पाकिस्तान सियासी पिच पर इमरान की शानदार बैटिंग, इस तरह बने मैन ऑफ द मैच

Last Updated: रविवार, 3 अप्रैल 2022 (13:39 IST)
हमें फॉलो करें
क्रिकेट में को दिलाने वाले सियासी पिच पर शानदार बैटिंग करते नजर आए। देश की जनता को एक नया पाकिस्तान ख्‍वाब दिखाने वाले इमरान खान भी भले ही अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाएंगे। लेकिन उन्होंने सरेंडर करने की बजाए संसद भंग करने का रास्ता चुना। अब देश में 90 दिनों में चुनाव होंगे और तब तक इमरान ही पीएम बने रहेंगे। इस तरह पाकिस्तान को वर्ल्ड कप जिताने वाले इमरान सियासी पिच पर भी शानदार बैटिंग करने में सफल रहे और सिक्स मारकर मैन ऑफ द मैच बन गए।
क्रिकेट छोड़कर राजनीति की दुनिया में आने वाले खान पिछले 22 वर्षों से सक्रिय राजनीति में हैं। पाकिस्तान का इतिहास ऐसा रहा है। पाकिस्तान में 22 व्यक्ति प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे, लेकिन अब तक कोई भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं पर पाया। 1958, 1977 और 1999 में सेना निर्वाचित सरकार को हटाकर सत्ता को अपने हाथों में ले चुकी है।


सेना के हाथों में देश की कमान : 75 वर्षों के इतिहास में दशकों तक पाकिस्तान में सत्ता की कमान सेना के हाथों में रही। पाकिस्तान में 1958 से 1971 तक सैन्य शासन रहा। 1977 से 1988 तक और 1999 से 2008 तक पाकिस्तान में लोकतंत्र को कुचलकर आर्मी सत्ता में रही। 1951, 1980 और 1995 में भी पाकिस्तानी सेना ने सत्ता हथियाने की कोशिश की थी, लेकिन उसे सफलता नहीं मिली। 1953-54 में पाकिस्तान के राष्ट्रपति भी एक बार संवैधानिक तख्तापलट कर चुके हैं। जनरल अयूब खान, जनरल याहया खान, जनरल जिया उल हक और जनरल परवेज मुशर्रफ पाकिस्तान के ऐसे सैन्य अधिकारी रहे, जिन्होंने लोकतंत्र को कुचला।
कौन कितने समय कुर्सी पर रहा : 14 अगस्त 1947 को हिन्दुस्तान से अलग होकर एक राष्ट्र के रूप में पाकिस्तान का जन्म हुआ। कायदे आजम और तत्कालीन गवर्नर जनरल मुहम्मद अली जिन्ना ने लियाकत अली खान के हाथों में पाकिस्तान की सत्ता सौंपी। 1951 में लियाकत अली खान की हत्या कर दी गई। उनका कार्यकाल 4 साल 61 दिन तक चला। लियाकत अली न सिर्फ पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री थे, बल्कि पाकिस्तान के अब तक के इतिहास में इस पद पर सबसे ज्यादा वक्त बिताने के मामले में वे दूसरे नंबर पर हैं। लियाकत अली खान की हत्या के बाद सर ख्वाजा निजामुद्दीन को प्रधानमंत्री बनाया गया, लेकिन 1953 में गवर्नर जनरल मलिक गुलाम मुहम्मद ने उनकी सरकार को भंग कर दिया।

उनके बाद एक डिप्लोमेट रहे मोहम्मद अली बोगरा को पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनाया गया, लेकिन 1954 में विधायी चुनाव के बाद गवर्नर जनरल ने 1955 में उन्हें पद से हटा दिया। चौधरी मोहम्मद अली 1955 में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने और वे देश के चौथे प्रधानमंत्री थे, लेकिन उन्हें उनकी ही पार्टी ने अविश्वास प्रस्ताव पारित करके प्रधानमंत्री के पद से हटा दिया।

