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मातृ दिवस पर कविता : 'क्या है मां'

रविवार,मई 8, 2022
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अपने उजाले से जो पूरा संसार प्रकाशमय कर दे वह भुंवर की पहली किरण है मां गर्मी के थपेड़ों से भरी राह में पेड़ की शीतल छांव है मां जिस भू पर महकते फूल हैं उस धरा की मृदा है मां
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मां तुम जो रंगोली दहलीज पर बनाती हो उसके रंग मेरी उपलब्धियों में चमकते हैं तुम जो समिधा सुबह के हवन में डालती हो उसकी सुगंध मेरे जीवन में महकती है तुम जो मंत्र पढ़ती हो वे सब के सब मेरे मंदिर में गुंजते हैं तुम जो ढेर सारी चूडियां ...
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Mothers Day Poem मातृ दिवस पर मार्मिक कविता- मां, मां लोरी है, गीत है, प्यारी सी थाप है, मां, मां पूजा की थाली है, मंत्रों का जाप है। मां, मां आंखों का सिसकता हुआ किनारा है, मां, मां गालों पर पप्पी है, ममता की धारा है।
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प्रभु त्रिवेदी के दोहे- खट्टी-खट्टी कैरियां, बनती वही रसाल | कोयल की कूकू चले, जैसे हो करताल ||
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आज फिर एक और ज़मीन के टुकड़े की किस्मत फूट गई, झुग्गी-झोपड़ियों को उखाड़ कर, वहां महल की नींव खुद गई।
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परियोजनाओं के नाम पर, किया जा रहा पृथ्वी को परेशान। कोई मेधा, कोई अरुंधति बन, दे दो उसे जीवनदान।
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सोचो ज़रा अगर हम पेड़ होते जग को ठंडी छांह देते फल,पत्ते,लकड़ी भी कितने उपयोगी होते....!! नन्ही चिरैय्या अगर होते मीठी बोली से जग मोह लेते फूल होते तो रंगों से अपने सजाते कितने मन आंगन
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कविता- महिमा मैया की कितना बखाने
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माखनलाल चतुर्वेदी सरल भाषा और ओजपूर्ण भावनाओं के अनूठे हिन्दी रचनाकार थे। उन्हें 'एक भारतीय आत्मा' उपनाम से भी जाना जाता था।
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चारों तरफ छिड़ी हुई है, जंग/तबाह हो रहे हैं, शहर-दर-शहर मारे जा रहे हैं अनगिनत, बेकसूर नागरिक। घरों में कैद हैं/डरे-सहमे लोग, खिड़कियों से झांक रहा है... Poem on Yudhh
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Ram Navami Poem राम नवमी पर भगवान श्री राम को समर्पित कविता- राम जन्म जिस नवमी होता, उस नवमी की महिमा अद्भुत, सृष्टि भी होती मतवाली, दिन में होली रात दिवाली।
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जीते जी क्रांति करने वाले भगत सिंह के लिखे हुए शेर उनके बाद भी क्रांति पैदा करने की ताकत रखते हैं। देश के प्रति उनका प्रेम, दीवानगी और मर मिटने का भाव, उनकी शेर और कविताओं में साफ नजर आता है, एक बार पढ़ेंगे तो खून में देशभक्‍ति महसूस होने लगेगी।
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देश के प्रति उनका प्रेम, दीवानगी और मर मिटने का भाव, उनके शेर-ओ-शायरी और कविताओं में साफ दिखाई देता है, जो आज भी युवाओं में आज भी जोश भरने का काम करता है। पढ़ें भगत सिंह के वतन पर लिखे यह 7 शेर -
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आओ लिख दूँ अधर की स्याही से तुम्हारी देह रूपी काग़ज़ पर मूक कविताएँ जिनके महकते लफ़्ज़ तुम्हारी सुंदरता को द्विगुणित कर देंगे
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सज गए बाजार चीनी पिचकारी से केमिकल से भरी हुई रंगीन सी क्यारी से पर इनमें टेसू वाली चमक कहां से लाऊं मैं
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महिला दिवस पर कविता : नारी

