प्यारा बचपन,निराले खेल [भाग 4] : घर में कैद बचपन को बताएं अपने बचपन के चटपटे खेल


आप सभी लोग स्वस्थ व सुरक्षित होंगे क्योंकि मास्क लगाना वेंटिलेटर लगाने से बेहतर है और हाथ धोना, जान से हाथ धोने से बेहतर। परिवार को आपकी और आपको परिवार की चिंता है और जरुरत भी। गर्मी बढ़ रही है। कोरोना का कहर भी जारी है..सभी लोग अपने अपने स्तर पर कोरोना को काबू करने का प्रयास कर ही रहे हैं।

पिछली कड़ी में हमने आवाजें करने व शोर-ध्वनि वाले खेल-खिलौने की बात की थी। मैं बता दूं जब यह बनाए जाते और घर के बड़े आराम करते होते / सोते होते तो भी, पर हमें तो खेलना होता तो हम जैसे ही इनसे खेलते, थोड़े समय तो सभी सहन करते फिर हमारे भी कुटाव हो जाया करते। फिर हम बजते थे। इसलिए इन बातों का भी ध्यान रखा जाए कि कब कौन से खेलों के बनाने व खेलने का समय है। वरना सारा का सारा रंग में भंग हो जाएगा।
आज अपन याद करते हैं गर्मी में कैसे पंखे बनाया करते थे। कागज का पंखा, पत्तों का पंखा, नाचता पंखा। इन्हें जितने बड़े पंखे बनाना हो उसी नाप का कागज लेते, डबल बनाना हो तो डबल नाप का कागज लेते। बारीक़ चुन्नट सी प्लेट बना कर उन्हें प्रेस करते हुए एक तरफ से कस देते दूसरी तरफ से फैला देते लीजिये पंखा बन गया।

इसे ही आगे से नुकीला कर देने से ये नाग के फन सा हो जाता। इसे ही मोर के पंख भी बना लेते। एक लम्बी सी पत्ती जैसी, कागज की भी हो सकती है, को किसी नुकीली सी चीज में पिरो या फंसा कर जैसे पेन्सिल, लीड, बारीक़ काड़ी आदि जिसमें इन्हें डाल कर तेज गति से घुमा सकें। इन्हें चलते पंखे / तेज हवा के बहाव के आगे रखने से बहुत मजा आता है।

ऐसे ही एक बराबर की, कागज की तीन पट्टियां एकदूसरे में पिरो कर इन्ही पर मतलब- नुकीली लम्बी वस्तु-पेन्सिल, काड़ी, पेन पॉइंट आदि में लगा कर घूमतीं तो बड़ा आनंद देतीं। पवन चक्की बनाना और उसको डंडियों में रंग बिरंगी कर के लगाना खुशियां देता। ये चकरियां तो आज भी फुग्गेवाले भैय्याओं के पास होतीं हैं। इनका मोह व आकर्षण आज भी उतना ही गहरा है जितना तब हुआ करता था।
ऐसे ही हाथों में ऊपर आसमान की ओर से रगड़ते हुए छोड़ने पर घूमती पंखड़ी कौन भूल सकता है? इनकी जगह अब प्लास्टिक की पंखड़ी ने भी ले लीं है। घूमती फिरकनी, कप सभी तो बन जाया करते थे। चूर्ण की बोतलों के रबर के ढक्कन में या कॉर्क के ढक्कन जिन्हें हम बुच कहा करते, कोई भी, माचिस की काड़ी को ढक्कन के बीचोंबीच घुसा देना और उसे घूमाना।

ऐसा आनंद किसी भी महंगे खिलौने में नहीं मिलता हमें जितना इन ‘सेल्फ हेंड मेड खिलौनों’ से मिलता। हां एक फायदा और रहा करता है इनमें कि ये आसानी से उपलब्ध साधनों से बन जाते, जेब व बस्ते, बेग में भी रखा जाते। जिससे ये हमेशा हमारे रहा करते। जब मन आया तब खेल लिया।
पतंगें भी हम तो घरों पर ही बना लिया करते। हम छोटे बच्चों के लिए रेक्टेंगल कागज को दोनों ओर से दो-दो इंच के करीब मोड़ लेते कोने में छेद कर के जोते बांध देते और डोरी से जोड़ देते। हवा के बहाव के साथ-साथ हमारी वो पतंग भी आकाश नापने को उत्सुक हो जाती। बिलकुल सीधी-सादी पतंग। कोई बनाने में झंझट नहीं। आज भी प्लास्टिक की थैली को हवा में उड़ाते हुए ऐसा ही आनंद आता है।

पर घरों में असली की पतंगे भी बनने में देरी नहीं होती। घर में ही आटे की ‘लेई’ तैयार होती। वैसे लेई और भी कई चीजों से जैसे- अरारोट, इमली के बीजे के आटे वगैरह की भी बनतीं। कई घरों में इनके कुंडे-कटोरे हमेशा तैयार रहते।एक दूसरे के घरों से मांग कर भी लाई जाती। पतंगे बांस की खिपच्चियों की सहायता से बनाई जाती। अलग-अलग रंग और साईज व सुंदर सुंदर लटकनों, फुन्दनों के साथ।
बात यहीं खत्म नहीं होती हम तो रेशे-रेशे से आनंद उठाने वालों में से रहे हैं। उस समय का बचपन ऐसा ही रहा करता था।अपने में मगन। तनाव रहित खुद में ही आनंदित। इन पतंगों के फट जाने पर हम इनके कागज की ‘टिग्गुल’बनाते। छोटे-छोटे गोल गोल काट कर इनमें छोटे-छोटे पत्थर रख कर उछालते तो पत्थर तेजी से नीचे आते पर वो रंग-बिरंगे गोल गोल कागज हवा में उड़ते, हिलते-डुलते इधर उधर बिखर जाते।

