‘आज़ादी’ की क्रांतिकारी लड़ाई का पहला ‘शंखनाद’

Last Updated: शनिवार, 18 सितम्बर 2021 (12:31 IST)
- नवीन जैन,
जो देश गुलाम हो जाता है, उसका चारों तरफ़ से पतन अवश्यंभावी हो जाता है। जन सामान्य के अधिकार दिन ब दिन खूंटी पर टांगे जाने लगते हैं। स्थिति यहां तक बिगड़ जाती है कि देश के आत्मसम्मान और गौरव की रोशन हवेली भरभराकर गिरने लगती है। कई झोलाछाप इतिहासकार पता नहीं तवारीख की तलछट को पूरा टटोलने की जहमत
क्यों नहीं उठाते।

बहरहाल, हुआ यह था कि पुणे के पास स्तिथ कस्बे चिंचवड में कीर्तन और भजनकार हरिपंत और लक्ष्मीबाई चापेकर के घर में क्रमशः तीन पुत्र दामोदर, बालकृष्ण और वासुदेव ने 1869 से लेकर 1880 के बीच जन्म लिया था। तीनों भाइयों को भजन कीर्तन के दौरान लोकमान्य बालगंगाधर तिलक, आगरकर के साथ अन्य विद्वानों के विचार घुट्टी में पीने को मिले। तीनों भाइयों को उक्त पंडि‍तों ने ज्ञान दिया कि जो लोग गणेश देवता और छत्रपति शिवाजी के श्लोक का मात्रा गान करते है, वह कोरा भांडपन है।

तिलकजी ने तीनों भाइयों से शिवाजी के पराक्रम के साथ गणेश देवता की विद्वता को सक्रिय जीवन में उतारने का आव्हान किया। तीनों भाइयों के लिए लोकमान्य बालगंगाधर तिलक गुरुओं के गुरू थे। तिलकजी ने ही सबसे पहले नारा दिया था- स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है, मैं इसे लेकर रहूंगा

इस नारे ओर अन्य विद्वानों ने भी चापेकर बंधुओं की में सोच में देश भक्ति और अंग्रेजों को जड़ों से उखाड़ फेंकने की आग भर दी थी।

इन तीनों भाइयों में दामोदर सबसे बड़े, बालकृष्ण उनके बाद और वासुदेव सबसे छोटे थे। ये आजादी के मतवाले वंदे मातरम का ओजस्वी गान किया करते थे, क्योंकि भजन कीर्तन में ये लोग अपने माता-पिता द्वारा बचपन में ही परिष्कृत कर दिए गए थे। बहुत कम लोग जानते होंगे कि हैं कि तिलक कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे और तब पाकिस्तान के बाद में संस्थापक बने मोहम्मद अली जिन्नाह उनके सेकेट्री थे।

तिलक न सिर्फ भारतीय असंतोष के पहले उग्र प्रतिनिधि थे, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कई पुस्तकों के लेखक प्रखर गणितज्ञ संस्कृत मराठी ओर अंग्रेजी के उदभट विद्वान विकल्पहीन मराठी और अंग्रेजी के उग्र पत्रकार तथा नामी वकील भी थे। वे अंग्रेजी के प्राध्यापक भी रहे।

जो लोग स्वतंत्रता के इतिहास की गहरी तमीज़ रखते हैं, वे कदाचित अच्छे से जानते होंगे कि 15 अगस्त 1947 को जब पूरा देश आज़ादी का जश्न मना रहा था, तब राष्ट्र पिता महात्मा गांधी और लौह पुरूष
सरदार वल्लभ भाई पटेल उक्त जश्न से दूर थे।

उन्हें बेचैनी खाए जा रही थी कि अभी तो देश अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त हुआ है। देश को स्वराज मिलना तो बाक़ी है। इसी स्वराज की वक़ालत सबसे पहले लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने की थी, जिससे आलोड़ित होकर चापेकर बंधुओं ने अपने कुछ साथियों के साथ चापेकर क्लब गठित कर लिया था।

इस क्लब की अगुवाई में पुणे में शिवाजी उत्सव और गणेश उत्सव व्यापक तौर पर मनाए जाने लगे। मध्यप्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर में तो पुणे की तरह गणेश उत्सव आज भी मनाया जाता है, लेकिन कम ही लोग जानते होंगे कि पाकिस्तान के कराची, पेशावर और पंजाब में भी गणेश उत्सव मिल-जुलकर पूरे ठाठ-बाठ से मनाया जाता है।

इसके पीछे तिलक की मूल भावना सम्पूर्ण समाज को अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट करने की तो थी ही, वे यह भी जानते थे कि मनुष्य सामाजिक प्राणी होने के नाते उत्सवधर्मी होता है। पुणे और आसपास के इलाकों में कोविड-19 की तरह 1897 की पेंडमेमिक फैली, जिसका नाम था प्लेग उर्फ़ ब्लैक डेथ।

