इंदौर नगर की महत्वपूर्ण इमारतें

में राजप्रासादों के अतिरिक्त राज्य की ओर से कुछ महत्वपूर्ण इमारतों का भी निर्माण करवाया गया। महाराजा तुकोजीराव (तृतीय) की अल्पवयस्कता काल में (1903 से 1911 ई.) होलकर प्रशासन, कौंसिल ऑफ रीजेंसी द्वारा संचालित था। उक्त अवधि में राज्य के लोक निर्माण विभाग में आमूल प्रशासनिक परिवर्तन किए गए। योरपियन इंजीनियर श्री कावले की सेवाएं ब्रिटिश इंडिया से प्राप्त की गईं। नवंबर 1903 में इंदौर आकर श्री कावले ने कार्यभार ग्रहण किया। इंदौर में भवनों के निर्माण की विशिष्ट शैली अपनाई गई जिनकी छाप स्पष्ट परिलक्षित होती है।

: शिक्षा के विस्तार हेतु महाराजा शिवाजीराव ने अपने पिता की स्मृति में 1893 ई. में लगभग 3 लाख रु. की लागत से इस सुंदर इमारत व परिसर का निर्माण करवाया था। 2 मंजिला इस श्रेष्ठ इमारत में मध्य का बड़ा केंद्रीय हॉल व 2 छोटे हॉल हैं। इनके तीनों ओर अध्यापन कक्ष निर्मित किए गए हैं। इसी भवन के समीप रसायन शास्त्र व भौतिक शास्त्र की प्रयोगशालाएं बनाई गई थीं। महाविद्यालय में विस्तारित खेल मैदान, तरणताल व टेनिस कोर्ट यहां की विशेषता है। महाविद्यालय के समीप ही छात्रावास निर्मित किया गया।
इंदौर होटल (विश्वविद्यालय प्रशासनिक भवन) : रेलवे स्टेशन के समीप इंदौर होटल के सुंदर भवन का निर्माण वर्ष 1929 में महाराजा यशवंतराव होलकर (द्वितीय) द्वारा करवाया गया था। इस इमारत की डिजाइन रतलाम में निवास कर रहे श्री बर्नाड ट्रिग ने किया था, जो भवन निर्माण में डिग्रीधारी इंजीनियर थे। लाल पत्थरों व जालियों का उपयोग इस एक मंजिला इमारत में किया गया है। भवन को काफी ऊंचे प्लेटफॉर्म पर बनाया गया है।
स्वाधीनता पश्चात जब 1964 में इंदौर विश्वविद्यालय (अब देवी अहिल्या वि.वि.) की स्थापना हुई तो राजपरिवार द्वारा इस होटल के साथ-साथ संपूर्ण भूमि व परिसर के समस्त भवन विश्वविद्यालय को दान कर दिए। आज भी इसी भवन में विश्वविद्यालय का प्रशासनिक कार्यालय संचालित है।
: इंदौर की जनता में सामान्य रूप से एम.वाय. के नाम से जाना जाने वाला महाराजा यशवंतराव होलकर चिकित्सालय प्रदेश का सबसे बड़ा व भव्य चिकित्सालय भवन है। राजबाड़े के समान इसे भी 7 मंजिलों में बनाया गया। ग्रामीण क्षेत्रों में यह 7 मंजिला अस्पताल के नाम से विख्यात है। 1955 में इस भवन का निर्माण कार्य 66 लाख रु. की लागत से पूरा हुआ था। इसका वास्तु विन्यास इतनी कुशलता से तैयार किया गया है कि प्रत्येक वार्ड में पर्याप्त हवा-प्रकाश उपलब्ध रहता है।
निर्माण के लगभग 40 वर्षों बाद इस भवन की मरम्मत व कायाकल्प का अभियान 1995 में चलाया गया जिसके फलस्वरूप भवन को नवजीवन मिला और इसके सौंदर्य में वृद्धि हुई। नवंबर 2014 में भी सफाई अभियान चलाया गया। इस विशाल भवन के निर्माण हेतु उदारतापूर्वक दान देने वाले होलकर वंश के अंतिम शासक यशवंतराव होलकर की प्रतिमा चिकित्सालय भवन के सामने स्थापित है।

: सचिवालयीन कार्यालयों को एक ही परिसर में स्थापित करने के उद्देश्य से महाराजा शिवाजीराव ने 2 मंजिला एक सुंदर इमारत का निर्माण 1.50 लाख रु. की लागत से करवाया था। जन-सामान्य में यह भवन 'मोती बंगला' के नाम से जाना जाता है। उस समय लगभग सभी महत्वपूर्ण विभागों के कार्यालय इस इमारत में लगाए जाते थे। आजादी के बाद इस भवन में इंदौर संभाग के संभागायुक्त का कार्यालय स्थापित किया गया, जो आज तक यहीं चलता है। इसी परिसर में अब म.प्र. के वाणिज्यिक कर आयुक्त, श्रमायुक्त, संभागीय लोकायुक्त कार्यालय स्थित हैं।

