पुतिन क्या युद्ध अपराधी घोषित हो सकते हैं?

देशों के बीच विवादों में मामला पूरी तरह काला या सफ़ेद नहीं होता। तब भी, यूक्रेन के प्रसंग में रूस साफ़ आक्रमणकारी है और बर्बर युद्ध-अपराध भी हुए हैं। राष्ट्रपति पुतिन पर मुकदमा चलाने की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं।

जर्मनी के कार्ल्सरूहे शहर में देश के संविधान व्याख्या न्यायालय के साथ-साथ सर्वोच्च न्यायलय भी है और देश के संघीय लोक अभियोजक का कार्यालय भी। इस कार्यालय ने रूसी राष्ट्रपति के विरुद्ध संभावित मुकदमे की तैयारी के तौर पर युद्ध-अपराध संबंधी जानकारियां, दस्तावेज़ और सबूत जुटाना मार्च के पहले सप्ताह में ही शुरू कर दिया। जर्मनी में आ चुके और नए आ रहे यूक्रेनी शरणार्थियों की गवाहियां भी ली जा रही हैं। इस प्रक्रिया का उद्देश्य बाद में संबद्ध व्यक्तियों को आपराधिक रूप से जिम्मेदार ठहराने में सक्षम होना है। जिन अन्य देशों के अधिकारियों ने भी यह काम शुरू कर दिया है, उन के साथ सहयोग किया जाएगा।

सार्वभौमिक अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार, जर्मनी में किसी पर युद्ध-अपराध का मुकदमा तब भी चलाया जा सकता है, जब अपराध, अपराधी, उसकी राष्ट्रीयता और कारनामों का जर्मनी से कोई संबंध नहीं हो। युद्ध-अपराध की परिभाषा 1949 के जेनेवा समझौते और 1998 की रोम संविंधि (स्टैट्यूट) में दी गई हैः आम नागरिकों व युद्धबंदियों की जानबूझ कर हत्या, यातना, शारीरिक अंगभंग; चल-अचल संपत्ति का विनाश, अधियाचन या बड़े पैमाने पर लूट-खसोट तथा लोगों का विस्थापन या बंधक बना लिया जाना युद्ध-अपराध हैं। लेकिन किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष या सरकार-प्रमुख को तब तक गिरफ़्तार नहीं किया जा सकता, जब तक वह पदासीन है, भले ही वह जर्मनी में ही क्यों न हो। पुतिन इस समय रूस में हैं और पदासीन हैं। इसलिए उन पर किसी जर्मन अदालत में कोई मुकदमा तभी चलाया जा सकता है, जब वे राष्ट्रपति नहीं रहेंगे।


पहला युद्ध-अपराधी : किसी देश के राष्ट्रपति को युद्ध-अपराधी घोषित करने की ऐसी नौबत, अंतरराष्ट्रीय युद्ध-अपराध कानून के अनुसार,1990 वाले दशक में पहली बार आई थी। उस समय भूतपूर्व युगोस्लाविया में गृहयुद्ध चल रहा था। स्लोबोदान मिलोशेविच वहां के राष्ट्रपति थे। उन पर वही आरोप लगे थे, जो पुतिन पर लगाए जा रहे हैं। अक्टूबर 2000 में अपने विरुद्ध दंगों-प्रदर्शनों के कारण मिलोशेविच को पद त्यागना पड़ा। नई सरकार ने मुकदमा चलाने के लिए 2001 में उन्हें नीदरलैंड में हेग स्थित संयुक्त राष्ट्र के अंतरराष्ट्रीय युद्ध-अपराध न्यायालय को प्रत्यर्पित कर दिया। किंतु, लंबे चले मुकदमे का कोई फ़ैसला आने से पहले ही, 11मार्च 2006 के दिन, उन्हें हेग की जेल के उनके कमरे में मृत पाया गया। इस मुकदमे की बड़ी आलोचना भी हुई और झूठी गवाहियों के आरोप भी लगे।

हेग में ही 'अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय' नाम का, 1जुलाई 2002 से, एक दूसरा न्यायालय भी है। उसके मुख्य अभियोजक करीम खान, 2014 से ही, यूक्रेन में युद्ध-अपराधों और मानवता के खिलाफ़ अपराधों की जांच-पड़ताल कर रहे हैं। उनका कहना है कि इस जांच में अब यूक्रेन में किए गए "सभी नए संदिग्ध अपराध" भी शामिल होंगे। यह एक ऐसा स्थायी अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय है, जो संयुक्त राष्ट्र के अधीन नहीं है। यह दूसरा न्यायालय 1998 की रोम संविधि की देन है।

