वेब पत्रकारिता : नए जमाने का यंग मीडिया

-कमल शर्मा

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यद्यपि, उन दिनों अखबारों में बिजनेस खबरें काफी कम हुआ करती थीं एवं शेयर बाजार और कृषि बाजारों के भाव ही अखबारों में प्रमुखता से प्रकाशित होते थे। लेकिन, जून 1991 में केंद्र में कांग्रेस की सरकार बनी और इसकी कमान पीवी नरसिम्हाम राव ने संभाली। वित्त मंत्री मनमोहनसिंह बने। इस सरकार ने देश में आर्थिक सुधारों की शुरुआत की। इन सुधारों का कितना अनुकूल असर पड़ा और ये कितने प्रतिकूल रहे, मैं इसकी तह में इस समय नहीं जाना चाहता लेकिन इस सरकार के आने के साथ देश भर के अखबारों में बिजनेस खबरें पहले पेज पर आने लगी एवं राजनीतिक खबरों की अहमियत धीरे-धीरे कम होने लगी। टीवी चैनलों ने भी बिजनेस खबरों के बुलेटिन शुरू किए एवं आम जन भी आर्थिक आंकडों की बातें करने लगा। मीडिया घरानों में बिजनेस पत्रकारों की तेजी से मांग बढ़ी एवं वेतन भी अन्यत विद्या जानने वाले पत्रकारों से ज्यादा मिलने लगा।

इसी तरह दूसरा फैसला मैंने अपने करियर में वर्ष 1997 में लिया एवं भारत में आए नए मीडिया जिसे वेब मीडिया के नाम से पुकारा गया, में जुड़ने का मौका मिला। उस समय तीन वेबदुनिया, रीडिफ और इंडियाइंफो ने खबरों को इंटरनेट के माध्यम से जनता तक पहुंचाने की शुरुआत की। मैं इंडियाइंफो डॉट कॉम से कंटेंट मैनेजर के रूप में जुड़ा। उस
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समय भी अनेक मित्रों ने कहा कि भारत में इंटरनेट कनेक्शन गिने चुने हैं और काफी कम लोगों के पास ही कंप्यूटर है। ऊपर से यह माध्यम बिल्कुल नया है, अखबार और टीवी चैनलों के रहते इसकी सफलता बेहद मुश्किल जान पड़ती है। क्यों इस तरह की रिस्क लेना चाहते हो। लेकिन, मेरा यह मानना था कि यही रास्ता ऐसा है जो समाचारों और विचारों को आने वाले समय में समूचे विश्व तक पहुंचा सकता है। यद्यपि, वर्ष 2000 की शुरुआत में डॉट कॉम बबल फटा एवं मीडिया के इस नए चेहरे का रंग बदरंग हुआ। लेकिन, अनेक साहसी इसकी अहमियत को पहचानते थे और कठिनाइयों से उबरते हुए फिर से इसने अपनी जगह बनाई एवं आज हम जीवन में इस मीडिया के बढ़े महत्व को नजरअंदाज नहीं कर सकते। इस मीडिया के महत्व को हमें जानने के लिए कुछ पहलुओं को देखना होगा।


लागत : वेब मीडिया जिसे हम न्यूज मीडिया भी कहते हैं, प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का सबसे उम्दा विकल्प है। एक टीवी चैनल की शुरुआत के लिए लाइसेंस फीस, नेटवर्थ, परफोरमेंस बैंक गारंटी, अपलिंकिंग शुल्क, हर एक भाषा के लिए अलग से शुल्क, मशीनरी, स्टूडियो, स्टॉफ का खर्चा, वितरण एवं संचालन के अन्यक खर्च इतनी बड़ी राशि होती है जिसे वहन करना हर किसी के बूते की बात नहीं है। ऐसा ही खर्च एक रेडियो स्टेशन स्थापित करने पर भी आता है। अखबार की बात करें तो वहां छोटे या स्थानीय स्तरर पर किए गए प्रयास में पैसा कुछ कम लगता है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर या राज्य स्तर पर की गई शुरुआत काफी महंगी बैठती है। मीडिया के इन माध्यमों में बड़ी धनराशि खर्च करने के बाद भी यह तय नहीं है कि पहुंच जन-जन तक हो, अथवा सीमांत और दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुंच बन पाए। जबकि, न्यूज मीडिया में ऐसा नहीं है। इस क्षेत्र में लागत कुछ हजार ही रहती है। अपनी इच्छा के नाम के साथ मामूली फीस अदाकर सिर्फ एक कंप्यूटर, कैमरा, स्कैनर, इंटरनेट कनेक्शन और सर्वर स्पेस के साथ इसकी शुरुआत कर सकते हैं। लंबे चौड़े आफिस स्पेस की कतई जरूरत नहीं है। लेकिन आपकी पहुंच समूची दुनिया तक होगी, इसकी गारंटी है जो अन्य मीडिया माध्यमों के साथ नहीं है।