: रेलवे स्टेशन के समीप यात्रियों की सुविधा के लिए 1907 ई. में महारानी सराय का निर्माण करवाया गया था। महारानी वाराणसीबाई साहेबा, जो म. शिवाजीराव होलकर की पत्नी थी, की स्मृति में इस सराय को बनवाया गया था। आम लोगों के मध्य यह भवन 'रानी सराय' के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है कि इस भवन में लगे काले पत्थर रालामंडल के पहाड़ से लाए गए थे। बोल्डरों से निर्मित इस पथरीली इमारत का डिजाइन बंबई की मे. चार्ल्स स्टीवेन्स एंड कंपनी ने किया था।
भवन में मुगल स्थापत्य शैली में मीनारों का निर्माण किया गया है और पत्थरों की बारीक जालियां लगाई गई हैं। इस भवन के भीतर काफी बड़ा चौगान है। इस चौगान की सुंदरता बढ़ाने के लिए इसके मध्य में एक सुंदर फव्वारा बाद में महारानी चंद्रावतीबाई द्वारा लगवाया गया था। आजादी के बाद काफी समय तक इस भवन का उपयोग छात्रावास के रूप में किया जाता रहा। वर्तमान समय में यहां डीआईजी तथा पुलिस अधीक्षक कार्यालय लगता है।
: सचिवालय (मोती बंगले) के समीप ही न्यायालय भवन का निर्माण 1910 ई. में ढाई लाख रु. की लागत से करवाया गया था। इस भवन का विन्यास भी बंबई की चार्ल्स स्टीवेन्स एंड कंपनी द्वारा किया गया था। इस विदेशी कंपनी ने इंदौर में निर्मित भवनों का विन्यास भारतीय वास्तु शैली में किया था। न्यायालय भवन के पूर्व व पश्चिम दोनों ओर प्रवेश द्वार रखे गए हैं। भवन को अग्नि प्रतिरोधी बनाने के लिए पूरी इमारत पत्थरों की बनाई गई है। मुगलकालीन भवनों के समान इसमें लाल पत्थरों और पत्थर की बारीक जालियों का सुंदर प्रयोग किया गया है। महाराजा तुकोजीराव (तृतीय) के शासनकाल में बनी यह भव्य इमारत शताब्दी पूरी करने के बाद भी मजबूत व सुंदर दिखाई देती है। इस भवन में जिला न्यायालय व अन्य न्यायालयों का संचालन होता है।
: 2 मंजिला इस स्कूल भवन का निर्माण 1918 ई. में महाराजा तुकोजीराव (तृतीय) द्वारा उनके पिता महाराजा शिवाजीराव की स्मृति में करवाया गया था। खुले मैदान के एक छोर पर निर्मित इस भवन पर 2,21,500 रुपए खर्च किए गए थे। भवन निर्माण मे. पंडित श्यामनाथ एवं लाला हकूमतराय की देखरेख में हुआ था। भवन के सम्मुख पोर्च बनाया गया है व क्लास रूम्स के बाहर बरांडा दिया गया है।
किंग एडवर्ड हॉल (गांधी हॉल) : किंग एडवर्ड हॉल जिसे आजादी के बाद 'गांधी हॉल' कहा जाने लगा, 1905 में बनवाया गया था। आम जनता द्वारा 'घंटाघर' कहलाने वाले इस भवन का वास्तु विन्यास बंबई के श्री स्टीवेन्स ने तैयार किया था। इंडो-गोथिक शैली में निर्मित इस इमारत में राजस्थानी स्थापत्य शैली का भीसुंदर समन्वय किया गया है।

2.50 लाख रुपयों की लागत से निर्मित इस भवन में पत्थरों का बेहतरीन तरीके से उपयोग किया गया है। भवन के ऊपर चारों ओर घड़ियां लगाकर गोल गुम्बद बनाया गया है। यहां निर्मित हॉल में लगभग 2000 व्यक्तियों के बैठने की व्यवस्था है। इसकी भीतरी छत प्लॉस्टर ऑफ पेरिस से निर्मित की गई थी जिस पर सुनहरे रंग से सजावट की गई थी। भवन का फर्श सफेद व काले संगमरमर से बनाया गया है। वर्ष 2014 में इसके जीर्णोद्धार की योजना बनाई गई।



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