जान देकर जीता मैच

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फुटबॉल के इतिहास की यह हैरतअंगेज घटना 1942 की है। इस समय जर्मनी की नाजी सेनाएँ रूस को रौंद रही थीं। नाजी सेनाएँ छल-बल से एक के बाद एक रूसी नगरों पर कब्जा करती जा रही थीं। जब उन्होंने रूस के कीव नगर पर विजय पाई तो नगर के जिन प्रमुख नागरिकों को बंदी बनाया, उनमें रूस की विश्वविख्यात फुटबॉल टीम 'डायनेमो' के खिलाड़ी भी थे। इस टीम ‍की गिनती उन दिनों विश्व की बेहतरीन फुटबॉल टीमों में होती थी।


जर्मनों ने इस टीम के खिलाड़ियों को बंदी बनाकर एक बेकरी में साधारण कर्मचारियों के रूप में काम करने को बाध्य कर दिया। कुछ दिनों तक तो खिलाड़ी चुपचाप बेकरी में मामूली कर्मचारियों की तरह काम करते रहे, लेकिन कुछ समय बाद उनमें फुटबॉल के प्रति प्रेम जागा और वे छुट्‍टी के घंटों में बेकरी के पास के एक मैदान में रोज फुटबॉल खेलने लगे।
उन्हें रोज फुटबॉल खेलते देख जर्मनों के मन में एक विचार आया। उन्होंने सोचा, क्यों न इन फुटबॉल खिलाड़ियों के माध्यम से स्थानीय नागरिकों का विश्वास जीतने की कोशिश की जाए। उन्होंने ‍इन खिलाड़ियों से कहा कि यदि वे चाहें तो निडर होकर बेकरी के पास के मामूली मैदान के स्थान नगर के फुटबॉल स्टेडियम में खेल सकते हैं। जब रूसी खिलाड़ी इस प्रस्ताव से चौंके तो जर्मनों ने कहा कि जर्मन लोग न फुटबॉल के खिलाफ हैं और न फुटबॉल खिलाड़ियों के, वे तो फुटबॉल और उसके खिलाड़ियों से बेहद प्यार करते हैं। इतना ही नहीं अगर रूसी खिलाड़ी चाहें तो जर्मन सेना की फुटबॉल टीम के खिलाफ भी मैच खेल सकते हैं - एक मैच नहीं, बल्कि कई मैच। हालाँकि 'डायनेमो' के खिलाड़ियों के मन का संदेह पूरी तरह गया नहीं था, फिर भी उन्होंने 'स्टार्ट' नाम से एक नई टीम का गठन किया और मिलजुलकर फैसला किया कि वे मैच में जर्मनों को हराने की पूरी कोशिश करेंगे।

पहला मैच 12 जून 1942 को कीव के फुटबॉल स्टेडियम में हुआ। स्टेडियम दर्शकों से खचाखच भरा था। जर्मन खिलाड़ी बड़े आत्मविश्वास के साथ खेलने आए, मगर अनुभवी और जोशीले रूसी खिलाड़ियों ने उन्हें बुरी तरह हराया। जर्मन इस हार से बहुत नाराज हुए, मगर क्या कर सकते थे? उन्हें ज्यादा अनुभवी साहसी खिलाड़ियों की टीम बनाई और 17 जुलाई को दूसरा मैच खेलने की घोषणा की।