भारत में नेहरू, पाकिस्तान में 7 : 1956 में हुसैन शहीद सुहरावर्दी पाकिस्तान के 5वें प्रधानमंत्री बने। उनकी भी अपनी पार्टी पर पकड़ ढीली पड़ी और समर्थन दे रही पार्टियों ने समर्थन वापस लेकर कुर्सी से उतार दिया। 1957 में इब्राहीम इस्माइल चुंद्रीगार पाकिस्तान के छठे प्रधानमंत्री बने और उनका कार्यकाल सिर्फ दो महीने ही चला। सर फिरोज खान नून 1957 में पाकिस्तान के सातवें प्रधानमंत्री बने और उनकी ही पार्टी से राष्ट्रपति बने इश्किंदर मिर्जा ने 1958 में अपना कार्यकाल आगे बढ़ाने के लिए संवैधानिक तख्तापलट कर दिया और नून की कुर्सी चली गई। इस समय तक पाकिस्तान 7 प्रधानमंत्री देख चुका था, जबकि भारत में पंडित जवाहर लाल नेहरू पहले प्रधानमंत्री के रूप में मजबूती से देश को आगे बढ़ा रहे थे।
13 दिन के प्रधानमंत्री : 1971 में नूरुल इस्लाम सिर्फ 13 दिन के लिए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने थे। वे पाकिस्तान के 8वें प्रधानमंत्री थे। राष्ट्रपति पद छोड़कर 1973 में जुल्फीकार अली भुट्टो पाकिस्तान के 9वें प्रधानमंत्री बने, लेकिन उनकी सरकार भी 4 साल से पहले ही गिर गई। जनरल जिया ने 1977 में सत्ता अपने हाथ में ली और भुट्टो की सरकार को उखाड़ फेंका। मुहम्मद खान जुनेजो 1985 में पाकिस्तान के 10वें प्रधानमंत्री बने और तीन साल से अधिक समय तक इस पद पर रहे।

पहली महिला प्रधानमंत्री : 1988 में बेनजीर भुट्टो पाकिस्तान की पहली महिली प्रधानमंत्री बनीं, लेकिन उनका कार्यकाल भी एक साल, 8 महीने के करीब ही चल पाया। 1990 में नवाज शरीफ ने देश की कमान संभाली और देश के 12वें प्रधानमंत्री बने, लेकिन राष्ट्रपति गुलाम इशाक खान ने अप्रैल 1993 में उनकी सरकार को भंग कर दिया। 1993 में एक बार फिर पाकिस्तान की कमान बेनजीर भुट्टो के हाथ में आ गई, लेकिन नवंबर 1996 में राष्ट्रपति फारुक लेघारी ने बेनजीर को सत्ता से बेदखल कर दिया। 1997 में नवाज शरीफ ने एक बार फिर सत्ता में लौटे, लेकिन 1999 में जनरल परवेज मुशरफ ने उनकी सरकार को उखाड़ फेंका और देश में सैन्य कानून लागू कर दिया।
इस्तीफा देने वाले पहले प्रधानमंत्री : 2002 में मीर जफरुल्ला खान जमाली पाकिस्तान के 15वें प्रधानमंत्री बने, लेकिन जून 2004 में उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद पाकिस्तानी संसद ने चौधरी सुजात सुहैत को प्रधानमंत्री चुना, लेकिन वे 57 दिन तक ही इस कुर्सी पर रहे। अगस्त 2004 में शौकत अजीज देश के 17वें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली, लेकिन उनका कार्यकाल भी तीन साल, ढाई महीने करीब चला। इस तरह से वे पहले प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने सदन का कार्यकाल पूरा होने पर इस्तीफा दिया था।

सबसे ज्यादा कार्यकाल वाले प्रधानमंत्री : 2008 के चुनावों में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी को बहुमत मिला और यूसुफ रजा गिलानी पाकिस्तान के 18वें प्रधानमंत्री बने। उनका कार्यकाल चार साल 3 महीने चला, लेकिन साल 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें संसद में उनके पद से डिस्क्वालिफाई कर दिया। गिलानी पाकिस्तान के इतिहास में सबसे अधिक समय तक प्रधानमंत्री की कुर्सी पर रहे। गिलानी के बाद राजा परवेज अशरफ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने। परवेज अशरफ ने करीब 9 महीने तक देश में अपनी हुकूमत चलाई।
ऐसे मिली इमरान को सत्ता : जून 2013 में नवाज शरीफ एक बार फिर चुनाव जीतने के बाद सत्ता में लौटे, लेकिन पनामा पेपर लीक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई 2017 में उन्हें इस पद के लिए अयोग्य घोषित कर दिया। करीब 4 साल, 2 महीने के उनके कार्यकाल का अंत इस तरह हुआ। पार्टी ने शाहिद खकान अब्बासी को सत्ता सौंपी और 300 दिन से अधिक समय तक वे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री रहे।