बढ़ती अहमियत : मौजूदा स्थिति को देखें तो दुनिया के हरेक मीडिया हाउस ने यह मान लिया है कि बगैर वेब में गए उनका उद्धार नहीं हैं। हमारे देश में इसका जिस तेज गति से विस्तार हो रहा है उसे देखते हुए अगले दो से तीन साल बाद किसी भी अखबार, टीवी चैनल का मुख्य चेहरा यही होगा। मैं दो साल पहले एक राष्ट्रीय अखबार के संपादकीय हैड से मिला था। उनका कहना था कि हम अब केवल प्रिंट माध्यम का काम जानने वालों को नौकरी नहीं दे रहे। अब हम न्यूज लिखने की कला के अलावा कैमरे का उपयोग करने में निपुण और वेब माध्यम की आवश्यकताओं को समझने वाले मीडियाकर्मियों की ही भर्ती कर रहे हैं। हमारा लक्ष्य वर्ष 2015 में अखबार के बजाय वेब के जरिये लोगों तक पहुंचना है। बदले समय और बदली रुचि में हरेक अखबार, टीवी चैनल की यह जरूरत बन गई है कि सारी खबरों को टैक्स्ट के अलावा ऑडियो-वीडियो फार्म में वेब पर लाया जाए। बदले माहौल में खासकर युवाओं के पास कतई समय नहीं है कि वे अखबार को बैठकर पढ़ें या टीवी के सामने सभी कामधाम छोड़कर न्यूज जानने के लिए बैठ रहें और अपनी पसंद की खबरों के आने तक इंतजार करें। वर्ष 2020 तक देश की 64 फीसदी जनसंख्या कामकाजी वर्ग की होगी जिसका मकसद कम समय में तेजी से सूचनाएं जानना होगा। वेब में आप जब जी चाहे और जो पसंदीदा खबर हो उसे देख सकते हैं जबकि टीवी में एक खबर के बाद ही दूसरी खबर को आने में वक्त लगता है और इस बीच विज्ञापन आ जाए तो अगली खबर में काफी देरी हो जाती है।

मोबाइल से आई जोरदार क्रांति : भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में सबसे बड़ी क्रांति एटीएम (ऑटोमैटिक टेलर मशीन) मशीन के आने से हुई एवं बैंकिंग जगत को जो चेहरा बदला उसकी कल्पना इससे पहले शायद ही किसी ने की होगी जब हर आदमी अपने वित्तीय लेनदेन के लिए बैंक की शाखा खुलने का इंतजार करता रहता था। ठीक इसी तरह, न्यूज मीडिया में जोरदार क्रांति का जनक मोबाइल को माना जा सकता है। मोबाइल खासकर स्मार्ट फोन के आने के बाद लोगों की आदतों में तेजी से बदलाव आया और इंटरनेट कनेक्शन के माध्येम से वे चलते फिरते, आफिस में काम करते अथवा कहीं भी, कभी भी समाचार जान सकते हैं, अपने मनपसंदीदा कार्यक्रम को देख या सुन सकते हैं। इस सच से कोई इनकार नहीं कर सकता कि शहरों, कस्बों और गांवों तक मोबाइल ने अपनी पहुंच बना ली है। सस्ते स्मार्ट फोन आपको आबादी के बड़े हिस्से के हाथों में देखने को मिल जाएंगे। यद्यपि, हमारे देश में बिजली एक बड़ी समस्या है जिसकी वजह से हर समय टीवी देख पाने में दिक्कत आती है। आजादी के इतने साल बीत जाने के बावजूद खराब परिवहन व्यवस्था की वजह से कई कई गांवों तक अखबार नहीं पहुंच पाए हैं लेकिन मोबाइल, टेबलेट और नेटबुक ने अपनी पहुंच बनाकर लोगों को खबरों के संसार से जोड़ दिया है। इस तरह, वेब मीडिया प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक पर भारी पड़ता जा रहा है।

