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कबीर पर एक उम्दा गज़ल : हर एक हर्फ को खुशबू में फिर भिगोते हैं

बुधवार,जून 23, 2021
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संत कबीर दास के दोहे आज भी पथ प्रदर्शक के रूप में प्रासंगिक है। यहां पाठकों के लिए प्रस्तुत हैं कबीर के दोहे सर्वाधिक प्रसिद्ध व लोकप्रिय दोहे-
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आज भी एक पथ प्रदर्शक के रूप में प्रासंगिक है संत कबीर दास के दोहे। यहां पाठकों के लिए प्रस्तुत हैं कबीर के दोहे सर्वाधिक प्रसिद्ध व लोकप्रिय दोहे-
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मेरे पापा तुमने चलना मुझे सिखाया... हाथ आज पकड़ता हूं.... मेरी गूं..गां... समझी तुमने.... आज शब्द में देता हूं .....
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लौट आओ पापा बहुत से उत्तरित अनुत्तरित प्रश्नों को पुनः दोहराने का मन करता है. वक़्त पर बातें छोड़ देने का आपका धैर्य थामे समय के दिए गए उत्तरों के साथ
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राणा सांगा का ये वंशज, रखता था राजपूती शान। कर स्वतंत्रता का उद्घोष, वह भारत का था अभिमान। मानसिंग ने हमला करके, राणा
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थप्पड़

सोमवार,जून 7, 2021
पता ही नहीं चल पाया हमें, हो गए कब हाथ सुन्न हमारे ! उठ ही नहीं पा रहे हैं झुके कंधों से ऊपर ! उनके हाथ तो रहते हैं हमेशा ऊपर ही
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मैंने प्यार किया है तुमको और बहुत संभव है अब भी मेरे दिल में इसी प्यार की सुलग रही हो चिंगारी
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अमीर खुसरो ने इस विधा पर बहुत काम किया। उनकी कई कह-मुकरियां बहुत प्रसिद्ध हैं। पर समय के साथ अन्य शास्त्रीय छंदों एवं नई कविता के आ जाने से इसका सृजन कम होने लगा और अब तो अनेक नए कवि इस सुंदर विधा का नाम तक नहीं जानते।
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मैंने अचानक अपने व्हाट्सएप पर देखा तो वह अनेक हिदायतें और आशीर्वादों से भरा था
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जिनके साथ बचपन में खेला, जिनसे सुनी लोरियां मैंने, जिनका साया छांव थी मेरी
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हाथों में कुल्हाड़ी को देखा तो बहुत रोया, इक पेड़ जो घबराकर रोया तो बहुत रोया
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जीवन को सुरभित करलो और सारे जग को महकाना, इस विद्या को चंदन से, ज्यादा कब किसने पहचाना,
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वह एक तुम्हारा स्पर्श ही तो था कि जिससे होती थी ईश्वर के होने की अनुभूति कोरोना ने मुझे निरीश्वर कर दिया।
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इबादत और दुआओं के न जाने न जाने कितने लफ्ज़ मिलते हैं दुनिया भर के फूल अब रोज़ मेरे फ़ोन में खिलते हैं
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ये तो लाशें हैं साब, ये प्रश्न कहां करती हैं, अगर ये बिलखते बच्चे होते, तो अपने मर चुके मां-बाप का पता पूछते,
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स्वप्न जो देखा था रात्रि में हमने सुबह अश्रु बन बह किनारे हो गए हैं चांद और मंगल पर विचरने वाले हम आज कितने बेसहारे हो गए हैं विकास की तालश में हमने हमेशा
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मां, तुम्हारी स्मृति, प्रसंगवश नहीं अस्तित्व है मेरा। धरा से आकाश तक
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मां, मां रोते हुए बच्चों का खुशनुमा पलना है, मां, मां मरूथल में नदी या मीठा सा झरना है।
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कैसे चलते होंगे वे गैरों की अंगुलियां थामकर, जिंदगी जिनकी दूसरों की रहनुमा होती है। खुद गीले में सो, हमें सूखे में सुलाने वाली, वह मां तो खुद ईश्वर का रूप होती है।
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