अनाज उगाता किसान और अनाज सड़ाती व्यवस्था का तिलिस्म!

यह भी किसी खुद बुलाई आपदा से कम है क्या जो देश में हर साल हजारों मीट्रिक टन अनाज खुले आसमान के नीचे बेसमय हुई बारिश के मत्थे मढ़ सड़ा दिया जाए? जलवायु परिवर्तन कहें या प्रकृति से हुई जबरदस्त छेड़छाड़ का परिणाम जो भी, मौसम कब रूठ जाए किसी को पता नहीं। लेकिन देश में अनाज को सुरक्षित रखा जाना कभी किसी की प्राथमिकता में रहा हो, ऐसा भी नहीं लगता!

ताउ-ते तूफान के बाद खुले आसमान के नीचे रखे गेहूं के असमय हुई बारिश से भीगने और नालों, नालियों में तक बह जाने की तबाही भरी तस्वीरें और वीडियो जहां-तहां से देखने को मिलीं. आगे भी तूफान न रुका है, न रुकेगा। हां, आसमान के नीचे भण्डारण का रुक सकता है।

सरकारें कदम भी उठाती हैं लेकिन प्रयास जमीनी कम और कागजी ज्यादा होते हैं। तमाम सरकारी योजनाओं, सहायताओं तथा पीपीई यानी पब्लिक, प्राइवेट पार्टनर शिप रूपी हथियार के बावजूद खुले आसमान के नीचे जमीन पर रखा अनाज कभी नमीं तो कभी बारिश से भीग जाए! यह वैसा ही है जैसा जानकर अंजान होना होता है।

हम एक कृषि प्रधान देश में रहते हैं। कृषि ही भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। 47 प्रतिशत भू-भाग में लोग खेती करते हैं। देश के 70 प्रतिशत लोग इसी पर निर्भर हैं। हम किसानों से अच्छी फसल की उम्मीद करते हैं जिसमें वह खरा भी उतरता है। लेकिन उसकी मेहनत को सहेजने के लिए फरमानों के दौड़ते कागजी घोडों के बदलते ठिकानों और मुकाम पर पहुंचने से पहले बेमौसम बारिश का शिकार होती उपज का कुसूर किसे दिया जाए? लेकिन अफसोस यह कि कागजी घोड़े तब भी नहीं रुकते हैं। हां, उन रुक्कों में मजमून बदल जाता है।

पहले भण्डारित की हुई फसलों की सुरक्षा की कोशिशें थी, अब बेमौसम या अचानक हुई बारिश से हुए नुकसान का हिसाब-किताब लिए दूसरा रुक्का फिर दौड़ने लग जाता है। लालफीताशाही में जकड़े कागजी घोड़े न कभी रुकते हैं न थकते हैं। ब स नुकसान का लेखा, बचाने में खर्चों की इजाजत नुकसान का अनुमान भरे कागज अंततः बैलेन्स शीट में जगह पा अगले साल की जुगत में दोबारा एक टेबिल से दूसरी टेबिल में दौड़ना शुरू कर देते हैं।
भारत में अवैज्ञानिक तरीकों से भण्डारण का प्रचलन खुद सरकारें करती हैं। खुले आसमान के नीचे कभी बोरों में या कभी यूं ही ढ़ेरों में पड़ा अनाज प्रायः सभी ने देखा है। एक आंकड़ा बताता है कि भारत में वार्षिक भण्डारण हानि लगभग 7000 करोड़ रुपए की होती है जिसमें 14 मिलियन टन खाद्यान्न बर्बाद होता है। अकेले कीटों से करीब 1300 करोड़ रुपए की हानि होती है।

विश्व बैंक की एक पुरानी रिपोर्ट बताती है की हमारे यहां 12 से 16 मिलियन टन अनाज भारत के एक तिहाई गरीबों का पेट भर सकता है। कीटों से हुए नुकसान का प्रतिशत 2 से 4.2 प्रतिशत है। इसके बाद चूहों के द्वार खाद्यान्न खाए जाने से 2.50 प्रतिशत, पक्षियों द्वारा 0.85 प्रतिशत तथा नमीं से खराब होने वाले खाद्यान्न का प्रतशत 0.68 है। अकेले हर वर्ष भारत के कुल गेहूं उत्पादन में से क़रीब 2 करोड़ टन गेहूं किसी न किसी तरह नष्ट हो जाता है। एक अध्ययन के अनुसार देश में करीब 93 हजार करोड़ रुपयों के अनाज की बर्बादी होती है।

यूं तो देश में भारतीय खाद्य निगम है जो इसी अधिनियम तहत वर्ष 1964 में बना और 1965 में स्थापित हुआ। तब देश में भीषण अन्न संकट विशेष रूप से गेहूं की कमीं के चलते इसकी जरूरत महसूस हुई। लेकिन इसके साथ ही किसानों के लिए लाभकारी मूल्य की सिफारिश के लिए 1965 में ही कृषि लागत एवं मूल्य आयोग यानी सीएसीपी का भी गठन किया गया। मकसद खाद्यान्न और दूसरे खाद्य पदार्थों की खरीदी, भण्डारण, परिवहन, वितरण और बिक्री करना रहा। लेकिन उससे बड़ा सच यह है कि देश भर में इनके खाद्य गोदाम को बनाने में तेजी नहीं आई। जो बनने थे उसी दौर में बन गए। धीरे-धीरे अनाज का बम्पर उत्पादन होने लगा। यहां तक सब ठीक है लेकिन जब सरकारी संकल्प के बावजूद काम में गति न आए तो हैरानी होती है।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2020-21 का बजट पेश करते समय किसानों के लिए 16 सूत्रीय फॉर्मूले की घोषणा की थी। इसमें वेयर हाउस और कोल्ड स्टोरेज की भी चर्चा थी। राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक नए नये वेयर हाउस बनायेगा और इसकी संख्या बढ़ाने के लिए पीपीपी मॉडल को अपनाया जायेगा। यहां तक कि ब्‍लॉक स्‍तर पर भंडार गृह बनाये जाने का प्रस्‍ताव भी था। लेकिन जमीन पर कुछ दिखा नहीं। दुर्भाग्य देखिए वर्ष 2017 में पीपीपी के तहत 100 लाख टन क्षमता के स्टील साइलो के निर्माण लक्ष्य रखा गया। परन्तु 31 मई 2019 तक केवल 6.75 लाख टन क्षमता के ही स्टील साइलो बने जिनमें मध्य प्रदेश में 4.5 लाख टन और पंजाब में 2.25 लाख टन की क्षमता वाले स्टील साइलो ही हैं।