क्रिकेट के पिच से सियायत तक : इमरान खान को बेहतरीन क्रिकेटरों में गिना जाता है। इमरान ने 1992 का वर्ल्ड कप पाकिस्तान को जिताकर ही दम लिया। इमरान जब क्रिकेटर थे तभी उन्हें राजनीति में आने के ऑफर आने लगे। 1987 में पाकिस्तान के तब के पीएम मोहम्मद जिया-उल-हक ने अपनी पार्टी में शामिल होने का न्योता दिया, जिससे उन्होंने इंकार कर दिया। नवाज शरीफ की पार्टी PML-N ने भी इमरान को अपने साथ जोड़ने की कोशिश की।
राजनीतिक पार्टी की स्थापना : क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद इमरान राजनीति में आ गए। 1996 में अपनी राजनीतिक पार्टी PTI की स्थापना की। 1997 में दो सीटों से चुनाव लड़ा और दोनों ही जगह से नवाज की पार्टी के उम्मीदवार से हार गए। 2002 में फिर से इमरान ने आम चुनाव लड़ा। उन्हें उम्मीद थी कि इस बार उनकी पार्टी सत्ता में आ जाएगी।

नहीं मिला बहुमत : इमरान तो जीत गए लेकिन उनकी पार्टी बहुमत से काफी दूर रही। अक्टूबर 2007 में परवेज मुशर्रफ ने पाकिस्तान में इमरजेंसी का ऐलान कर दिया और इमरान को नजरबंद कर लिया गया। अक्टूबर 2011 में लाहौर में इमरान ने 1 लाख से ज्यादा समर्थकों को संबोधित किया। मार्च 2013 में इमरान 'नया पाकिस्तान' बनाने का नारा लेकर आए। इस चुनाव में पीटीआई तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी। 2018 के चुनाव में इमरान खान की पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी ने सहयोगी दलों के साथ मिलकर सरकार बनाई। इमरान खान देश के 22वें प्रधानमंत्री बने।
शपथ में हुए नर्वस, उर्दू बोलने में लड़खड़ाई जुबान :
पाकिस्तान के राष्ट्रपति भवन, एवान-ए-सद्र में आयोजित एक सादे समारोह में पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) प्रमुख 65 वर्षीय खान को राष्ट्रपति ममनून हुसैन ने पद की शपथ दिलाई। काले रंग की शेरवानी पहने खान कुछ नर्वस से नजर आ रहे थे क्योंकि शपथ पढ़ने के दौरान वे उर्दू के शब्दों को बोलने में अटक रहे थे। इमरान को शपथ के वक्त ऊर्दू के कुछ शब्द बोलने में परेशानी हुई। इमरान 5 बार अटके। ब-हैसियत खातिमम नबीही को ब-हैसियत खातिमे बोलकर अटके। रोज-ए-कयामत को रोज़-ए-कियादत बोलकर सॉरी कहा। साथ ही और ये कि मैं हर हालत में... बोलते वक्त जुबान लड़खड़ाई। बिला खौफ-ए-रियायत और बिला रखबतो इनायत बोलने में परेशानी हुई। इमरान ब-हैसियत वजीर-ए-आजम बोलने में भी अटक गए।
क्रिकेटरों को बनाया मेहमान, सिद्धू भी शामिल : 1992 में क्रिकेट विश्व कप में पाकिस्तान को जीत दिलाने वाले कप्तान खान ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में पुराने साथी क्रिकेटरों को भी बुलाया है। सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा, पूर्व क्रिकेटर नवजोतसिंह सिद्धू, क्रिकेटर से कमांटेटर बने रमीज राजा, पूर्व तेज गेंदबाज वसीम अकरम सहित कई अन्य इमरान की ताजपोशी में शामिल हुए।
तीन शादियां : इमरान खान ने तीन शादियां की हैं। उन्होंने पहली शादी 1995 में जेमिमा गोल्डस्मिथ से की। उनसे उनका 2004 में तलाक हो गया। 2014 में उन्होंने रेहम खान से शादी की। यह शादी एक साल भी नहीं टिकी।
2018 में इमरान ने बुशरा बीबी से शादी की।

काला जादू करती हैं बुशरा : दिलचस्प बात यह है कि बुशरा को 'काला जादू' करने वाला बताया जाता है। इमरान के बारे में भी कहा जाता है कि वे पार्टी के अंदर विरोध के स्वर या महिलाओं की नाराजगी पर बुशरा को आगे कर देते थे। इसके चलते उन्हें 'गॉडमदर' तक का दर्जा दिया गया है। पार्टी के सदस्यों की पार्टी से ज्यादा बुशरा के प्रति वफादारी है। वे खुद को मिस्टिक और आध्यात्मिक हीलर बताती हैं। कहा जाता है कि वे काफी गुस्से वाली बुशरा ने 20 पाकिस्तानी अधिकारियों का ट्रांसफर सिर्फ इसलिए करा दिया था, क्योंकि वे उनके लिए दरवाजा खोलने में देर कर रहे थे।



और भी पढ़ें :