साल के सबसे बड़े 'कमबैक मैन' रहे सहवाग

Virender Sahwag
PTI
एक वर्ष पहले सहवाग के हाथों से सब कुछ छिन चुका था। वह से बाहर थे। पूरे 2007 में उन्हें सिर्फ एक टेस्ट खेलने को मिला था। लगातार खराब फॉर्म के कारण वीरु का वनडे टीम से भी अंदर-बाहर होना चल रहा था।

सहवाग अपना आत्मविश्वास इस कदर खो चुके थे कि वह स्थानीय टूर्नामेंटों में भी शून्य पर आउट हो जाते थे। उनके करियर को लेकर तरह-तरह की आशंकाएँ व्यक्त की जा रही थीं। ऐसे हालात किसी भी खिलाड़ी को तोड़ सकते थे, लेकिन इन हालात में पूर्व भारतीय कप्तान अनिल कुंबले के एक फैसले ने सहवाग का सारा जीवन बदल दिया।

को दिसंबर 2007 में ऑस्ट्रेलिया के दौरे पर जाना था। सहवाग का नाम इस दौरे के संभावितों में भी शामिल नहीं था। दौरे पर जाने से पहले बेंगलुरु में पाकिस्तान के खिलाफ टेस्ट में ओपनर गौतम गंभीर का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा था।

गंभीर को चोट के कारण तत्कालीन कप्तान कुंबले ने सहवाग को ऑस्ट्रेलिया दौरे पर ले जाने पर जोर दिया। हालाँकि कई लोग कुंबले के इस फैसले के खिलाफ थे, लेकिन कुंबले जानते थे कि ऑस्ट्रेलिया की क्षेत्र और उछाल वाली पिचों पर सहवाग के लिए 'जैकपॉट' साबित हो गया।

सहवाग ने 2007 में एकमात्र टेस्ट केपटाउन में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ खेला था जिसमें उन्होंने 40 और 4 रन बनाए थे। इससे पहले इस ‍सिरीज के पिछले दो टेस्टों में उन्होंने 4, 33, 0 और 8 जैसे मामूली स्कोर किए थे। वर्ष 2007 में वह 15 वनडे में सिर्फ 475 रन बना पाए थे।

ऑस्ट्रेलिया दौरे में उन्हें पहले दो टेस्टों में खेलने का मौका नहीं मिल पाया। पर्थ में उन्हें तीसरे टेस्ट में मौका मिला, जिसमें उन्होंने 29 और 43 रन बनाए और अपनी ऑफ स्पिन से दो विकेट लेकर भारत को पर्थ में ऐतिहासिक जीत दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

सहवाग ने पर्थ के बाद फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा और और एक के बाद एक कामयाबी की सीढ़ियाँ चढ़ते चले गए। एडिलेड में चौथे और आखिरी टेस्ट में पहली पारी में 63 रन बनाए और फिर दूसरी पारी में बेहतरीन 151 रन बनाकर भारत के लिए मैच बचा दिया। सहवाग का दूसरी पारी में यह पहला शतक था।

इसके बाद आया वो टेस्ट जिसमें सहवाग ने इतिहास बना दिया। सहवाग ने दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ चेन्नई में पहले टेस्ट में 530 मिनट तक क्रीज पर रहकर 304 गेंदों में 42 चौकों और पाँच छक्कों की मदद 319 रन बनाए। सहवाग का यह दूसरा तिहरा शतक था और इसके साथ ही वह टेस्ट इतिहास में दो-दो तिहरे शतक बनाने वाले महान डान ब्रैडमैन और ब्रायन लारा की बराबरी पर आ गए 1

सहवाग ने अपना ही पिछला 309 रन का स्कोर सुधारा और साथ ही टेस्ट क्रिकेट का सबसे तेज तिहरा शतक बना दिया1
श्रीलंका दौरे में जब भारतीय बल्लेबाज अबूझ स्पिनर अजंता मेंडिस के सामने असहाय नजर आ रहे थे तब सहवाग ने गाले में नाबाद 201 और 50 रन बनाकर भारत को जीत दिलाई थी।

सहवाग ने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ मोहाली में 35 और 90 तथा नागपुर में 66 और 92 रन बनाकर भारत को इन दोनों टेस्टों में जीत तथा सीरीज 2-0 से जिताने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इंग्लैंड के खिलाफ चेन्नई में पहले टेस्ट में सहवाग ने दूसरी पारी में तूफानी 83 रन बनाकर भारत के लिए 387 रन का मुश्किल लक्ष्य हासिल करना आसान बना दिया। हालाँकि आखिरी दिन सचिन तेंडुलकर ने नाबाद शतक बनाकर भारत को जीत दिलाई, लेकिन 'मैन ऑफ द मैच' का पुरस्कार सहवाग को दिया गया।

सहवाग की इस बल्लेबाजी के बाद कप्तान महेन्द्रसिंह धोनी ने कहा था कि वह दुनिया के सबसे विध्वंसक बल्लेबाज हैं जो किसी भी तरह की गेंदबाजी की धज्जियाँ उड़ा सकते हैं।

'नजफगढ के नबाब' ने 2008 में 14 टेस्टों में 56.23 के औसत से 1462 रन बनाए, जिनमें तीन शतक और छह अर्धशतक शामिल हैं। वनडे में उन्होंने 18 मैचों में 49.61 के औसत से 893 रन बनाए, जिनमें एक शतक और आठ अर्धशतक शामिल हैं।

नई दिल्ली (वार्ता)| वार्ता|
भारतीय में 'कमबैक मैन' का जो खिताब कभी मोहिन्दर अमरनाथ और सौरव गांगुली जैसे दिग्गज बल्लेबाजों के नाम हुआ करता था, वह वर्ष 2008 में विस्फोटक ओपनर के सिर सज गया है।
वह अब टेस्ट टीम के उपकप्तान भी बन गए हैं। सहवाग के इस बेमिसाल प्रदर्शन ने टीम इंडिया को विदेशी मीडिया की नजर में 'वर्ष 2008 की सर्वश्रेष्ठ टीम' का खिताब दिलाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।



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