मेरी नज़र में... डॉ. रवीन्द्र नारायण पहलवान की कविता

Last Updated: मंगलवार, 14 जून 2022 (14:23 IST)
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‘कहा कुछ नहीं’

कहा कुछ नहीं
जैसे ही मेरी मौत का समाचार आया
मेरी पत्नी ने मेरे दोस्त को फोन लगाया
और कहा
मेरे और तुम्हारे बीच की दीवार आज ढह गई।
मेरे भाई ने अपनी पत्नी को फोन लगाया
और कहा
पुश्तैनी जायदाद में लगा कांटा आज निकल गया
मेरे पुत्र ने अपने मित्र को फोन लगाया
और कहा
हर बात में टोका-टाकी करने वाला
आज हमेशा के लिए चुप हो गया
मेरे प्रतिद्वन्द्वी खिलाड़ी ने
अपने पिता को फोन लगाया
और कहा
जिसके कारण मैं हमेशा फाइनल में हारता हूं
वह आज जीवन से हार गया
मेरे पड़ोसी ने अपने भाई को फोन लगाया
और कहा
जिस कारण से मैं बगल में
एक कमरा नहीं बना पा रहा था
वह कारण आज खत्म हो गया
मेरे कुत्ते ने अपने पिल्ले को
कहा कुछ नहीं
केवल आंखों से समझाया
जिसके कारण मैं जिन्दा हूं
वह आज नहीं रहा
- डॉ. रवीन्द्र नारायण पहलवान

मेरी नज़र में...

कविता

पुस्तक : डॉ. रवीन्द्र नारायण पहलवान की प्रतिनिधि कविताएं। एक कविता 'कहा कुछ नहीं' (पृष्ठ ४६)।
रिश्तों की सामयिकता, उपयोगिता, आवश्यकता, उपादेयता, अनुज्ञा और उनमें लिपटे संवेदनशील रसायनों का आस्वादन कराती डॉ. रवीन्द्र नारायण पहलवान की छोटी सी यह बड़ी कविता है। कविता सूत्रात्मक तो है पर यह प्रमेय नहीं है, मतलब कंजूसी से कहे शब्दों वाक्यों में सरलता, सहजता और साफगोई है। इसमें आत्मबोध तो है ही वहीं आज का युगबोध कांच की तरह साफ साफ देखा जा सकता है। रिश्तों का एक पहलू यहां अवरोध भी है, ऐसा कि जैसे बेरियर लगा हो जिसके टूटते ही मतलब की गाड़ी सरपट दौड़ जाती है।

कविता को यदि सिर्फ दो भागों में बांटकर देखा जावे तो लगता है इसका पहला भाग संसार की असारता का बोध कराना है और दूसरा भाग प्रकृति के मनुष्येतर प्राणियों का मनुष्य से कहीं बेहतर व्यवहार है। उन जीवों का नैसर्गिक स्वभाव है कि वे अपने आसपास मौजूद समस्त की और स्वार्थपरक व्यवहार नहीं करते हैं और कई माइनो में वे मानवों से श्रेष्ठतर संवेदना रखते हैं। कविता उनकी सशक्त मूक अभिव्यक्ति का भी परिचय कराती है वहीं आदमी के अन्तरतम में छिपे स्वार्थों पर लगी छद्म चाशनी को बड़े सरल तरीके से हटाती है।

जो रिश्ते आदमी ने आदमी से बनाए उनमें अपने लिंकेजेस अपनी तरह से डाले हैं, उन्हें अपने अपने उपयोग में लाने के लिए शातिर तरीके अपनाए हैं पर जो रिश्ते प्रकृति ने अपने से निर्मित किए हैं उनकी शुद्धता, पवित्रता और समरसता सदैव कायम रहती है और रहेगी भी। कविता की सत्यपरक विषयवस्तु और सटीक कथ्य का समांगी रसायन है और अपने उद्देष्य तक सुगमता से पहुंचती है, फोकट की कोई लाग लपेट नहीं है। कवि जब मानव समाज में जहां तहां व्याप्त इस प्रकार की विकृत सोच और व्यवहार को देखता है तो उसे ग्लानि होती है। मुझे याद आता है बाबा फरीद का वह पद जो गुरुग्रन्थ साहब में अंकित है--

देखु फरीदा जि थीआ सकर होई विसु।
सांई बाझहु आपणे वेदण कहीऐ किसु।।

(जि थीया = जो कुछ हुआ है, सकर= शक्कर, मीठे पदारथ, विसु= ज़हर, दुखदायी, वेदण = दुख)
वे कहते हैं, देख फ़रीदा यह जो शकर है न वही विष हुआ है, अर्थात् जग में जो-जो तू अपना भला चाहने वाला समझ रहा था, वही तेरे लिए विष समान हो गया है।

बाबा फरीद की यह बात सुनकर थोड़ा अजीब सा लग रहा है कि फ़रीद खुद ही फ़रीद से कह रहा है। इसके दो मतलब समझ में आते हैं। एक तो यह कि फ़रीद इतनी कड़वी बात सीख के रूप में किसी को कहते तो शायद उन्हे कोई सुनता ही नहीं इसलिए वे फ़रीद ख़ुद से कह रहे हैं लेकिन असल में वे उनके नहीं हमारे सब लिए ही कह रहे हैं। दूसरा यह कि उनके भीतर मौजूद साक्षी ही तो फ़रीद के लिए वस्तुतः वह तो सब के लिए कह रहा है। यह जो सूफ़ीयाना अन्दाज़ है न यह कहने का कुछ हट कर ही होता है। यहां रवीन्द्र की कविता उसी तर्ज और ताब की है। इसलिये उन्होंने स्वयं का आलम्बन लेकर सब के हित की बात कह दी। रिश्ते तो बड़े मीठे मीठे हैं पर उनके गर्भ में पल रहे अपने-अपने स्वार्थ अवसर पाते ही सतह पर आ जाते हैं। कविता सहज ही लोकजागरण की ओर बढ़ जाती है।

मेरी एक कविता जो उपरोक्त कविता की अनुभा सी लगती है।
रिश्तों की इस बाढ़ में
आपाधापी भीड़ भाड़ में
कुछ सहमे, कुछ सिमटे
कुछ खोये तो कुछ उल्टे
कुछ साहिल पर छूट गए
कुछ रस्ते में ही टूट गए
पर इन सब में से एक
अपना सा नन्हा सा वो
छ्त के बारीक सुराख सा
तमस का त्रास तोड़ गया
कच्चा तो था वो रिश्ता
पर पक्का रंग छोड़ गया
- रामनारायण सोनी



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