चार मुख्य अधिकार-क्षेत्र : इस न्यायालय के चार मुख्य अधिकार-क्षेत्र हैं: नरसंहार, मानवता के खिलाफ अपराध, युद्ध-अपराध और आक्रामकता-अपराध। दुनिया के 123 देशों ने हेग के इस अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय की स्थापना संबंधी रोम संविधि पर हस्ताक्षर करने के बाद विधिवत पुष्टि भी की है। लेकिन अमेरिका, रूस, चीन और यूक्रेन जैसे कई देशों ने या तो हस्ताक्षर किए हैं, पर पुष्टि नहीं की है, या दोनों काम नहीं किए हैं। भारत रोम संविधि का सदस्य नहीं है; उसके अधिकार-क्षेत्र में नहीं आता।

रूस और यूक्रेन ने रोम संविधि पर हस्ताक्षर किए हैं, लेकिन पुष्टि नहीं की है। तब भी, हेग के इस न्यायालय को यूक्रेन की एक "तदर्थ" (ऐड हॉक) मान्यता के अधीन वहां अपराधों की जांच करने की अनुमति है। कोई देश, जो रोम अनुबंध का पक्ष नहीं है, तदर्थ मान्यता दे कर इस न्यायालय को मुकदमा चलाने के लिए कह सकता है। यूक्रेन ने 2014-15 में ऐसा दो बार किया था। उस समय रूस ने क्रीमिया प्रायद्वीप पर कब्ज़ा कर लेने के बाद उसका अपने भूभाग में विलय कर लिया था। इस स्थायी अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय के मुख्य अभियोजक, करीम ख़ान का मत है कि यूक्रेन की दूसरी तदर्थ मान्यता उसके समग्र भूभाग पर सभी अपराधों के लिए अनिश्चित काल तक लागू मानी जाएगी।

न्याय 'नौ दिन चले अढ़ाई कोस' की गति से चलता है। क्या ऐसा कभी होगा कि पुतिन को अदालत के कठघरे में खड़ा होना पड़े? न्यायविद कहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय केवल रूसी राष्ट्रपति को ही कठघरे में खड़ा करने के लिए नहीं बना हैः "युद्ध- अपराधों और मानवता के विरूद्ध अपराधों की ज़िम्मेदारी साधारण सैनिक के साथ शुरू होती है और सर्वोच्च कमांडर के साथ समाप्त होती है।" यानी, पुतिन के वरिष्ठ सहयोगी भी न्याय के जाल में फंस सकते हैं।

पुतिन कब पकड़ में आएंगे! सबसे निर्णायक प्रश्न है, पुतिन कब पकड़ में आएंगे! रूस का राष्ट्रपति होने के नाते उन्हें हेग के अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय से कोई छूट या प्रतिरक्षा नहीं मिल सकती। रोम संविधि के अनुच्छेद 27 में साफ़ कहा गया है कि "राष्ट्र या सरकार प्रमुख होने से, सरकारी मंत्री या सांसद होने से, निर्वाचित जनप्रतिनिधि या सरकारी अधिकारी होने से किसी को उसके आपराधिक कारनामों के मामले में छूट नहीं दी जाएगी।" अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय को बनाया ही गया था राज्य-प्रमुखों पर मुकदमा चलाने के उद्देश्य से।

हां, मुकदमा यदि जर्मनी की किसी अदालत में चलाने की बात हो, तो स्थिति अलग होगी। तब विदेशी राष्ट्राध्यक्षों के पदासीन रहते उन पर मुकदमा नहीं चला सकने का नियम तुरंत लागू हो जाएगा। लेकिन, जैसे ही पुतिन अपने पद पर नहीं रहे और कभी जर्मनी आए या उन्हें जर्मनी लाया जा सका, तो जर्मनी में भी उन पर मुकदमा चलाया जा सकता है। इसीलिए जर्मन न्यायपालिका ने बहुत जल्दी अपनी जांच-पड़ताल शुरू कर दी और दूसरे देशों से भी ऐसा ही करने का अग्रह किया।

