शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2022
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उम्मीदवार और मतदाता बढ़ते ही गए

मंगलवार,जुलाई 5, 2022
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एक सामान्य मतदाता के लिए देश की सरकार उससे जुड़ी जानकारी तलाशना, कार्ड बनाना और मतदाता सूची में नाम दर्ज करने तक के कई कार्यों पर व्यय करती है। वह इसलिए कि देश का आम मतदाता वोट दे और अपनी पसंद का उम्मीदवार, जो उसकी कसौटी पर खरा उतरे, उसे चुने। परंतु ...
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चुनाव आयोग और राजनीतिक दल हमेशा उपयुक्त मौसम को देखकर ही चुनाव की तिथि को तय करते हैं। जाहिर है, भारतीय परिस्थितियों में हर पक्ष का ध्यान रखना होता है। कहीं वर्षा, विवाह या त्योहार का वक्त तो नहीं है जिससे कि मतदान प्रतिशत प्रभावित न हो। परंतु कुछ ...
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चुनाव में यह भी जरूरी नहीं है कि सभी दलों द्वारा मैदान में खड़े उम्मीदवार मतदाता की पसंद के हों। अलग-अलग विचारधाराओं और सोच के उम्मीदवार मतदाता की कसौटी पर खरे उतरें। चूंकि मतदाताओं की अपेक्षाएं बढ़ गई हैं, अत: मत देना और उम्मीदवार का चयन करना मतदाता ...
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इंदौर नगर पालिका से निगम बनने का वर्ष अक्टूबर 1956 रहा है। इस तरह इंदौर नगर में पहले महापौर कांग्रेस के ईश्वरचंद जैन (1956-57) चुने गए थे। वर्ष 1958 में पहली नगर निकाय के चुनाव हुए थे। इसमें कांग्रेस को पराजय का सामना करना पड़ा था। कारण था कॉमरेड ...
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प्रशासकों द्वारा नगर निगम संचालित करने का सिलसिला 1957-58 से आरंभ होता है, इस पद पर बैठने वाले पहले व्यक्ति थे श्री नारायणसिंहजी। इनको तब इसलिए यह दायित्व सौंपा गया था कि निर्धारित अवधि तक विधान के अनुसार इंदौर नगर निगम के निर्वाचन नहीं हो सके थे। ...
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7 नवंबर 1956 का वह दिन था, जब इंदौर नगर निगम के पहले महापौर श्री ईश्वरचंद्र जैन बने। श्री जैन 1955 के निर्वाचन में वार्ड नं. 18 से कांग्रेस के प्रत्याशी के रूप में पार्षद बने थे तथा श्रम शिविर से निकलने वाले समाचार पत्र 'जागरण' के संपादक भी थे। निगम ...
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मध्यप्रदेश बनने के बाद इंदौर नगर निगम के पहले चुनाव फरवरी 1958 में संपन्न हुए। तत्कालीन इंदौर 35 वार्डों में बंटा हुआ था, इनमें से 5 वार्डों को (वार्ड 1, 3, 8, 12 एवं 16) सामान्य एवं सुरक्षित 2 पार्षद भेजने का अधिकार था, अत: निगम में पार्षदों की ...
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नगर निगम हो या कोई भी चुनाव हमेशा उम्मीदवारों के चयन को लेकर पार्टी स्तर पर हो या स्थानीय स्तर पर कश्मकश की स्थिति बनती रही है। नगर निगम के 1958 से 2022 तक के चुनावों के इतिहास को देखें तो हमेशा ही पार्षद हो या महापौर के चयन को लेकर प्रमुख दलों में ...
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चुनाव में मुद्दे वास्तव में बहुत ही प्रभावशाली होते हैं, जिनके आधार पर चुनाव लड़ा जाता है। वे चुनाव की लहर को अपनी ओर मोड़ देते हैं। मुद्दे जन सामान्य की जुड़ी वे समस्या होते हैं, जो सीधे मतदाता को प्रभावित करते है। ऐसा ही नजारा रहा है इंदौर के नगर ...
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61वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1988 के तहत मतदान की आयु सीमा 21 से घटाकर 18 वर्ष कर दी गई। इस संशोधन से यह हुआ कि 1989 में आम चुनाव में 18 से 21 वर्ष के आयु वर्ग के तकरीबन 3.5 करोड़ मतदाताओं ने पहली बार मतदान में हिस्सा लिया। और यह भी अंदेशा रहा कि ...
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स्थानीय निकाय के चुनावों की घोषणा होते ही सत्ता एवं प्रमुख विपक्षी दल के शीर्ष नेतृत्व ने इस बार युवा नेताओं को तव्वजो देने का मन बार-बार जाहिर किया। वास्तव में यह होना भी चहिए ताकि हर दल में नए चेहरों को मौका मिले। यदि हम इंदौर की राजनीति के इतिहास ...
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1950 में चयनित नगर पालिका का कार्यकाल 3 वर्ष का था, जो 1953 में समाप्त हो गया था, परंतु नए चुनाव होने तक के लिए पालिका परिषद का कार्यकाल बढ़ाया गया था। मध्यभारत की सभी नगर पालिकाओं के लिए 'मध्यभारत नगर पालिका विधान 1954' स्वीकृत किया गया था, जो 26 ...
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आजादी के बाद इंदौर की जनता ने स्वतंत्र भारत के पहले चुनाव के रूप में नगर सेविका (इंदौर म्युनिसिपलिटी) के चुनाव में मतदान का उपयोग किया। इंदौर मध्यभारत की प्रथम श्रेणी की नगर पालिका थी। इंदौर की जनता के लिए यह गर्व की बात है कि उन्होंने भारतीय ...
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देश और राज्य की व्यवस्था को संचालित करने के मुख्य प्रशासन की भूमिका रहती है, पर स्थानीय स्तर पर कार्यों को क्रियान्वित करने के लिए स्थानीय शासन की व्यवस्था होनी चाहिए। होलकर राज्य को संचालित करने के लिए राजा प्रमुख होता था, परंतु नगर पालिका तो नगर ...
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