इसका दूसरा पहलू भी सोचनीय है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत में 50 किलो प्रति व्यक्ति, प्रति वर्ष भोजन की बर्बादी होती है। भरपूर खाद्यान्न उत्पादन के बावजूद भारत वैश्विक भूख सूचकांक 2020 में सर्वाधिक भूख से पीड़ित देशों की सूची में भारत 94वें स्थान पर रहा और 27.2 अंकों के साथ ‘गंभीर श्रेणी में दर्ज किया गया। विडंबना देखिए देश की 14 प्रतिशत जनसंख्या कुपोषण का शिकार है! इससे भी ज्यादा दुखद यह कि हर वर्ष 25 करोड़ टन से ज्यादा खाद्यान्न की पैदावार के बावजूद यदि हर चौथा भारतीय भूखा सोए और 19 करोड़ लोगों को दोनों जून का खाना तक नसीब न हो तो इससे बड़ी बदनसीबी और क्या हो सकती है? एक और चौंकाने वाला सच भी सामने आया है

जिसमें अकेले खाद्य पदार्थों की बर्बादी से ग्रीनहाउस गैस में लगभग 8 प्रतिशत की वृद्धि हुई है यानी पर्यवारण के नुकसान में भी अनाज का सड़न का बड़ा योगदान है।

सवाल फिर वही कि देश में वेयर हाउसों खातिर सस्ती दर में सरकारी जमीन, ऋण व तमाम छूट, व्यवसायिक गारण्टी और दूसरी सरकारी राहतों के बावजूद जरूरत के हिसाब से बन क्यों नहीं पा रहे हैं? अनाज खुले में सड़ रहा है। इसके पीछे योजनाओं में दस्तावेजों के पुलिन्दों के साथ खानापूर्ति की ऐसी कठिन भरमार है जो साधारण लोगों के बस की नहीं। शायद यही कारण है कि वेयर हाउस किनके हैं, देखते ही माजरा समझ आने लगता है। यदि खास भण्डारण गृहों में आम किसान की पूछ परख होती तो क्या यही स्थिति होती? सवाल में ही जवाब छुपा है। ले देकर लुटा-पिटा भोला किसान उसके लिए आसान सरकारी संग्रहण या खरीदी केन्द्रों पर ही टूटता है। यहां भण्डारण से ज्यादा का स्टॉक होना ही है ताकि जगह की कमीं बताकर खुले में रखे जाने का खेल और बाद में एकाएक आई बारिश से सड़े अनाज की व्यथा-कथा और रहस्यों के बीच सरकारी धन के नाश और खुद के विकास का खेल हो सके। उसके बाद होता है कागजों में लाभ-हानि का खेल।

भरपूर पैदावर के बाद भी करोड़ों लोग भूखे पेट सो जाएं? काश जनता के अंशदान से बनें राष्ट्रीय राहत कोष से ही हर साल बरबाद होते राष्ट्रीय खाद्यान्न के लिए अत्याधिक उत्पादन वाले इलाके चिन्हित कर सरकारी भण्डारण गृहों की तात्कालिक व्यवस्था की पहल होती जो सिर्फ एक बार के ही निवेश मात्र से 100 वर्ष और आगे भी काम आते, आपदा में राहत का पिटारा भी बनते। खाद्यान्न भीगने, सड़ने या कीट, पक्षियों से जितनी क्षति एक साल में होती है, मात्र उतनी या थोड़ी कम-ज्यादा रकम लगाकर जरूरत के मुताबिक बड़े-बड़े व अत्याधुनिक संसाधनों से लैस गोदाम बन जाते! कई रोजगार सृजित हो जाते।

अनाज की रक्षा-सुरक्षा भी होती और अपने खून, पसीने को बहाकर उगाई फसल को सुरक्षित-संरक्षित देख किसान का चेहरा भी सुकून से भरा होता। उससे भी बड़ा सच यह कि देश के राजस्व की हर साल होने वाली सैकड़ों हजार करोड़ रुपयों की क्षति रुक जाती और समृध्द किसान, खुशहाल आवाम की परिकल्पना भी पूरी हो जाती। लेकिन सवाल फिर वही कि साधारण सी इस पहल के लिए गंभीर प्रयास करेगा कौन? जनप्रतिनिधियों, रुतबेदारों, रसूखदारों के चेहरों में वो भी तो बड़ी तादाद में दिखते हैं जिनके बड़े-बड़े भण्डारण और शीतगृह हैं, भरपूर छूट, मनमाफिक किराया और तमाम नामी-बेनामी सुविधाएं लेते हैं। लगता नहीं कि अनाज उगाता किसान और अनाज सड़ाती व्यवस्था ही हमारा सच है?

(इस आलेख में व्‍यक्‍‍त विचार लेखक के निजी अनुभव और निजी अभिव्‍यक्‍ति है। वेबदुनि‍या का इससे कोई संबंध नहीं है।)



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