पहुंच और संवाद : एक अखबार, टीवी चैनल या रेडियो स्टेशन की पहुंच की एक सीमा होती है और वह क्षेत्र विशेष में ही अपनी पहुंच बना पाते हैं जबकि वेब मीडिया में ऐसा नहीं है। आप दुनिया के किसी भी कोने में रहे लेकिन मनचाही सूचनाओं को वहीं पा सकते हैं। मसलन आप मध्यप्रदेश के रहने वाले हैं, लेकिन आप केरल में हैं तो संभव है आपको आपके क्षेत्र की सूचनाएं वहां किसी अखबार या टीवी चैनल पर न मिले लेकिन वेब मीडिया ने इस समस्या को दूर कर दिया है। अपने देश से बाहर रहते हुए भी आप वेब मीडिया की बदौलत अपने को उन सभी खबरों से अपडेट रख सकते हैं जो आप चाहते हैं। अनेक लोगों को यह भ्रम है कि जिस तरह अखबार खरीदने या टीवी चैनल को देखने के लिए शुल्क अदा करना होता है वैसा वेब में नहीं है। लेकिन मैं आपको यह बता दूं कि वेब मीडिया में आपको हर सूचना मुफ्त में नहीं मिलती। अनेक वेब साइट्‍स अपने पाठकों से रिसर्च रिपोर्ट, अहम आंकड़े उपलब्ध कराने के बदले शुल्क वसूल करती हैं।

अखबार तक आम आदमी को बात पहुंचाने के लिए पत्र लिखने होते हैं या ईमेल करने होते हैं जिसके सही समय पर प्रकाशन की कोई गारंटी नहीं है। टीवी चैनल तो केवल अपनी बात ही कहते हैं वहां अपने दर्शकों से सीधे फीडबैक की कोई सुविधा नहीं है जबकि वेब मीडिया में आप किसी समाचार को पढ़ने या कार्यक्रम को देखने के बाद तत्काल अपनी टिप्पणी दे सकते हैं और वह उसी समय प्रकाशित हो जाती है। यह माध्यम सीधे अपने यूजर्स से संवाद स्थापित करता है जिसकी वजह से यूजर स्वयं रिपोर्टर की भूमिका निभा सकता है। यूजर अपने आसपास घटने वाली घटनाओं की जानकारी तत्काल वीडियो, ऑडियो या टैक्स्ट के माध्यरम से संपादक या उसके सहयोगियों को दे सकता है एवं समूची दुनिया इसे जान सकती है।
आईआईएमसी से पत्रकारिता की पढ़ाई के बाद 1988 में जब मैंने अपने करियर की शुरुआत की थी तब बिजनेस जर्नलिज्म से जुड़ने का फैसला किया था। उस समय अनेक दिग्गज पत्रकारों ने मेरे इस विचार को सही न ठहराते हुए राजनीतिक पत्रकारिता में अपना करियर बनाने की सलाह दी थी। लेकिन, मेरा यह मानना था कि देश में आर्थिक प्रगति का चक्र जब तेज गति से दौड़ना शुरू करेगा, वह समय बिजनेस पत्रकारिता का होगा एवं उस समय तक अपने को तैयार कर चुके बिजनेस पत्रकारों की अहमियत बढ़ेगी। अपने निर्णय पर दृढ़ रहते हुए मैंने सभी सीनियर की सलाह को न मानते हुए अपना करियर बिजनेस पत्रकार के रूप में ही बनाने का फैसला किया।

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