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विश्व बेटी दिवस पर कविता : घर की शान होती हैं बेटियां

रविवार,सितम्बर 26, 2021
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सच्ची लगन, कर्मनिष्ठा और निरंतर प्रयास से उच्च शिखर पर बढ़ती रहो, अपनी लक्ष्मण-रेखा स्वयं खींच कर मान-सम्मान की गरिमामयी
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आज राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की जयंती है। उन्हें क्रांतिपूर्ण संघर्ष की प्रेरणा देने वाली ओजस्वी और राष्ट्रीय भावनाओं से ओतप्रोत कविताओं के कारण असीम लोकप्रियता मिली। यहां पढ़ें उनकी 6 खास रचनाएं....
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मैं वह भाषा हूं, जिसमें तुम जीवन साज पे संगत देते मैं वह भाषा हूं, जिसमें तुम, भाव नदी का अमृत पीते मैं वह भाषा हूं, जिसमें तुमने बचपन खेला और बढ़े हूं वह भाषा, जिसमें तुमने यौवन, प्रीत के पाठ पढ़े...
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पहचान है हमारी हिन्दी, हिन्दोस्तान की है ये बिंदी। घर-घर बहती है हिन्दी की धारा, विश्व गुरु बनेगा हिन्दोस्तान हमारा,
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हैं परेशान इन दिनों बहुत सारी चीजों को लेकर हम! मसलन, क्या करना चाहिए हमें- नहीं बचे जब अपना ही देश हमारे पास! कहाँ पहुँचना चाहिए तब हमें?
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जय-जय श्रीराम जय-जय प्रभु राम, मेरे मन में बसे हैं श्रीराम, मेरे रोम-रोम में बसे हैं श्री प्रभु राम
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मेरे प्रभु! मुझे इतनी ऊंचाई कभी मत देना, गैरों को गले न लगा सकूं, इतनी रुखाई कभी मत देना।
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हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन, रग-रग हिन्दू मेरा परिचय! मैं शंकर का वह क्रोधानल कर सकता जगती क्षार-क्षार। डमरू की वह प्रलय-ध्वनि हूं जिसमें नचता भीषण संहार।
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साहस आत्मबलिदान स्वरूप रंग वीरों का केसरिया, हृदय से उसका सम्मान करें ! श्वेत रंग परिचायक शांति का पवित्रता का ये आह्वान करे ! अशोक चक्र की धर्मचक्र प्रतीक चौबीस तीलियां चहुंमुखीं विकास का प्रतिनिधित्व करे!
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स्वतंत्रता दिवस की प्रथम वर्षगांठ 15 अगस्त 1948 पर रचीं पंक्तियां यहां पढ़ें
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पन्द्रह अगस्त सन् सैंतालीस को अपना देश स्वतंत्र हुआ।। उन वीरों को हम नमन करें। जिनने अपनी कुरबानी दी।।
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बहुत झूठी होती हैं ये संस्कारी लड़कियां, मत मानना इनकी बात अगर ये कहें कि चश्मे का नम्बर बदल गया है इसलिए आंखें सूजी हैं, मत भरोसा करना कि जब ये कहें कि रात को सो नहीं पाई शायद इसलिए सूजी हो आंखें, अनकही वो दास्तां उमड़ रही हैं इनकी ...
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मुझे बहुत भाती हैं वे कन्याएं जो बहुत जोर से हंस लेती हैं, मुझे गुस्सा आता है उन पर जो खुल कर हंस नहीं पाती हैं, मुझे भोली लगती हैं वे कन्याएं जो जोर से रो लेती हैं और मुझे लाड़ आता है उन पर जो खुल कर रो नहीं पाती हैं .... रो लेने दो ...
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मां तुम जो रंगोली दहलीज पर बनाती हो उसके रंग मेरी उपलब्धियों में चमकते हैं तुम जो समिधा सुबह के हवन में डालती हो उसकी सुगंध मेरे जीवन में महकती है तुम जो मंत्र पढ़ती हो वे सब के सब मेरे मंदिर में गुंजते हैं
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मां मेरे हिस्से बहुत कम आती है..! शिकायत नहीं, बस एक हकीकत है. मां हूं, पर मां की मुझे भी ज़रूरत है. देहरी लांघने से बेटी क्या बेटी नहीं रह जाती है?
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हर एक लफ्ज जो अपने लहू से धोते हैं हर एक हर्फ को खुशबू में फिर भिगोते हैं न हो मुश्क तो मुअत्तर(भीगा) है ये पसीने से इन्हीं के दम से जमाने जमाने होते हैं इन्हीं के नाम से जिंदा है ताबे-हिन्दुस्तां इन्हीं के नाम नए सूरज उजाले बोते हैं
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संत कबीर दास के दोहे आज भी पथ प्रदर्शक के रूप में प्रासंगिक है। यहां पाठकों के लिए प्रस्तुत हैं कबीर के दोहे सर्वाधिक प्रसिद्ध व लोकप्रिय दोहे-
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आज भी एक पथ प्रदर्शक के रूप में प्रासंगिक है संत कबीर दास के दोहे। यहां पाठकों के लिए प्रस्तुत हैं कबीर के दोहे सर्वाधिक प्रसिद्ध व लोकप्रिय दोहे-
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मेरे पापा तुमने चलना मुझे सिखाया... हाथ आज पकड़ता हूं.... मेरी गूं..गां... समझी तुमने.... आज शब्द में देता हूं .....
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