धर्म पर कबीर के तीखे दोहे आंखें खोल देंगे आपकी

धर्म किये धन ना घटे, नदी न घट्ट नीर।
अपनी आखों देखिले, यों कथि कहहिं कबीर।

धर्म परोपकार, दान सेवा करने से धन नहीं घटना, देखो नदी सदैव बहती रहती है, परन्तु उसका जल घटना नहीं। धर्म करके स्वयं देख लो, कभी भी धन की धारा
कम
नहीं होगी।

कबीर, एक संत जो सालों पहले वह कह गए हैं जो आज भी प्रासंगिक है। धर्म के नाम पर आज जब राजनीति हिंसक हो चली है तब कबीर जयंती पर हम लाए हैं कुछ ऐसे दोहे जो पूरी ताकत से धर्म के दोगले चरित्र पर प्रहार करते हैं।

कस्तूरी
कुंडली
बसै
मृग
ढूँढ़ै
बन
माहि।
ऐसे
घट
घट
राम
हैं
दुनिया
देखत नाहिं।

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।

जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि है मैं नाहीं।

प्रेम गली अति सांकरी जामें दो न समाहीं।

कबीरा ते नर अँध है, गुरु को कहते और।
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर।

लंबा मारग दूरि घर, बिकट पंथ बहु मार।
कहौ संतों क्यूं पाइए, दुर्लभ हरि दीदार।

जहां दया तहां धर्म है, जहां
लोभ वहां पाप।
जहां क्रोध तहां काल है, जहां क्षमा वहां आप।

पतिबरता मैली भली गले कांच की पोत।
सब सखियाँ में यों दिपै ज्यों सूरज की जोत।

मन के हारे हार है मन के जीते जीत।
कहे कबीर हरि पाइए मन ही की परतीत।

अपनी आखों देखिले, यों कथि कहहिं कबीर।
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान।

जो तूं ब्रह्मण, ब्राह्मणी का जाया !
आन बाट काहे नहीं आया!! ”

लाडू लावन लापसी,पूजा चढ़े अपार
पूजी पुजारी ले गया,मूरत के मुह छार !!

पाथर पूजे हरी मिले,तो मैं पूजूं पहाड़ !
घर की चक्की कोई न पूजे, जाको पीस खाए संसार !!”
मुंड मुड़या हरि मिलें,सब कोई लेई मुड़ाय
बार-बार के मुड़ते,भेंड़ा न बैकुण्ठ जाय।।


माटी का एक नाग बनाके,पुजे लोग लुगाया!
जिंदा नाग जब घर मे निकले,ले लाठी धमकाया !!”

जिंदा बाप कोई न पुजे, मरे बाद पुजवाये !
मुठ्ठी भर चावल लेके, कौवे को बाप बनाय !!

हमने देखा एक अजूबा,मुर्दा रोटी खाए ,
समझाने से समझत नहीं,लात पड़े चिल्लाये !!”

कांकर पाथर जोरि के,मस्जिद लई चुनाय
ता उपर मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय

हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना,
आपस में दोउ लड़ी-लड़ी मुए, मरम न कोउ जाना।”

काहे को कीजै पांडे छूत विचार।
छूत ही ते उपजा सब संसार ।।
हमरे कैसे लोहू तुम्हारे कैसे दूध।
तुम कैसे बाह्मन पांडे, हम कैसे सूद।।”

कबीरा कुंआ एक हैं,
पानी भरैं अनेक ।
बर्तन में ही भेद है,
पानी सबमें एक ॥”

जैसे तिल में तेल है,
ज्यों चकमक में आग
तेरा साईं तुझमें है,
तू जाग सके तो जाग

मोको कहाँ ढूंढे रे बन्दे ,
मैं तो तेरे पास में।
ना मैं तीरथ में, ना मैं मुरत में,
ना एकांत निवास में ।
ना मंदिर में, ना मस्जिद में,
ना काबे, ना कैलाश में।।
ना मैं जप में, ना मैं तप में,
ना बरत ना उपवास में ।।।
ना मैं क्रिया करम में,
ना मैं जोग सन्यास में।।
खोजी हो तो तुरंत मिल जाऊं,
इक पल की तलाश में ।।
कहत कबीर सुनो भई साधू,
मैं तो तेरे पास में बन्दे…



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