ग्राउंड रिपोर्ट: खंडवा उपचुनाव में भाजपा और कांग्रेस दोनों को सता रहा भितरघात का मुद्दा, चुनाव परिणाम पर दिल्ली की भी नजर !

Author विकास सिंह| Last Updated: बुधवार, 27 अक्टूबर 2021 (13:43 IST)
मध्यप्रदेश में खंडवा लोकसभा सीट पर हो रहे उपचुनाव पर मध्यप्रदेश के साथ-साथ दिल्ली की भी निगाहें टिकी हुई है। भाजपा की परंपरागत सीट मानी जाने वाली खंडवा सीट के चुनाव परिणाम असल में कोरोना त्रासदी के बाद महंगाई, बेरोजगारी जैसे मुद्दें पर मोदी सरकार के प्रति जनता के मूड भंपाने का एक तरह से ओपिनियन पोल का भी काम करेगा।


खंडवा लोकसभा सीट भाजपा के लिए प्रतिष्ठा का विषय बन गई है और सीट को जीतने के लिए भाजपा ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। वहीं दूसरी ओर खंडवा सीट पर उलटफेर कर प्रदेश के साथ-साथ देश के राजनीतिक परिदृश्य में अपनी प्रतिष्ठा वापस पाने के एक अवसर के रुप में देख रही है।
चेहरे पुराने पर दांव नया!- दिलचस्प बात यह है कि खंडवा लोकसभा सीट पर दोनों ही पार्टियों ने ऐसे चेहरों पर दांव लगाया है जोकि टिकट की रेस से बहुत दूर माने जा रहे है। कांग्रेस की तरफ से अरुण यादव टिकट तय माना जा रहा था लेकिन ऐन वक्त पर अरुण यादव ने चुनाव लड़ने से इंकार कर पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को सीधे पत्र लिख दिया। ऐसे में कांग्रेस ने पुराने कांग्रेसी राजनारायण सिंह पुरनी पर दांव लगाया है। राजनारायण सिंह दिग्विजय सिंह के करीबी माने जाते हैं और उनकी छवि एक बेदाग राजनेता के तौर पर है।
वहीं भाजपा की ओर पूर्व सांसद नंदकुमार सिंह चौहान के बेटे हर्ष चौहान और पूर्व कैबिनेट मंत्री अर्चना चिटनिस टिकट की प्रबल दावेदार थे लेकिन स्थानीय गुटबाजी और खींचतान के बीच ज्ञानेश्वर पाटिल की किस्मत चमक गई और वह रातों-रात भाजपा के उम्मीदवार घोषित हो गए। पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष ज्ञानेश्वर पाटिल पूर्व सांसद नंदकुमार चौहान के काफी करीबी थे और खंडवा के जिला पंचायत अध्यक्ष भी रह चुके है।
भाजपा का मास्टर स्ट्रोक- खंडवा में वोटिंग से ठीक पहले भाजपा ने कांग्रेस को मात देने के लिए मास्टरस्ट्रोक चलते बड़वाह से कांग्रेस विधायक सचिन बिरला को पार्टी में शामिल कर लिया। सचिन ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की सभा में मंच पर भाजपा की सदस्यता ली। सचिन बिरला का चुनाव के वक्त भाजपा में जाना कांग्रेस के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। सचिन बिरला के साथ सनावद नगर पालिका के पूर्व अध्यक्ष लाली शर्मा सहित सैंकड़ों की संख्या में कांग्रेस कार्यकर्ता भाजपा में शामिल हुए। अगर खंडवा की राजनीति की बात करें तो सचिन बिरला को पूर्व पीसीसी चीफ अरुण यादव का समर्थक माना जाता है।
भाजपा ने सचिन बिरला को शामिल कराकर गुर्जर समाज के वोटर में सेंध लगाने की कोशिश की है। गुर्जर समाज से आने वाले सचिन बिरला 2018 का विधानसभा चुनाव 30 हजार से अधिक वोटों से जीता था। उन्होंने भाजपा के ही तीन बार के विधायक हितेंद्र सिंह सोलंकी को हराया था।

उपचुनाव का मुद्दा- खंडवा लोकसभा सीट पर हो रहे उपचुनाव में अगर मुद्दें की बात करें तो कोई एक मुद्दा चुनाव में हावी नजर नहीं आ रहा है। सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा मोदी सरकार के मुफ्त वैक्सीन के साथ शिवराज सरकार के कामकाज को मुद्दा बनाकर चुनाव मैदान में है तो कांग्रेस लोकसभा चुनाव में महंगाई, बेरोजगारी के मुद्दें को उठाने के साथ नंदकुमार सिंह चौहान की बेटे हर्ष चौहान को टिकट नहीं देने का मुद्दा उठाकर भाजपा को घेरने की कोशिश कर रही है। खंडवा उपचुनाव में भितरघात का मुद्दा भी दोनों पर्टियों को परेशान कर रहा है।

सीट का जातिगत समीकरण- खंडवा लोकसभा सीट के जातिगत समीकरण की बात करें तो यहां एससी/एसटी वर्ग के सबसे अधिक 38 फीसदी वोट है वहीं इसके बाद ओबीसी वर्ग के 26 फीसदी, सामान्य वर्ग के 20 फीसदी और अल्पसंख्यक वर्ग के 15 फीसदी वोटर शामिल है। ऐसे में खंडवा लोकसभा सीट पर साढ़े 6 लाख से अधिक आदिवासी वोटर का रुख बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अगर जातिगत समीकरण की बात करें तो कांग्रेस ने सामान्य वर्ग के नेता पर दांव लगाया तो भाजपा ने 25 साल बाद ओबीसी चेहरे को मैदान में उतारा है।
चार जिलों की सियासत पर असर- खंडवा लोकसभा क्षेत्र में चार जिलों की आठ विधानसभा सीटें आती हैं। इसमें खंडवा जिले की तीन खंडवा, पंधाना, मांधाता शामिल है। वहीं बुरहानपुर जिले की बुरहानपुर और नेपानगर के साथ खरगौन जिले की बड़वाह और भीखनगांव और देवास जिले की बागली विधानसभा सीट शामिल है। 2018 के विधानसभा चुनाव में इन 8 विधानसभा सीटों में से तीन पर बीजेपी, चार पर कांग्रेस और एक सीट पर निर्दलीय प्रत्याशी ने कब्जा जमाया था। खंडवा लोकसभा सीट पर चुनाव के दौरान खंडवा बनाम बुरहानपुर का मुद्दा भी हावी रहता है।



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