रूसी राष्ट्रपति ने, स्वाभाविक है, कि उन के विरुद्ध मुकदमा चलाने की इन तैयारियों की कड़ी आलोचना की है; बदला लेने की धमकी दी है। वे तो पश्चिमी देशों द्वारा यूक्रेन को हथियार आदि दिए जाने का भी विरोध कर रहे हैं। किंतु, अंतरराष्ट्रीय क़ानून के जर्मन विद्वानों का कहना है कि रूस के विरुद्ध अब तक जो दंडात्मक क़दम उठाए गए हैं, वे क़ानूनी दायरे के भीतर ही हैं। अंतरराष्ट्रीय क़ानून बल्कि इससे अधिक की अनुमति देता है। यदि कोई देश यूक्रेन की पुकार सुनकर आत्मरक्षा के उसके प्रयासों में उस की मदद करता है – उदाहरण के लिए ''यदि जर्मन, फ्रांसीसी या अमेरिकी यूक्रेन में जा कर उसे सचमुच सैन्य सहायता देते हैं – तो वे ऐसा कर सकते हैं।''
आत्मरक्षा का अधिकार : संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 51 में सामूहिक आत्मरक्षा के अधिकार और बाहरी सहायता की मांग का उल्लेख है। यूक्रेन ने सभी देशों से सहायता का जो अनुरोध किया है, आत्मरक्षा के लिए वह सामूहिक सहायता की याचना है। उसे सहायता देने वाले देशों ने हालांकि अपने सैनिक वहां नहीं भेजे हैं। केवल हथियार आदि ही दे रहे हैं, ताकि इस लड़ाई की आग में घी न पड़े। किंतु क़ानूनी दृष्टि से, न तो अपने सैनिक भेजना अनुच्छेद 51 का उल्लंघन है और न अपने सैनिक नहीं भेजना इस अनुच्छेद का उल्लंघन है। दोनों बातें क़ानून-सम्मत हैं। यह अनुच्छेद यह नहीं कहता कि सहायता की गुहार को अनसुना करना कोई अपराध है।

फ़िलहाल कोई भी देश यूक्रेन में अपने सैनिक नहीं भेज रहा है। जो देश सैनिक भेजना चाहते हैं, उनके लिए ऐसा करना तब आसान हो जाता, जब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का इस आशय का कोई प्रस्ताव होता। किंतु, संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 21 के अनुसार, रूस के पास सुरक्षा परिषद के किसी भी निर्णय को नहीं मानने का वीटो अधिकार है। अतः
ऐसा कोई प्रस्ताव पारित हो ही नहीं सकता, जिसे रूस नहीं चाहता।

रूस पर यूक्रेन में युद्ध-अपराध और नरसंहार करने के आरोपों को क़ानूनी तौर पर मनवाना कतई आसान नहीं होगा। हेग में ही संयुक्त राष्ट्र का भी अपना जो अंतरराष्ट्रीय न्यायालय है, वहां एक त्वरित सुनवाई के बाद न्यायाधीशों का फ़ैसला यही था कि रूस ने अंतरराष्ट्रीय क़ानून का घोर उल्लंघन किया है। लेकिन, इससे रूस का कोई बाल बांका नहीं हुआ, क्योंकि इस न्यायालय के पास अपनी बात मनवाने के लिए पुलिस या सेना जैसी कोई शक्ति नहीं है। उसका फ़ैसला, किसी हद तक, केवल सुरक्षा परिषद ही मनवा सकती है, लेकिन तब, जब उसका कोई स्थाई सदस्य देश अपने वीटो अधिकार का प्रयोग कर प्रस्ताव को निरस्त न करदे। रूस ने अपने वीटो द्वारा अपने विरुद्ध यह अदालती फ़ैसला निरस्त कर दिया।

समस्याएं और प्रक्रियाएं : किसी देश के बदले यदि किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना हो –
युद्ध अपराध करने वाले सैनिकों को या पुतिन को – तो किसी देश की अदालत में, या फिर हेग के ही स्थायी अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय में जाना होगा। लेकिन, तब कई प्रकार की समस्याओं और प्रक्रियाओं वाली बाधाएं पार करनी पड़ेंगी। केस जब सैनिकों पर चलाना हो, तो पहले यह देखना होगा कि उन्हें हेग में अदालत के सामने पेश कैसे किया जाए। अभियुक्त और अभियोक्ता की अनुपस्थिति में यह अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय कोई सुनवाई नहीं करता। उसके पास गिरफ्तारी के लिए अपनी कोई पुलिस भी नहीं है। यानी, दोषी पहले ही पकड़े जा चुके हों और उनके दोष सिद्ध करने वाले पर्याप्त ठोस प्रमाण हों, तभी मुकदमा चल सकता है।

