। कई वर्षों संघ, संन्यास और राजनीतिक जीवन ...
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नरेन्द्र मोदी अपने विचारों के प्रति दृढ़ आस्थावान तथा उन्हें मूर्तरुप देने की सामर्थ्य रखते हैं उनकी स्पष्ट व दूरदर्शी नीति, कार्यशैली, कर्त्तव्यपारायणता व अथक परिश्रम के माध्यम भारतीय जनमानस की जनाकांक्षाओं की पूर्ति व उनके सर्वाङ्गीण विकास के लिए ...
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चेतना भाटी का हाल में प्रकाशित उपन्यास चंद्रदीप सहज स्त्री भावनाओं की अभिव्यक्ति है। उपन्यास बहुत बड़े कैनवास पर नहीं रचा गया है किंतु उसमें भी जिस तरह से विभिन्न भावनाओं को दर्शाया गया है वह सहज ही जेन ऑस्टीन की शैली को याद दिला देता है।
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सबकी बातों में इंदौर था, पुराने मोहल्ले की पुरानी गलियां थीं, तीस सालों में इनमें से किसी से मुलाकात नहीं हुई थी लेकिन बातों का सिलसिला जब चल पड़ा तो ग्रुप कॉल भी होने लगीं और गूगल मीट भी। बातों-बातों में ही एक दिन भुवन सरवटे ने कहा कुछ अलग करना है।
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'लोकतंत्र का अर्थ है, एक ऐसी जीवन पद्धति जिसमें स्वतंत्रता, समता और बंधुता समाज-जीवन के मूल सिद्धांत होते हैं।' -बाबा साहब अम्बेडकर
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मैं अक्सर सोचता हूं कि सदियों तक सजे रहे उन गुलामों के बाजार में बिकी हजारों-लाखों बेबस बच्चियां और औरतें कहां गई होंगी? वे जिन्हें भी बेची गई होंगी, उनकी भी औलादें हुई होंगी? आज उनकी औलादें और उनकी भी औलादों की औलादें सदियों बाद कहां और किस शक्ल ...
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गर्व होता है न हमारी राष्ट्र की भाषा पर। आज हिन्दी दिवस है। भारत में हिन्दी बोलने का दिन। अपने देश में अपनी ही भाषा के लिए एक दिन। मानसिक तौर पर हम क्या आज भी ग़ुलाम नही ?
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हिन्दी का बिगाड़ भारत माता के रूप की लालिमा का बिगाड़ है, उसकी सिन्दूरी आभा का बिगाड़ है, उसके माथे की बिंदी का बिगाड़ है। बिगाड़ तो अंग्रेजों ने भरपूर किया पर उनके बिगाड़ को सम्मान से स्वीकार किया चापलूसों ने।
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