भारत: 'दूध' की बिरादरी से बाहर हुए आमंड और सोया मिल्क

DW| Last Updated: गुरुवार, 16 सितम्बर 2021 (11:57 IST)
रिपोर्ट : अविनाश द्विवेदी

प्लांट बेस्ड पेय पदार्थों पर यह फैसला अचानक नहीं आया है। लंबे समय से भारतीय डेयरी उद्योग इसके लिए खाद्य नियामक पर दबाव डाल रहा था। वैसे 'असली दूध' को लेकर ऐसी ही कुछ लड़ाइयां यूरोप और अमेरिका में भी चली हैं। भारतीय फूड रेगुलेटर- फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) ने प्लांट बेस्ड पेय पदार्थों (आमंड मिल्क, सोया मिल्क, वॉलनट मिल्क आदि) की कंपनियों को अपनी प्रचार सामग्री और लेबल से 'दूध' या 'मिल्क' शब्द हटाने को कहा है। ई-कॉमर्स कंपनियों से भी इन प्रोडक्ट्स को उनके और डेयरी सेक्शन से हटाने के लिए कहा गया है।
इसका यह मतलब हुआ कि अब एमेजॉन इंडिया, फ्लिपकार्ट, बिगबास्केट और ग्रोफर्स जैसे ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर डेयरी कैटेगरी में बादाम और सोया दूध जैसे पेय पदार्थ नहीं मिलेंगे। यह फैसला अचानक नहीं आया है, लंबे समय से भारत का डेयरी उद्योग इसके लिए खाद्य नियामक पर दबाव डाल रहा था। वैसे भी यह बहस सिर्फ भारत की न होकर दुनिया के कई देशों की है। यूरोप और अमेरिका में भी ऐसी लड़ाइयां चली हैं।
इनमें एक ओर 'वीगन मिल्क' रहे हैं और दूसरी ओर बड़ी डेयरियां। लड़ाई का केंद्र एक ही होता है- 'असल दूध क्या है?' और भारत में फिलहाल यह लड़ाई डेयरी उद्योग ने जीत ली है।

असल दूध क्या है?

हैंडबुक ऑफ फूड केमिस्ट्री के मुताबिक दूध में वसा, प्रोटीन, एंजाइम्स, विटामिन्स और शुगर होते हैं और यह स्तनधारी जीवों में उनके बच्चों के पोषण के लिए पैदा होता है। वहीं भारत के खाद्य नियामक FSSAI का मानना है कि 'दूध' स्वस्थ स्तनधारी जानवरों (दुधारू मवेशियों) को पूर्ण रूप से दुहने से निकलने वाला एक साधारण स्राव है।
अलग-अलग जगहों पर भले ही दूध को अलग तरह से परिभाषित किया गया हो लेकिन एक बात पर सभी सहमत हैं कि दूध का स्तनधारी प्राणियों से सीधा जुड़ाव है। लेकिन पिछले एक दशक में कई सारे ऐसे उत्पाद 'दूध' या 'मिल्क' शब्द का उपयोग करते हुए बाजार में आ गए हैं, जिनका स्तनधारी जीवों से कोई लेना-देना नहीं है। ऐसे उत्पाद हैं- आमंड मिल्क, सोया मिल्क, वॉलनट मिल्क और ओट मिल्क आदि।

मेवों और अनाजों की प्रॉसेसिंग के जरिए बनाए गए ये एक तरह के तरल पदार्थ होते हैं, जो दूध जैसे लगते हैं। इस कड़ी में अब आलू जैसे प्रतिद्वंदी भी जुड़ गए हैं। ये सभी पौधों पर आधारित पेय हैं लेकिन लोग इन्हें गाय-भैंस के आम दूध के संभावित विकल्पों के तौर पर अपना रहे हैं। जाहिर सी बात है भारत का डेयरी उद्योग इससे खुश नहीं है।
ऐसे में नेशनल कॉपरेटिव डेयरी फेडरेशन ऑफ इंडिया (NCDFI) और गुजरात को-ऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन (GCMMF) की ओर से भारत के खाद्य नियामक के पास इनकी शिकायत की गई थी। GCMMF ही देशभर में के उत्पादों की सप्लायर है। ये संस्थाएं पिछले साल से ही यह कदम उठाए जाने की मांग कर रही थीं। डेयरी उद्योग से जुड़े लोगों का आरोप था कि 'दूध' या 'मिल्क' शब्द के प्रयोग से ग्राहकों को गुमराह किया जा रहा है।
दोनों ओर से दावे

