सिवनी मॉब लिंचिंग से क्यों बैकफुट पर भाजपा?, आदिवासी वोट बैंक के चुनावी कनेक्शन की पढ़ें Inside Story

Author विकास सिंह| पुनः संशोधित बुधवार, 4 मई 2022 (16:45 IST)
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भोपाल। मध्यप्रदेश में 2023 विधानसभा चुनाव से पहले आदिवासी वोटरों को रिझाने के लिए शिवराज सरकार एड़ी-चोटी का जोर लगाए हुए है। आदिवासी वोट बैंक को अपने साथ लाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की मौजदूगी में पार्टी राजधानी भोपाल से लेकर जबलपुर तक पिछले दिनों बड़े कार्यक्रम कर चुकी है। सितंबर में गृहमंत्री अमित शाह जबलपुर में आदिवासी नेता शंकर शाह और रघुनाथ शाह के बलिदान दिवस के कार्यक्रम में शामिल हुए थे तो नवंबर में राजधानी भोपाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजदूगी में भाजपा ने जनजाति गौरव दिवस का भव्य कार्यक्रम किया। ऐसे में अब जब मध्यप्रदेश चुनावी मोड में आ रह था तब सिवनी के कुरई थाना इलाके के सिमारिया गांव में दो आदिवासी ग्रामीण की पीट-पीटकर हत्या (मॉब लिंचिंग) को लेकर कई सियासत गर्मा गई है।

सिवनी घटना के विरोध में ने राज्यपाल को पत्र लिखते हुए जिम्मेदार संगठनों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। वहीं पार्टी ने घटना की जांच के लिए अपने तीन आदिवासी

विधायक ओंकार सिंह मरकाम, अशोक मर्सकोले और नारायण पट्टा को लेकर कमेटी बना दी है जो सिवनी पहुंचकर पूरे मामले की जांच करेगी। वहीं प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने सरकार को घेरते हुए ट्वीट करते हुए लिखा कि सिवनी ज़िले के आदिवासी ब्लॉक कुरई में दो आदिवासी युवकों की निर्मम हत्या किये जाने की बेहद दुखद जानकारी मिली है।‌ इस घटना में एक आदिवासी युवक गंभीर रूप से घायल है। प्रदेश में आदिवासी वर्ग के साथ दमन व उत्पीड़न की घटनाएँ रुक नही रही है। हमने इसके पूर्व नेमावर , खरगोन व खंडवा की घटनाएँ भी देखी है। आरोपियों के भाजपा से जुड़े होने की जानकारी भी सामने आयी थी। इस घटना में भी आरोपियों के भाजपा से जुड़े कनेक्शन की बात सामने आ रही है।
आदिवासी वोट बैंक चुनाव में गेमचेंजर-दरअसल मध्यप्रदेश की सियासत में आदिवासी वोटर गेमचेंजर साबित होता है। 2011 की जनगणना के मुताबिक मध्यप्रदेश की आबादी का क़रीब 21.5 प्रतिशत एसटी, अनुसूचित जातियां (एससी) क़रीब 15.6 प्रतिशत हैं। इस लिहाज से राज्य में हर पांचवा व्यक्ति आदिवासी वर्ग का है। राज्य में विधानसभा की 230 सीटों में से 47 सीटें अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित हैं। वहीं 90 से 100 सीटों पर आदिवासी वोट बैंक निर्णायक भूमिका निभाता है। 2018 के विधानसभा चुनाव में आदिवासी वोट बैंक भाजपा से छिटक कर कांग्रेस के साथ चला गया था और कांग्रेस ने 47 सीटों में से 30 सीटों पर अपना कब्जा जमा लिया था।
आदिवासी वोटर कब किसके साथ?-अगर मध्यप्रदेश में आदिवासी सीटों के चुनावी इतिहास को देखे तो पाते है कि 2003 के विधानसभा चुनाव में आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित 41 सीटों में से बीजेपी ने 37 सीटों पर कब्जा जमाया था। चुनाव में कांग्रेस
केवल 2 सीटों पर सिमट गई थी। वहीं गोंडवाना गणतंत्र पार्टी ने 2 सीटें जीती थी।

इसके बाद 2008 के चुनाव में आदिवासियों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या 41 से बढ़कर 47 हो गई। इस चुनाव में बीजेपी ने 29 सीटें जीती थी। जबकि कांग्रेस ने 17 सीटों पर जीत दर्ज की थी। वहीं 2013 के इलेक्शन में आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित 47 सीटों में से बीजेपी ने जीती 31 सीटें जीती थी। जबकि कांग्रेस के खाते में 15 सीटें आई थी।

वहीं पिछले विधानसभा चुनाव 2018 में आदिवासी सीटों के नतीजे काफी चौंकाने वाले रहे। आदिवासियों के लिए आरक्षित 47 सीटों में से बीजेपी केवल 16 सीटें जीत सकी और कांग्रेस ने दोगुनी यानी 30 सीटें जीत ली। जबकि एक निर्दलीय के खाते में गई।

ऐसे में देखा जाए तो जिस आदिवासी वोट बैंक के बल पर भाजपा ने 2003 के विधानसभा चुनाव में सत्ता में वापसी की थी वह जब 2018 में उससे छिटका को भाजपा को पंद्रह ‌साल बाद सत्ता से बाहर होना पड़ा। पिछले विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को कुल 41.02 प्रतिशत वोट मिले थे। जबकि अल्पमत के साथ सरकार बनाने वाली कांग्रेस पार्टी को 40.89 प्रतिशत वोट के साथ 114 सीटों पर जीत मिली थीं।
2023 में आदिवासी वोटर होगा निर्णायक- मध्यप्रदेश के 2023 के विधानसभा चुनाव में आदिवासी वोटर सियासी दलों के लिए ट्रंप कार्ड साबित होने वाला है। कांग्रेस की पूरी कोशिश है कि 2018 के विधानसभा चुनाव में जो आदिवासी वोटर उसके साथ आया था वह बना रहा है और एक बार फिर वह प्रदेश में अपनी सरकार बना सके। वहीं सत्तारूढ दल भाजपा
ने 2023 विधानसभा चुनाव के लिए 51 प्रतिशत वोट हासिल करने का लक्ष्य रखा है। यह लक्ष्य आदिवासी वोटों पर पकड़ मजबूत किए बगैर हासिल नहीं किया जा सकता। आदिवासी वोट बैंक मध्यप्रदेश में किसी भी पार्टी के सत्ता में आने का ट्रंप कार्ड है।




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