सोमवार,मार्च 7, 2022
womens day poem in hindi, पुरुषप्रधान इस देश में ना मिल सका, नारी को मान..., नारी तो बस नारी है।
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नारी तुम स्वतंत्र हो, जीवन धन यंत्र हो। काल के कपाल पर, लिखा सुख मंत्र हो।
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सब रंगों से सजी है थाली, सब रंगों से लहलाना सजन, होली में घर को आना सजन।
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कहीं तो रहती होगी वह नदी ! बह रही होगी चुपचाप, छा जाते होंगे ओस भरे बादल, जिसकी कोमल त्वचाओं पर आते होंगे पक्षी, लांघते हुए
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हिन्दी कविता : रूठा बसंत

शुक्रवार,फ़रवरी 25, 2022
धरती निर्वसन सी अब क्यों दिखती…, खो गया कहां सौंदर्य तुम्हारा.. धूमिल हुए ओढ़नी के रंग सारे, बदरंग हुए ऋतुओं के रंग सारे।
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राजा दशरथ के घर बाजे शहनाई रे, गंगा मैया तोहे पियरी चढ़ाऊं, सब मिल के गावे बधाई रे, गंगा मैया तोहे पियरी चढ़ाऊं
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21 फरवरी के दिन हिन्दी जगत के प्रसिद्ध साहित्यकार सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' (Suryakant Tripathi Nirala) का जन्मदिवस मनाया जाता है। निराला जी देवी सरस्वती के साधक और वरद पुत्र थे। उन्होंने हिन्दी में देवी सरस्वती पर जितनी कविताएं लिखी हैं, उतनी ...
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भारत में रही सदा सम्पन्नता, सभ्यता, संस्कृति, छल कपट से मिटी अखण्ड भारत की आकृति। यहाँ गूंजती रहेगी महान योद्धाओं की वीरगाथा, भगवा लहराया शिवाजी ने प्रशंसनीय शौर्यगाथा।
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हर राज दिल का तुम्हें बताने को जी चाहता है हर इक सांस में तुम्हें बसाने को जी चाहता है यही है मेरे प्यार,नेह और विश्वास की बंदगी खुद से ज्यादा तुम्हें प्यार करने को जी चाहता है
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एक समुंदर पानी का, एक समुंदर रेत का, एक जमीन बंजर एक पहाड़ विशाल, मध्य जीवन रिक्त है
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शांत गीत, शांत संगीत, शांत हुई कोकिल स्वर। नाद ब्रह्म में लीन हुई, लता दीदी रहेगी अमर।। #RIPLATAJI
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लता, तुम्हारे झिंझोड़ने से उठती है हर हिन्दुस्तानी सुबह तुम्हारी थपकी से पांव पसारती है टूटती हुई दुपहरी तुम्हारे सुरों से संवरती है बलखाती इठलाती शाम तुम्हारी आश्वस्ति से नींद पाती है दिनभर कमाई थकान।
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नीलाभ व्योम ,पुलकित है रोम , धरिणी लावण्य हुई सुंदरा। स्वर्णिमपर्णा, प्रकृति है मोद , मन-मनोहारी हुई वसुंधरा। फूटा विहान दृग खोल वृंद, आलोकित पीली हुई धरा। खिला अंग-अंग ,आया बसंत उषा की ‘प्रीत’हुई मुखरा।
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खो गयी कहीं है कोयलिया क्या तुमको है ये भास हुआ सूखे पोखर और पनघट
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गीत बनकर वो आने लगे, अधरों पर मुस्कुराने लगे राज अंखियन का क्या कहूं मैं, उनके नैना कजरारे लगने लगे
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वसंत पंचमी का मन मोहने वाला पर्व है। इसे ऋतुराज वसंत के नाम से जाना जाता है। यह पर्व मन में खुशी और उत्साह लाता है। यहां पढ़ें वासंती पर्व पर 2 कविताएं...
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बसंत पहने स्वर्णहार, सुख बरसे द्वार-द्वार। चहुँओर नव बहार, मधुमास लाए नवाकार।। उषा किरणें पुलकित, बसंत सुहानी प्रफुल्लित। प्रकृति आनंदित, रम्य अद्भुत छटा आलौकित।। श्रृंगारित पलाश, सेमल, हरे-भरे खेत, उद्यान । सूर्य उज्जवल, अल्प निशा, दीर्घ ...
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