किसी सैनिक या कुछ सैनिकों के प्रसंग में यह शायद संभव हो भी सकता है। लेकिन पुतिन के मामले समस्या और बढ़ जाएगी। वे रूस के राष्ट्रपति हैं। उन्हें प्राप्त क़ानूनी सुरक्षा के कारण किसी दूसरे देश की राष्ट्रीय अदालत कुछ कर ही नहीं पाएगी। हेग का अंतरराष्ट्रीय न्यायालय भी असमर्थ होगा, क्योंकि वे खुद तो वहां जाएंगे नहीं। अतः न्यायालय में पेश करने से पहले पुतिन की गिरफ्तारी होनी चाहिए, जो इस समय हो नहीं सकती। दूसरी समस्या यह होगी कि उन पर दोष क्या लगाया जाए। युद्ध-अपराध सिद्ध करने के लिए ऐसे ठोस प्रमाण और गवाह पेश करने होंगे कि पुतिन की जानकारी और उनके आदेश से
ही ये अपराध हुए हैं। वे कहेंगे, मैं मॉस्को में था। मैं नहीं जानता कि मेरे सैनिकों ने यूक्रेन में कब, कहां क्या किया। मैंने तो ऐसा कोई आदेश नहीं दिया था।

अंतरराष्ट्रीय क़ानून की सीमाएं : अंतरराष्ट्रीय क़ानून के जर्मन प्रोफ़ेसर, पीएर थीलब्यौएर्गर ने इन सारी अड़चनों पर प्रकाश डालते हुए एक रेडियो कार्यक्रम में कहाः ''अंतरराष्ट्रीय क़ानून युद्ध छेड़ने की मनाही करता है, युद्ध तब भी छिड़ते रहते हैं। क़ानून में नियम है कि युद्ध यदि छिड़ ही जाए, तो देखना होगा कि तथाकथित 'मानवीय अंतरराष्ट्रीय क़ानून' में किस बात की अनुमति है और किस की नहीं। उदाहरण के लिए, आाम नागरिकों और असैनिक इमारतों पर कोई हमला नहीं होना चाहिए। कुछ ख़ास हथियारों का उपयोग भी नहीं होना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय क़ानून में ये मानवीय मुद्दे होना ही बड़ी ग़नीमत है।''

''हम देख रहे हैं कि पुतिन इन नियमों की कोई परवाह नहीं करते। तब भी यह अच्छी बात है कि ये नियम हैं। इससे पहले युद्ध में सब कुछ चलता था। जहां तक अंतरराष्ट्रीय क़ानून को लेकर ऊंची अपेक्षाओं का प्रश्न है, कि युद्ध का जल्द अंत हो, लोगों को न्याय मिले इत्यादि, तो बार-बार यही कहना पड़ेगा कि अंतरराष्ट्रीय क़ानून देशों के, उनकी सरकारों के बीच सहमति से बना क़ानूनी विधान है। वह उतना ही शक्तिशाली हो सकता है, जितना विभिन्न देशों की सरकारें उसे होने देती हैं। अंतरराष्ट्रीय क़ानून वैसा भी हो सकता था, जैसा आम जनता चाहती है। लेकिन, फिलहाल वह वैसा है, जैसा देशों की सरकारें चाहती हैं। हर देश चाहे तो यूक्रेन का साथ दे सकता है। वहां अपनी सेना भेज सकता है। लेकिन, देशों की सरकारें ऐसा नहीं चाहतीं। उनके पास अपने-अपने राजनैतिक कारण हैं ऐसा नहीं चाहने के। अंतरराष्ट्रीय क़ानून उनकी राह का रोड़ा नहीं है।''

कहने की आवश्यकता नहीं कि 'अंतरराष्ट्रीय क़ानून राह का रोड़ा नहीं' होते हुए भी यूरोप-अमेरिका यह सोच कर अपने सैनिक यूक्रेन में लड़ने के लिए नहीं भेज रहे हैं कि यदि तीसरा विश्वयुद्ध छिड़ गया, तो वह किसी भी समय पूरी दुनिया को भस्म करने वाले परमाणु युद्ध का रूप ले सकता है। यह जोखिम फ़िलहाल कोई उठाना नहीं चाहता। पुतिन युद्ध-अपराधी घोषित हो सकते हैं, लेकिन तभी, जब वे रूस के राष्ट्रपति नहीं रह जाएंगे और हमारी दुनिया भी किसी महाविनाश से बच गई होगी। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और एक दशक तक डॉयचे वेले की हिन्दी सेवा के प्रमुख रह चुके हैं)




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