डेयरी उद्योग से जुड़े लोग यह दावा भी कर रहे हैं कि प्लांट बेस्ड इन पेय पदार्थों में आम दूध जैसे पोषक तत्व नहीं होते। उनका एक आरोप यह भी है कि ये ब्रांड, किसानों की कई पीढ़ियों की मेहनत से बनी डेयरी मिल्क की पहचान का फायदा उठाने की कोशिश भी कर रहे हैं। मदर डेयरी के मैनेजिंग डायरेक्टर रहे संग्राम चौधरी कहते हैं, 'मवेशियों और इंसानों के बीच का रिश्ता 10 हजार साल पुराना है। और दूध का मतलब सिर्फ दूध होता है। किसी अन्य उत्पाद को दूध कहकर नहीं बेचा जा सकता।'
वहीं प्लांट बेस्ड दुग्ध उत्पाद बेचने वाली कंपनियां दावा करती हैं कि दूध का जानवरों से कोई लेना देना नहीं है। सालों से 'कोकोनट मिल्क' नाम का इस्तेमाल होता आ रहा है और आज भी इसे इसी नाम से जाना जाता है। हालांकि ऐसे तर्कों के बावजूद फिलहाल डेयरी इंडस्ट्री को जीत मिल चुकी है। नियामक ने भी दूध को लेकर चली बहस में उनका साथ दिया है।

डेयरी उद्योग का लंबा संघर्ष
ऐसी लड़ाई पहली बार हुई हो, ऐसा भी नहीं है। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक जब वनस्पति तेल उत्पादकों ने इसकी मार्केटिंग 'वनस्पति घी' के तौर पर की थी, तब भी डेयरी उद्योग उनके खिलाफ खड़ा हो गया था। उनका दावा था कि घी को सिर्फ दूध में पाई जाने वाली वसा से ही निकाला जा सकता है। इसी तरह जब आइसक्रीम में दुग्ध उत्पादों की जगह वनस्पति तेल का प्रयोग शुरू हुआ, तब भी उन्होंने इस उद्योग पर ग्राहकों को गुमराह करने का आरोप लगाया।
यहां तक कि वे 'पीनट बटर' को भी निशाना बना चुके हैं, उनका तर्क है कि मूंगफली से मक्खन नहीं निकाला जा सकता। मतलब साफ है कि डेयरी उद्योग दुग्ध उत्पादों को बचाने के लिए सब कुछ करने को तैयार है। नियामक के फैसले के बाद GCMMF (अमूल) के मैनेजिंग डायरेक्टर आरएस सोढ़ी कहते हैं, 'द फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स का 13वां सुधार कानून 1 जुलाई, 2018 से लागू है जो प्लांट बेस्ड पेय पदार्थों को डेयरी उत्पाद की कसौटी का उल्लंघन करने वाला मानता है। ऐसे में यह एक स्वागत योग्य कदम है।'
असर पड़ना तय

आरएस सोढ़ी ने यह भी कहा, 'यह कदम 10 करोड़ दूध उत्पादकों और किसानों के हितों की रक्षा करेगा। पौधों पर आधारित पेय पदार्थों का ज्यादातर कच्चा माल आयातित होता है। ऐसे में कड़े कानून न सिर्फ डेयरी किसानों की रक्षा करेंगे बल्कि ऐसे पदार्थों का निशाना बन सकने वाले ग्राहकों की भी।'

हालांकि कुछ लोगों का कहना है कि दूध के विकल्प के तौर पर नए उत्पादों को अपना रहे लोगों को शायद ही नाम बदलने से कोई खास फर्क पड़े। हां यह जरूर होगा कि अब इन पेय पदार्थों को ढूंढने में मुश्किल होगी क्योंकि यह वेबसाइट के डेयरी सेक्शन के बजाए पेय पदार्थों वाले सेक्शन में मिलेंगे। ऐसे में यह भी जाहिर है कि इससे ब्रांड पर लोगों का विश्वास कमजोर होगा, जिसका इनकी बिक्री पर असर होगा। यानी FSSAI का यह कदम फिलहाल प्लांट बेस्ड पेय पदार्थ बनाने और बेचने वालों के लिए बेहद बुरी खबर है।



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