यह महामारी भी चीन के वुहान प्रांत से ही आई थी, लेकिन तब इसका वेक्सीन या इंजेक्शन विकसित नहीं हो पाया था। उक्त बीमारी भी अल्प प्रलय जैसी थी, क्योंकि इससे डर के पुणे शहर की आधी आबादी पलायन कर गई थी, इसके संक्रमण से लाशें बिछ गईं थी। पुणे के तत्कालीन अंग्रेज सहायक कलेक्टर डब्ल्यू. सी. रेंड और उनके सुरक्षा अधिकारी लेफ्टीनेंट आर्येस्ट ने हालात सुधारने की बजाय बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

काले गोरे सिपाहियों को आदेश दिया गया कि लोगों के बर्तन भाण्डे बाहर फेंक दो। ये सैनिक मंदिरों में जूते पहनकर घुसे और देवी-देवताओं का अपमान किया।

बलात्कार के समाचार भी आने लगे। तत्कालीन समाज सेविका रमाबाई ने डटकर इन अत्याचारों का विरोध किया। स्थिति और बिगड़ती चली गई। स्वस्थ लोगों को सुरक्षित स्थानों पर नहीं भेजा गया। लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने चापेकर बंधुओं को आव्हान किया कि- अपने इन देशवासियों के आंसू, उदास, उजड़े, क्लांत चेहरे देखकर तुम्हारी सिट्टी पिट्टी क्यों गुम हो गई है? या तो उक्त दोनों अफसरों को सबक सिखाओ या शर्म से डूब मरो

चापेकर बंधुओं ने एक योजना बनाई। 22 जून 1897 की रात का तयशुदा वक्त आ गया और वह था 12 बजकर 10 मिनट। इसी समय गवर्नमेंट हाउस (अब सावित्रीबाई फुले विश्वविद्यालय,पुणे) को महारानी विक्टोरिया की हीरक जयंती के जश्न में शामिल होकर डब्ल्यू.सी.रेंड और उनके पीछे लेफ्टिनेंट आर्येस्ट अलग- अलग बग्घियों में सवार होकर आराम फरमाने लौट रहे थे, लेकिन वे उन्हें नहीं मालूम था कि वे मौत के सफ़र पर निकले हैं।

अचानक गगनभेदी आवाज़ गूंजी। मराठी भाषा में यह वाक्य था, गोंडिया आला रे, आला यानी गोंडिया आ गया। सबसे बड़े भाई दामोदर चापेकर ने अंधेरे में दौड़ते हुए लेफ्टिनेंट आर्येस्ट की बग्घी का पीछा किया और किसी को कुछ पता चले उसके पहले ही आर्येस्ट का काम तमाम कर दिया। सबसे छोटे भाई वासुदेव ने दामोदर के साथ मिलकर रेंड को गोलियों मारीं। तीन दिन बाद घायल रेंड भी जाते रहे। चापेकर बंधु अजनबी पगडंडी से लापता हो गए, लेकिन घर के भेदियो ने ही लंका ढहा दी।

जब अंग्रेजों ने चापेकर बंधुओं के सुराग देने वाले को रुपए बीस हज़ार का पुरस्कार देने की घोषणा की तो उनके ही साथी द्रविड बंधुओं का ईमान बिक गया। सुराग देने पर दामोदर मुंबई में पकड़ लिए गए। उनके इकबाल ए जुर्म पर उन्हें 19 अप्रैल 1899 को फांसी दे गई। अंतिम समय दामोदर चापेकर के हाथों में श्रीमद्भगवद्गीता की प्रति थी।

इसी सुराग के आधार पर बालकृष्ण चापेकर की गिरफ्तारी भी हो गई। सबसे छोटे वासुदेव चापेकर ने मां से पूछा- अब मैं क्या करूं? आदेश दीजिए ’ मां ने नज़र उतारीं और कहा, तुम्हें भी वही करना है, जो तुम्हारे दो बड़े भाइयों ने किया। जाओ

सुखदेव ने मां के चरणों की धूल भाल पर मली। अपनी पिस्तौल टटोली। फिर अपने विश्वस्त रानडे के साथ पता लगाया कि गणेश शंकर और रामचंद्र द्रविड है कहां।

एक दिन रात में सुराग मिल गया। दोनों को धोखे से बाहर बुलाया गया और कुछ पलों में द्रविड बंधुओं के शव जमीन पर थे। सुखदेव अपने साथियों सहित लापता भी हो सकते थे, लेकिन यह सुनकर कि उनके रिश्तेदार पुलिस द्वारा परेशान किया जा रहा है, सभी ने पुणे के पुलिस स्टेशन में जाकर अपने-अपने तमंचे हवाले कर दिए। उनके साथ रानडे भी थे। इन लोगों का रास्ता पुणे की यरवदा जेल के फांसी के फंदे देख रहे थे। इन सूलियों की तारीख तय की गई 8 मई 1899।

लाल, बाल और पाल में से शहीद हुए लाला लाजपत राय ने संवेदनाएं इन शब्दों में व्यक्त की कि आज़ादी की क्रांतिकारी लड़ाई की पहला शंखनाद हो गया, जिसे धमाका बिगुल या डंक भी कहा जा सकता है।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)



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