हिन्दी कहानी : रहस्य



दुनिया के इतिहास में अभी तक हड़प्पा सभ्यता की लिपि को नहीं पढ़ा जा सका है। आखिर क्या कहना चाहते थे सिन्धु घाटी सभ्यता के लोग? कुछ तो संदेश हमें देना चाहते थे। इसी प्रयास में लगे में इतिहास के प्रोफेसर विजय सिंह के हाथ कुछ ऐसा लगा कि वे उछल पड़े, मारे खुशी के झूमने लगे। घड़ी में देखा शाम के 6 बजे थे। कैंपस में सन्नाटा ही सन्नाटे को मात दे रहा था। तभी अचानक उनके बेसिक फोन की घंटी बजी। उठाया तो अंदर से आवाज आई, 'प्रोफेसर तुम जो काम कर रहे हो उसे तुरंत बंद करो वरना...'। इससे पहले कि प्रोफेसर कुछ बोलते, फोन कट चुका था। आखिर कौन हो सकता है, जो मुझे रोकना चाहता?

जल्दी से प्रोफेसर ने अपना ऑफिस बंद किया और तेज-तेज कदमों से बाहर की ओर चलने लगे। स्वयं के कदमों की आवाज ही उनकी धड़कनें बढ़ा रही थीं। मन ही मन सोचते हुए जा रहे थे कि का पता चल गया। क्या सच में ऐसा संभव हो सकता? आखिर उस तक पहुंचना है मुझे। कुछ इसी प्रकार के खयालों में खोए हुए अपनी ही धुन में प्रोफेसर विश्वविद्यालय के गेट के बाहर निकले ही थे कि इतने में तीन स्कार्पियो ने उनका रास्ता रोका।

इससे पहले कि प्रोफेसर चिल्लाते, उनमें से 3-4 व्यक्ति उतरे एवं जबरन उनको अंदर बिठाकर चल पड़े। किसी सुनसान प्राचीन खंडहर में लाकर पटक दिया। प्रोफेसर इतने बलीष्ट भी नहीं थे कि उन सभी से मुकाबला कर सकें। कुछ लोग उनके आसपास में मुस्तैदी से खड़े थे। उन सभी का चेहरा किसी काले कपड़े से बंधा हुआ था, सिर्फ आंखें ही दिखाई दे रही थी। ऐसे में उनको पहचानने की कोशिश करना व्यर्थ था। ये लोग ऐसा क्यों कर रहे हैं? क्या आज ही इनको ये सब करना था? जबकि अभी-अभी मैंने अपने जीवन का सबसे बड़ा रहस्य खोज निकाला। मेरी तो किसी से कोई दुश्मनी भी नहीं।

कुछ इसी प्रकार के विचारों में वे डूबे हुए थे कि इतने में उन सभी का मुखिया सामने आया। उसके चेहरे पर भी काला कपड़ा बंधा था। बाहर से देखने में वह कद में काफी लंबा, बॉडी पहलवान की तरह एवं शरीर का रंग थोड़ा काला था। विजयसिंह सोचने लगे- 'ये गुंडे इतने ताकतवर और प्रोफेसर इतने कमजोर क्यों होते? मैंने आज तक किसी पहलवान प्रोफेसर को नहीं देखा। क्या मुझे भी अखाड़े जाना चाहिए था?'

इतने में मुखिया प्रोफेसर के सीधे सामने आकर बोला- 'ओय प्रोफेसर... तोहार जो रिसर्च हमार आर्यों पर किया, वाको तुरंते ही वापस लो, वरना तोहार जान गई। जल्दी ही अपना रिसर्चवा मीडिया औरन पत्रकारनवा के यीहां धरन दो कि ये ससुरा आर्यनवा विदेशी नहीं बल्कि यीहा भारतीयन ही थे।

उसने प्रोफेसर के मुंह के पास आकर रौबदार आवाज में कहा- 'प्रोफेसर ई बात अच्छे से समझ लो। हमारी पहचान पर अगर जरा सी आंचनवा आई तो तोहार गुर्दे छिलन के छतरी बनाय लेवेंगे। समझा के नहीं?' प्रोफेसर के अब कुछ कुछ समझ आ रहा था कि बात क्या है।

'माफ करना भाई साहब, किंतु वाली बात को तो 6 महीने से ऊपर हो गया। आप किसी को इस तरह नहीं मनवा सकते। इतिहास में जो सही है, उसको कितने दिन छिपाओगे? जोर-जबरदस्ती से क... ब... त... क... किसी... को...?' प्रोफेसर आगे भी कुछ बोलना चाहते थे किंतु उस व्यक्ति ने उनका गला जोर से दबा दिया।
अब प्रोफेसर साहब को सांस लेना भी मुश्किल हो रहा था। अब वे मर जाएंगे। ऐसे लोग किसी पर दया नहीं करते। उन्होंने के आतंकवादियों के वीडियो वॉट्सएप पर देख रखे थे। अब तो गए काम से। आर्यों के आगमन ने तो मरवा दिया। कम से कम एक चाय पिलाकर तो गला दबाते। प्रोफेसर को चाय का बहुत ही शौक था। एक बार आखिरी ख्वाहिश तो पुछते। विजय सिंह कुछ इसी प्रकार के विचारों से सामना कर रहे थे कि इतने में उसने गला छोड़ दिया। जान में जान आई। बच गए।
'ऐ... प्रोफेसरवा... ज्यादा ज्ञान मत पिला वरना... याईस इसी जगह ससुरे 3-3 को एकन गोली से मारा है। हा... हा... हा... हा... साला आया इतिहास का ज्ञान देने। उसने इसे कुछ फिल्मी कुछ रजनीकांत के अंदाज में कहा। 'ठीक... है... ठीक... है... जैसा आप चाहते हो, वैसा ही होगा', प्रोफेसर ने पिंड छुड़ाने के लिए हां में हां मिलाई।





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