इस मैच से पहले जर्मन टीम के कप्तान अपने खिलाड़ियों से कहा कि इस बार रूसी खिलाड़ियों को अवश्य हराना है, मगर भरपूर कोशिशों के बावजूद जर्मन खिलाड़ी एक बार फिर 'स्टार्ट' के खिलाड़ियों के हाथों बुरी तरह पराजित हुए। दूसरी हार ने जर्मनों की नाराजगी और बढ़ा दी। वे भला यह कैसे सहन कर सकते थे कि 'मानवों की सर्वोच्च आर्य जाति' के विजेता, विजित सैनिकों से विजित देश की भूमि पर हार जाए, भले ही वह हार फुटबॉल-मैच की ही क्यों न हो। जर्मनों ने यह बहाना किया कि उनकी पहली दो टीमों के खिलाड़ियों ने पर्याप्त अभ्यास नहीं किया था, इसलिए वे हार गए।
19 जलाई को होने वाले तीसरे मैच में वे अवश्य विजयी होंगे, लेकिन इस मैच में जर्मन पहले से भी ज्यादा अंतर के साथ हारे- एक के मुकाबले पाँच गोलो से। जर्मनी को लगा कि इस तीसरी हार द्वारा रूसियों ने जर्मन राष्ट्र का अपमान किया है। 26 जुलाई को हुए चौथे मैच को देखने आए हजारों रूसी दर्शक खुशी-खुशी घर लौटे। जर्मनी फिर हारा। चूँकि जर्मनी चौथे मैच में रूसियों से सिर्फ एक गोल से हारा था, इसलिए उन्होंने निश्चय किया कि 6 अगस्त को होने वाले पाँचवे मैच में अवश्य विजयी होंगे, लेकिन 'स्टार्ट' के दिलेर और हिम्मती खिलाड़ियों के आगे वे टिक नहीं पाए और फिर हारे।
अब जर्मनी के उच्च सेनाधिकारियों के क्रोध का ठिकाना न था। उन्होंने आदेश दिया कि 'स्टार्ट' टीम के सब गुस्ताख खिलाड़ियों को फौरन गिरफ्‍तार कर लिया जाए, पर बाद में पुनर्विचार के बाद उन्होंने तय किया कि इन 'गुस्ताख' खिलाड़ियों को जिंदा रहने का एक और शायद अंतिम अवसर दिया जाए।

लिहाजा घोषणा की गई कि 9 अगस्त को इस मैच-श्रृंखला का अंतिम मैच होगा। जर्मनों द्वारा रूसी खिलाड़ियों को साफ-साफ बता दिया गया था कि यदि इस मैच में भी उन्होंने जर्मनों को हराने की धृष्टता की तो इसकी कीमत उन्हें अपनी जान देकर चुकाना होगी। उन्हें किसी भी हालत में बख्‍शा नहीं जाएगा।
रूसी खिलाड़ियों ने जर्मनों की इस चेतावनी का कोई उत्तर नहीं दिया, लेकिन अपने निवास स्थान पर आकर एकमत से यह निश्चय किया कि वे जानबूझकर जर्मनों से हारने के स्थान पर मरना ज्यादा पसंद करेंगे। 9 अगस्त को मैच शुरू हुआ ही था कि रूसियों ने जर्मनों पर एक गोल दा‍ग दिया। मध्यांतर तक जर्मन खिलाड़ी इस गोल को नहीं उतार पाए।

मध्यांतर के अवकास में एक जर्मन सेनाधिकारी ने रूसी खिलाड़ियों को फिर चेतावनी दी कि यदि इस मैच में भी जर्मनी को हारना पड़ा तो कोई रूसी खिलाड़ी जिंदा नहीं बचेगा, पर इस चेतावनी ने रूसियों के गुस्से को भड़का दिया। उन्होंने पहले से भी ज्यादा उत्साह से तथा और ‍अधिक गोल करने के इरादे से खेलना आरंभ किया। जर्मन रेफरी ने जर्मन खिलाड़ियों द्वारा किए गए सब 'फाउल' नजरअंदाज करने शुरू कर दिए, लेकिन जर्मनों पर हुए साफ गोल को वह कैसे नजरअंदाज करता? मैच के अंत में जर्मनी दो गोल से हारा।
रूसी दर्शक जब अपने खिलाड़ियों की इस जीत पर तालियाँ बजाने लगे तो जर्मन सैनिकों ने उन्हें बंदूक दिखाकर ऐसा करने से रोका। सहमे हुए दर्शक, जिन्हें रूसी खिलाड़ियों को दी जाने वाली मौत की चेतावनी के बारे में कोई जानकारी न थी, चुपचाप, सिर झुकाए स्टेडिटम से बाहर चले गए। निडर और हिम्मती रूसी खिलाड़ियों को ट्रक में बिठाकर, बाबीदार नामक स्थान ले जाया गया, जहाँ उन्हें एक लाइन में खड़ा करके गोलियों से भून दिया गया।



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