ऐसे ही इनके साथ रुमालों से हवाई छतरी भी बना डालते। रुमाल के चारों कोनों को सामान लम्बाई के धागों से बांध कर उन चारों को एक ही पत्थर से बांध लेना है। फिर इसे थोड़ी ऊंचाई से नीचे की ओर गिराएंगे तो रुमाल के कोने हवा में खुल जायेंगे और पत्थर के भार से वो धीरे धीरे हवाई छतरी की तरह ही नीचे की ओर झूमते हुए आएगा। पर इनमें अपना विवेक जरुर इस्तेमाल करना होता है। पत्थर कितना बड़ा होगा ये सामान्य ज्ञान से ही मालूम हो जाता है। वरना इनसे खुद व दूसरों के भी चोटिल होने की पूरी संभावना हो सकती है।
रॉकेट, जेट हवाई जहाज और हवाई जहाज तो आज भी खूब चलते हैं। अरे भाई, असल के तो हैं ही पर हम तो कागज की बात कर रहे। झूठ जो बोलेगा उसे कौव्वा काटेगा। क्योंकि वो तो कोई भोंदु राम ही होगा जिसने स्कूल/क्लास में ये न उड़ायें हों। नौकरी पर भी कभी कभी इन्हें मजे के लिए उड़ाया जाता है। इन्हें भूल ही नहीं सकते।

बलून में सीटी फिट करना, जादू से गुड़कने वाला केप्सूल भी याद आया? खाली केप्सूल के कव्हर /खोल में नाप का साईकिल का छर्रा डाल कर हथेली पर गुड़काने में कितना मजा आता था। चाहें तो इसे कागज-केप्सूल से भी तैयार कर सकते हैं। कई सारे एक साथ भी हाथों पर घूमा-घूमा कर जादू का खेल कह कर अपने से छोटों को खेल में रमा सकते हैं।
हमारे पास फाउंटेन पेन होते थे। जिनके ढक्कन में छोटा सा छेद होता। उस पर हम हलकी चीजें रख कर जोर से फूंक मरते तो वह हवा में लगातार ऊंची उठी रहतीं। हलके मोती, बोर या अन्य फलों की गुठलियां भी यही काम करतीं। पेन का ढक्कन न हो तो धागे की गट्टी की रील में भी छेद कर के एक और उंगली से हवा रोक लें तब भी इस खेल का मजा लिया जाता है।

लकड़ी की घिर्री से गाड़ी बनाना, धागे में पिरो कर ऊंचा-नीचा करने का खेल खेलना, गरगड़ी (कुएं में लगने वाली घिर्री के सामान) जैसे खेल कौन भूल सकता है भला? तीर-कमान, पतंगों की डंडियों से, पेड़ की टहनियों से जिसका आकर अंग्रेजी शब्द ‘वाय’ के समान हो और साईकिल के ट्यूब के टुकड़ों से भी गुलेल, गोफन बना लिए जाते। परन्तु इनसे भी खेलने के समय सावधानी जरुरी होती है। रबर बेंड में कागज के केप्सूल फंसा कर छोड़ना। पुराने इंजेक्शन की सिरिंज से झाड़ू की काड़ी के तीर बनाना और छोड़ना यही सब खेल हमें सदाबहार स्वर्गिक आनंद देते।
आज एक खेल आप खेल कर देखें जरुर मजा आएगा। यदि माचिस की डिब्बी हो तो उसमें, नहीं तो एक चूड़ी में रबर बेंड बीच में लगाएं। रबर बेंड के बीच के हिस्से में एक माचिस की काड़ी का टुकड़ा बल देते हुए घूमा कर कसें। यदि चूड़ी है तो उसे सावधानी से कागज की पुडिया में किसी चीज की पुडिया की तरह बांध लें हलके हाथों से। माचिस हो तो दराज बंद कर लें अब किसी से भी उसे खोलने के लिए कहें और उसकी प्रतिक्रिया देखें।

एक अजीब सी आवाज के साथ रबरबेंड में कसी माचिस की काड़ी अपने आपको बलबेटे से मुक्त करने में कागज या माचिस के खोखे से टकरा कर कम्पन पैदा करती है जिससे सामने वाला बुरी तरह चौंक जाता है। बस ध्यान रहे कि काड़ी अच्छे से कसी हो, उछल कर बाहर न आने पाए।
आज के लिए यहीं विराम। फिर मिलेंगे अगली कड़ी में। कुछ और खेलों के साथ।अपना और अपने प्रियजनों का ख्याल रखिए। साबुन से हाथ धोएं। बिना मास्क के बाहर न निकलें। बच्चों और बुजुर्गों की एहतियात रखिए। कोरोना से बचने के लिए दिए गए निर्देशों का सख्ती से पालन कीजिए। घर में रहिए, सुरक्षित रहिए।




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