हँसी की चिट्ठी आई है !

जीवन के रंगमंच से ...

चित्र सौजन्य : प्रवीण रावत
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आपको चिंता खाए जा रही है और आप उदास हो रहे हैं। आप दौड़ रहे हैं और हाँफ रहे हैं। रुकिए। थोड़ा रुकिए। इस हँसी की चिट्ठी को देखिए और पढ़िए। महसूस करिये कि यह कितनी अनमोल है। कितनी सादा और निश्छल है। कितनी सरल और सहज है। जैसे फूल खिला हो और महका हो। हो सकता है आप इसे देखें-पढ़ें तो थोड़ी चिंता दूर हो।

हो सकता है आप यह हँसी देखें तो वह आपकी उदासी को पोंछ दे। इंदौर के फोटोग्राफर प्रवीण रावत को यह भोली हँसी मिली आलीराजपुर के पास एक गाँव में। धूप में खड़ी इस लड़की की हँसी उन्हें छू गई। उन्होंने देर नहीं की और उसे हमेशा के लिए अपने कैमरे में बसा लिया। जब उन्होंने कैमरे के अंधेरे से इस हँसी को बाहर निकाला तो वह धूप में अपने उजालेपन के कारण किसी तितली की तरह पँख फैलाए भोली लड़की के चेहरे पर बैठी थी।

जब उन्हें पता लगा कि भोपाल में आदिम जाति कल्याण विभाग और वन्या की वार्षिक जनजातीय छायाचित्र प्रतियोगिता प्रतिबिम्ब आयोजित की जा रही है तो यह खूबसूरत हँसी उन्होंने प्रतियोगिता के लिए भेज दी। इस फोटो को प्रोत्साहन पुरस्कार मिला।

भोपाल में पिछले दिनों 21 से 23 जून तक हुए जनजातीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह के दौरान यह प्रदर्शनी आयोजित की गई थी। प्रदेशभर के छायाचित्रकारों के लगभग चार सौ फोटो प्रदर्शित किए गए थे। इसमें श्री रावत का यह फोटो महुआ पुरस्कृत हुआ।

आप दौड़िए या हाँफिए, आप पसीने में नहा जाइए या उदासी से घिर जाइए, दुःख से टूट जाइए या अवसाद में धँस जाइए। वह हँसी रहेगी और खिली रहेगी। हमेशा। हमें याद दिलाती हुई कि यही अनमोल है। याद दिलाती हुई कि दुःख को पोंछो और उदासी को झाड़ो। सोना चला गया, कोई बात नहीं, चाँदी चली गई, कोई बात नहीं, जेब कट गई कोई बात नहीं। यह हँसी तो है। जीवन को खूबसूरत और धड़कता बनाती हुई।

  हो सकता है आप यह हँसी देखें तो वह आपकी उदासी को पोंछ दे। इंदौर के फोटोग्राफर प्रवीण रावत को यह भोली हँसी मिली आलीराजपुर के पास एक गाँव में। धूप में खड़ी इस लड़की की हँसी उन्हें छू गई। उन्होंने देर नहीं की और उसे हमेशा के लिए अपने कैमरे में बसा लिया।      
सबसे अनमोल तो यही है। हँसी की यह चिट्ठी खासतौर पर पाठकों के लिए प्रवीण रावत की फोटोग्राफिक चिट्ठी है। यह हँसी की चिट्ठी है। इसे देखिए भी और पढ़िए भी। यह कुछ कह रही है......

यह चिट्ठी आपके पास भी है। बस आप जल्दबाजी में उसे कहीं भूल गए हैं। वह शायद आपकी टेबल पर रह गई है। वह कहीं आपके पर्स में या शर्ट की जेब में रह गई है। जूते के फीते में या रूमाल में। वह शायद आपके गुस्से के नीचे दब गई है। वह शायद आपकी उदासी के परदे में छिपी है। वह आपके ही आसपास है। उसे ढूँढिए और दूसरों को भेज दीजिए...

रवींद्र व्यास|
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देखिए, आपकी बगल में बैठा आपका साथी कितना उदास है। उसे ही भेज दीजिए...!



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