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कही-अनकही 10 : स्पेशल डे

शनिवार,सितम्बर 25, 2021
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कोई अपने परिवार के सदस्यों को खाने-पीने से कैसे रोक सकता है? इतनी घृणित मानसिकता दूध के जले लोगों की ही हो सकती है। इन ‘कही-अनकही’ बातों के दर्द से रीसते घावों को सहलाते हुए उस दिन एक साथ फिर चाय-कॉफ़ी का आनंद उठाया।
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मंच पर बड़े-बड़े अक्षरों में कार्यक्रम का विषय लिखा था अपनी मातृभाषा हिन्दी को कैसे बचाएं। उसका मन कह रहा था कि हिन्दी हमारी मातृभाषा है या मात्र एक भाषा....!
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दादी ने तोहफे में दे दी जीजाजी को वही ‘सोने की गिन्नी’ जो एना के पापा ने आदि के पापा को दी थी। जीजाजी ने मना किया, लेकिन दादीजी कहां मानने वाली थीं... फिर एना ने जीजाजी के पैर छुए। जीजाजी ने वही सोने की गिन्नी एना को आशीर्वाद स्वरुप दे दी।
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परिदृश्य : एना और आदि की शादी है और आदि का परिवार एना के माता-पिता को आश्वासन दे रहा है... ‘आप चिंता न करें भाईसाहब, हमारे घर भी दो-दो बेटियां हैं । जैसी वो दोनों, वैसी ही एना भी हमारे लिए रहेगी।’
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‘एना, आज से गांठ बांध लो, न यहां की कोई बात मायके में करनी है, न मायके की बात यहां। अब तुम यहीं की हो, यहीं के हिसाब से रहो और नौकरी छोड़ दो तुम। क्या करोगी 10 घंटे की नौकरी कर के? पति का ख्याल कैसे रखोगी?’
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सूरज क्षितिज की गोद से निकला, बच्चा पालने से- वही स्निग्धता, वही लाली, वही खुमार, वही रोशनी। मैं बरामदे में बैठा था। बच्चे ने दरवाजे से झांका। मैंने मुस्कुराकर पुकारा।
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रामधन अहीर के द्वार एक साधू आकर बोला- बच्चा तेरा कल्याण हो, कुछ साधू पर श्रद्धा कर। रामधन ने जाकर स्त्री से कहा- साधू द्वार पर आए हैं, उन्हें कुछ दे दे।
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रिश्तों में स्पष्ट संचार और वार्तलाप बेहद आवश्यक है, मस्ती-मजाक, रूठना-मनाना भी रिश्तों को मजबूती देता है, एक-दूसरे को समय देना और एक-दूसरे की निजता का भी सम्मान करना ज़रूरी है... लेकिन क्या इसकी आड़ में हर बात पर ‘अबोला’ सही है?
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‘सादगी’ के नाम पर दिखावा करने वाले ये पढ़े-लिखे आधुनिक परिवार के लोग क्या कभी अपने खुद के बेटे की ख़ुशी की कीमत पैसे से आंकना छोड़ सकेंगे? क्या ये पढ़े-लिखे बड़े कॉलेजों से पढ़ने वाले लड़के अपने घर में अपना मुंह खोल कर बदलते हुए समाज और परिदृश्य का सच अपने ...
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क्या कभी मर्द अपनी पत्नी को आगे बढ़ता हुआ नहीं देखना चाहते? या प्रोत्साहित करने का दिखावा कर उन्हें घर बैठाना चाहते हैं? क्या ‘सपोर्ट’ के नाम पर उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत होते देखना उनके अहम् को ठेस पहुंचाता है? ये सभी ‘कही-अनकही’ बातें हैं और इसका ...
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प्रेम विवाह के बाद जब पति कुछ पल भी अपनी पत्नी के साथ न बिताना चाहे, तो वहां प्रेम कैसा? खैर, ये तो ‘कही-अनकही’ बातें हैं, क्योंकि आज भी न जाने कितनी लड़कियां उम्मीदों से शादी करती हैं और फिर उन्हीं उम्मीदों का गला घोंट दिया जाता है, उन्हीं लड़कियों ...
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‘आदि, क्या बना दूं खाने में?’ ‘देख लो क्या है... आलू हों तो आलू की सब्जी बना दो रस वाली...’ ‘ठीक है, तुम्हारे लिए ताज़ा बना देती हूं और मैं सुबह के दाल-चावल फ्राय कर के खा लूंगी... फालतू वेस्ट हो जाएगा वरना...’
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एना! ये क्या कर रही हो तुम? रख दो मेरा फ़ोन... हाथ भी मत लगाना...’ ‘अरे? देख रही हूं किसका फ़ोन या मैसेज था... खुद मेरा फ़ोन चेक करते हो, मैसेज चेक करते हो... यहां तक मैं अपने घरवालों से क्या बात करती हूं, ये तक हर रोज़ चेक करते हो...’
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‘फालतू बात छोड़ो... कामवाली आज नहीं आएगी, उसकी लड़की बोल के गयी है, बस वही बता रहा था... मैं तुम्हारे शाम को घर आने से पहले टूर पर निकल जाऊंगा... फ्लाइट है मेरी 4 बजे...’ ‘कौनसी फ्लाइट से जा रहे हो?’ ‘देखता हूं... तुम पैकिंग कर के तुम्हारी मम्मी के ...
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हर बच्चा चाहता है कि उसके माता-पिता उसके घर में रहें और उन्हें किसी प्रकार की कोई असुविधा न हो। लेकिन किस कीमत पर? अपनी पत्नी की खुशियों को उजाड़ कर? जब आप एक पौधा घर लाते हैं, तो भी उसकी परवरिश के लिए उचित खाद-पानी देते हैं, न कि उस पौधे से उम्मीद ...
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आज भी कई महिलाएं हैं जो किसी न किसी प्रकार की यंत्रणा सह रही हैं, और चुप हैं। किसी न किसी प्रकार से उनपर कोई न कोई अत्याचार हो रहा है चाहे मानसिक हो, शारीरिक हो या आर्थिक, जो शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता, क्योंकि शायद वह इतना 'आम' है कि उसके ...
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नीना ने घर पहुंच मां से फोन पर बात की तो पता चला कि, वे काफी बीमार है, यह सुनते ही वे तुरंत मां को अपने घर ले आई। कुछ दिन में लॉकडाउन हो गया। कोरोना के बादलों के बीच में जब भी मां नीना को सेवा के बदले आशीर्वाद देती, तो लगता बादलों को चीर सूर्य, उसके ...
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’दादाजी, मैं साइकिल चलाना नहीं सीखूंगी।’ दादाजी ने अखबार से चेहरा निकालते हुए पूछा, ’क्यों? गिर पड़ी क्या?’ मैंने अपने सही-सलामत कोहनी और घुटने दिखाते हुए कहा, ’नहीं तो! मैं कहां गिरी? ये देख लो।’
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धमम् तपड़......धमम् तपड़.... धमम् तपड़... जसोदाबाई नीम तले ढोलक ठोक रही थी। बेसुरा, बेताल। ढोलक की दोनों चाटी पर पूरे हाथ पड़ रहे थे और बेढब आवाज़ दूर तक जा रही थी। आज से पहले जसोदाबाई को इस रूप में किसी ने नहीं देखा था। ढोलक पर सदा लटकनेवाले झालरदार ...
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