रोचक अंदाज में 'मीडिया लाइव'

पुनः संशोधित शनिवार, 27 दिसंबर 2014 (11:46 IST)
वर्ष 2014 में मीडिया पर भी काफी काफी लिखा गया। अन्य लेखकों के साथ ही मीडिया वालों ने भी मीडिया पर लिखा। IBN 7 के अंनत विजय बता रहे हैं 2014 की एक खास पुस्तक के बारे में, जिसने उन्हें प्रभावित किया।
 
रत्नेश्वरसिंह अपनी पुस्तक 'मीडिया लाइव' में ने इलेक्ट्रानिक मीडिया यानी टेलीविजन, रेडियो और बेवसाइट्स को एतिहासिकता में परखते हुए वर्तमान स्थिति को दिखाया है। ऐतिहासिकता इस वजह से कि रत्नेश्वर कई स्थियों को पौराणिकता से जोड़कर देखते हैं। अपनी किताब में एक जगह लेखक कहता है– भारतीय सभ्यता विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है। आज के सभी बड़े वैज्ञानिक आविष्कार की प्रायोगिक कहानियां पहले से ही भारतीय साहित्य में उपलब्ध हैं। इस संदर्भ में रत्नेश्वर कालिदास के मेघदूत का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि वो अपनी प्रेयसी तक संदेश पहुंचाने के लिए मेघ को दूत बनाते हैं। लेखक बेहद रोचक तरीके से उसको वैज्ञानिक संदर्भ से जोड़ते हैं– हवा दिखाई नहीं देती, इसलिए कालिदास ने मेघ को अपने संदेशों को भेजने का माध्यम बनाया, पर मेघ को दिशा देकर बहा ले जाने वाली हवा ही महत्वपूर्ण थी। सबसे पहले जगदीश बोस ने इसे वैज्ञानिक प्रस्तुति दी। इस तरह के संदर्भ इस किताब को बाजार में मौजूद अन्य किताबों से अलहदा स्थान दिलाते हैं।
 
करीबन सवा दो सौ पन्नो की यह किताब हिंदी में मीडिया सैद्धांतिकी की एक अलग किस्म की किताब है जिसमें लेखक इलेक्ट्रानिक मीडिया की कई स्थितियों और शब्दों की सरल परिभाषा भी गढ़ता है। जैसै लेखक पत्रकारिता को परिभाषित करते हुए कहता है- आमजन तक एक उत्तरदायी प्रक्रिया के तहत नवीन सूचनाएं और विचार पहुंचाने की हर कोशिश पत्रकारिता है। उसी तरह से इलेक्ट्रानिक मीडिया के लिए रत्नेश्वर यह परिभाषा गढ़ते हैं– ध्वनि और विद्युत चुम्बकीय तरंगों के परवर्ती माध्यम एवं यंत्रों को अभिव्यक्ति का माध्यम बनाना इलेक्ट्रानिक मीडिया है और इसी माध्यम का पत्रकारिक इस्तेमाल इलेक्ट्रानिक पत्रकारिता है। इस तरह की परिभाषाएं इलेक्ट्रानिक मीडिया के अध्येताओं के लिए बेहद उपयोगी हैं। 
 
इस पुस्तक में भारत में टेलीविजन के इतिहास और विकास और उनके संवाहकों के योगदान को साथ साथ याद किया है। दूरदर्शन से लेकर तमाम निजी चैनलों के इतिहास और विकास को रेखांकित किया गया है। इस किताब में रत्नेश्वर ने न्यूज चैनल की प्रमुख हस्तियों के बारे में भी संक्षिप्त पर महत्वपूर्ण जानकारी दी है। भारत में निजी चैनल के विकास पर लिखते हुए रत्नेश्वर से एक बड़ी चूक यह हुई कि उन्होंने आजतक के आधार स्तंभ कमर वहीद नकवी को भुला दिया। कमर वहीद नकवी ने ना सिर्फ आधुनिक भारतीय हिंदी टेलीविजन की भाषा गढ़ी बल्कि कई ऐसे जुमले दिए जो तकरीबन डेढ़ दशक बाद भी खबरिया चैनलों में इस्तेमाल हो रहे हैं।
 
नकवी के योगदान को याद किया जाना चाहिए था। दूसरे इस किताब की खास बात यह है कि लेखक ने न्यूज चैनलों में समय बिताकर, वहां की संपादकीय बैठकों में हिस्सा लेकर, वहां होने वाले कामों को देखकर और महसूस कर फिर उसको लिखा है, जिससे स्थितियां प्रामाणिक हो जाती हैं। न्यूज चैनलों के क्रियाकलापों के अलावा रत्नेश्वर ने रेडियो पर भी विस्तार से लिखा है। किस तरह से भारत में रेडियो शुरू हुआ और फिर उसके निजी एफएम चैनल तक के सफर और कामकाज के तरीकों को समेटते हुए टिप्पणियां हैं।
 
टेलीविजन और रेडियो पर फोकस रखते हुए स्क्रिप्ट लेखन से लेकर अन्य तकनीकी आवश्कताओं के बारे में बताया गया है। इस किताब का एक छोटा हिस्सा बेवसाइट के इतिहास और विकास का भी है। इसके अलावा किताब के अंत में रत्नेश्वर की गढ़ी हुई परिभाषाएं हैं जो काफी उपयोगी हैं और संभव है कि आने वाले दिनों में ये परिभाषाएं लोकप्रिय हो जाएं। इलेक्ट्रानिक मीडिया पर सैद्धांतिक लेखन के इस जोखिम भरे काम का निर्वाह रत्नेशवर ने बेहतर तरीके से किया है। रत्नेशवर के कहानीकार होने का फायदा यह हुआ है कि सैद्धांतिकी भी किस्सागोई के अंदाज में कही गई है जिससे पाठकों को बोरियत नहीं होती है। उनका यह काम इलेक्ट्रानिक मीडिया की कार्यप्रणाली और उसके बदलते स्वरूप को समझने में मददगार साबित होगा। अखबार पर रत्नेश्वर की एक किताब- 'समाचार एक दृष्टि' प्रकाशित हो चुकी है। अब मीडिया लाइव के प्रकाशन के बाद लेखक ने पूरे मीडिया को समेटने का काम संपन्न कर लिया है।



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