गंगा बहती हो क्यों..?

-ओमप्रकाश दास

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वैसे तो राजीव गांधी ने गंगा एक्शन प्लान ने 20 हज़ार करोड़ खर्च करके भी गंगा को निर्मल तो क्या अविरल तक न बना पाए। ऐसी नदी जो कुल मिलाकर 50 करोड़ लोगों को सीधे प्रभावित करती हो और बाकी के 50 करोड़ लोगों को आध्यात्मिक स्तर पर भिगोती हो, उसकी हालत दिन-ब-दिन ख़राब होना धीमे-धीमे मुद्दे को ज्वलंत बनाता गया।

गंगोत्री से लेकर गंगा सागर तक गंगा में हर 500 किलोमीटर पर समस्याओं का रूप बदल जाता है, तो समाधान भी तो बदलेगें ही। अगर गंगा पथ पर यात्रा करें तो साफ पता चलता है कि कानपुर तक आते आते गंगा का 90 फीसदी पानी, टिहरी बांध, भीमगौड़ा बराज, नरौरा का बराज जैसे अवरोधों के कारण बंट जाता है। कानपुर में अगर गंगा का पानी काला दिखता है तो इसका यही कारण है कि यहां तक गंगा का पानी नहीं बल्कि शहरों-कारखानों का पानी आपको दिखता है। बाकी की 10 फीसदी गंगा जैसे तैसे आगे बढ़ती सहायक नदियों के पानी से जीवन पाती बनारस पहुंचते-पहुंचते हांफने लगती है।

मैंने बिहार में गंगा के सफर में देखा कि हांफती नदी मां गंगा सरकने लगती है। जिसे थोड़ा जीवन तब मिलता है जब गंडक, सोन और पुनपुन जैसी नदियां गंगा में समाहित हो जाती हैं। तथ्य ये है कि गंगा और उसकी सहायक नदियां दुनिया के सारी नदियों के मुकाबले सबसे ज्यादा गाद यानी सिल्ट अपने साथ हिमालय के लेकर मैदानों में जमा करती हैं, लगभग 4 फीसदी। पूरी दुनिया की नदियों के मुकाबले 4 फीसदी का आंकड़ा काफी ज्यादा है। ये आंकड़ा बढ़ेगा, क्योंकि हिमालय में मिट्टी को जकड़कर रखने की क्षमता कम हो रही है, मनुष्य की जरूरतों के कारण पेड़ों की कटाई हो या हिमालय में लगातार होती भूगर्भीय हलचल। हिमालय के कई हिस्से अभी भी निर्माण के दौर से गुज़र रहे हैं। हालांकि बिहार में जानकार कहते हैं कि गाद तो गंगा हज़ारों सालों से ढो रही है, लेकिन गंगा में पानी की कमी उस गाद को आगे बंगाल की खाड़ी तक नहीं पहुंचा पाती।
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पटना जैसे महानगर में गंगा किनारों से 4 किमी तक दूर हो गई है, मुख्यधारा के दर्शन करने के लिए तो और ज्यादा सफर करना होगा। पटना से आगे बढ़ते ही गंगा के शोषण का नायाब रुप दिखता है, सैकड़ों की संख्या में ईंट भट्टे जिनकी संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। स्थानीय लोग बताते हैं कि ये एक बड़ी मिलीभगत का फल है, क्योंकि सूखते गंगा के पानी और मिट्टी का बेधड़क इस्तेमाल बीमारी बढ़ा रहा है। लेकिन इस सूखती नदी के जरा आर्थिक पहलू पर नज़र डालिए। मछुआरे दिन-ब-दिन बदहाली की ओर जा रहे हैं। क्योंकि पानी कम तो मछली कम, प्रदूषण ज्यादा तो मछलियों की प्रजातियां कम।

पटना के डॉल्फिन मैन कहे जाने वाले प्रो. आरके सिन्हा बताते हैं कि मछलियों की प्रजाति तो 50 फीसदी तक कम हो चुकी है। भागलपुर और कहलगांव के मछुआरों ने मुझे बताया कि 20 साल पहले जितनी मछलियां दो-तीन घंटों में पकड़ में आ जाया करती थीं वो अब दिन भर में भी नहीं मिल पातीं। समस्या सिर्फ इतनी नहीं, अब रोज़ी रोटी के दबाव ने छोटी या नवजात मछलियों को पकड़ने पर मजबूर कर दिया है, यानी जब मछली बड़ी होगी ही नहीं तो मिलेगी कैसे। भागलपुर के एक मछुआरे राजा सैनी कहते हैं कि उनके इलाके वाले कई लोग अब गुजरात, राजस्थान, दिल्ली और पंजाब में मज़दूरी के लिए चले गए हैं।

राजा कहते हैं कि वो भी छोटी मछलियों को मारकर ही ज़िंदा हैं, लेकिन, बिहार में मोकामा और उससे पहले से ही जानकार-विशेषज्ञ सिल्ट यानी गाद की समस्या के लिए पश्चिम बंगाल के फरक्का बराज पर निशाना साधने लगते हैं। कहा जाता है कि 1971 में बने इस बराज ने अकेले ही गाद को आगे बढ़ने पर रोक दिया है, इस बढ़ती गाद ने सिर्फ नदी की गहराई ही नहीं कम की बल्कि इसने गंगा की तलहटी पर पैदा होने वाले उस शैवाल को भी ढंक दिया जो प्रकाश-संशलेषण के कारण गंगा को ऑक्सीज़न मुहैया कराती थी तो गंगा की क्षमता से ज्यादा प्रदूषण बैक्टीरियोफाज नामक सफाई के लिए ज़िम्मेदार बैक्टीरिया की क्षमता को ख़त्म कर रहा है। नतीजा यह हुआ की गंगा जो ख़ुद को साफ करती थी, उस आत्मशुद्धि की क्षमता ख़त्म हो रही है।
WD|
नदियां और सभ्यता संस्कृति के बीच संबंधों को लेकर सबने कुछ न कुछ जरूर पढ़ा-सुना होगा। स्कूलों में तो भूगोल कि किताबों में बार-बार गंगा का मैदान पढ़ने को मिला था और पटना का होने के नाते मैं थोड़ा बहुत समझ भी पाता था। उत्तर बिहार में तो नदियों का जाल उसकी मिट्टी से बनते मैदान तो अनुभव को हर साल सींचते रहे थे। लेकिन जब गंगा को लेकर पिछले 5 सालों में ख़ासकर जब गंगा रिवर बेसिन अथॉरिटी (2009) बनी तो राष्ट्रीय स्तर पर कुछ-कुछ फोकस बनने लगा था, इस बीच कई आंदोलन भी सामने आए।

बंगाल में तो विनाश की अलग ही लीला है... पढ़ें अगले पेज पर....




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