मान बढ़ाती हिन्दी, प्राण बचाती हिन्दी : डॉ. अंजलि चिंतामणि

डॉ. अंजलि चिंतामणि वरिष्ठ व्याख्याता, महात्मा गांधी संस्थान - मॉरिशस का व्याख्यान

आज़ादी के अमृत महोत्सव के अंतर्गत वामा साहित्य मंच द्वारा का अभय प्रशाल, में भव्य आयोजन हुआ। 14-15 मई को संपन्न इस आयोजन में देश-विदेश से आए अतिथि साहित्यकार, विद्वान, पैनी पैठ के चिंतक व भाषाविदों ने ओजस्वी विचारों की समिधा डाली और मंथन यज्ञ को प्रज्वलित किया।


इस अवसर पर से पधारीं डॉ. अंजलि चिंतामणि(वरिष्ठ व्याख्याता, महात्मा गांधी संस्थान-मॉरिशस
) ने अंतर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में हिंदी की स्थापना' वैश्विक अपेक्षाएं व वर्तमान स्थिति पर अपने वक्तव्य से सभी को अभिभूत कर लिया।

डॉ. अंजलि ने सभी हिन्दी प्रेमी-हिन्दी सेवी-हिन्दी मनीषियों का अभिनंदन करते हुए कहा कि मैं छोटा भारत मॉरिशस यानी उस भूमि से आई हूं जहां हिन्दी को लेकर अपार संभावनाएं और अनंत आकाश है लेकिन साथ ही अंतहीन अपेक्षाएं भी हैं। हमारे पुरखों ने अपनी जड़ों का जो सींचन पोषण वहां से किया आज उसी की लहलहाती फसलों का, भाषायी संस्कारों का, शुभ प्रतिफल हमें मिल रहा है।

हिन्दी अंतरराष्ट्रीय भाषा हो चुकी है। जो भाषा निरंतर हर तरफ बोली, पढ़ी, देखी, समझी जा रही है, जो दिखती है व्यवहार में, प्रचलन में प्रमुखता से लाई जा रही है वह हिन्दी ही है....


उन्होंने जय कल्याणी हिन्दी बोली, जय बोलो जय हिन्दी बोली, मान बढ़ाती हिन्दी, प्राण बचाती हिन्दी जैसी काव्य पंक्तियों का वाचन कर सबको मुग्ध कर दिया।

डॉ. अंजलि ने कहा कि हिन्दी के प्रति आकर्षण बढ़ाना है तो हमारे पास इन सवालों का समुचित जवाब होना चाहिए। सबसे पहला सवाल तो यही है कि हम हिन्दी क्यों पढ़ें? हिन्दी से हमें क्या हासिल होगा?

मॉरिशस में हिन्दी का ही बोलबाला है। हर तरफ सिखाई और पढ़ाई जा रही है। आज वह निरंतर चमक रही है, महक रही है लेकिन दूसरी तरफ हमारी सीमाएं भी हैं। एक
तरफ हम आगे बढ़ रहे हैं, अच्छा कर रहे हैं लेकिन दूसरी तरफ वैश्विक स्तर पर हिन्दी आगे बढ़े उसके लिए प्रयासों में तेजी के साथ भाव और मंतव्य की शुद्धता व शुचिता भी जरूरी है।

उन्होंने विश्व हिन्दी सचिवालय की उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए बताया कि कैसे संस्था अस्तित्व में आई, कैसे उसका गठन हुआ, जहां हिन्दी भाषा, हिन्दी साहित्य को एक साथ एक सामंजस्य के साथ आगे बढ़ाया जा रहा है। यह संस्था सेतु का काम कर रही है। आज हमारे यहां 180 विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ाई जा रही है। अधुनातन तरीके से तकनीक व प्रोद्योगिकी के सहयोग से शिक्षण की व्यवस्था की जा रही है। आज हिन्दी को लेकर फलक चौड़े हो रहे हैं।

उन्होंने हिन्दी के लिए समर्पित विद्वान अभिमन्यु अनंत के प्रयासों का जिक्र करते हुए फिल्म संगठन के बारे में भी जानकारी दी।

डॉ. अंजलि ने कहा कि सिर्फ साहित्यिक विधा ही नहीं बल्कि कविता-कहानी से आगे बढ़कर नुक्कड़ नाटकों का भी प्रयोग किया जा रहा है। अपनी सृजन संस्था पर उन्होंने बताया कि इस मंच पर हिन्दी सेवियों का साक्षात्कार लिया जा रहा है। हम सभी अपने अपने ढंग से हिन्दी को आगे बढ़ा रहे हैं।

वर्तमान स्थिति पर समग्र दृष्टि डालें तो छात्रों की संख्या कम होना चिंताजनक है लेकिन कारण पर नजर डालें तो उन्हें प्रोत्साहन नहीं मिल रहा है। दिशाओं में सुधार की जरुरत है। हिन्दी में रोजगार बढ़ाने की आवश्यकता पर उन्होंने जोर दिया। इस
हेतु उनका मानना है कि सरकार की सक्रिय कटिबद्धता बहुत जरूरी है। उन्होंने अपने वक्तव्य में - जो साहित्य नहीं रचता वह आत्महंता है जैसे साहित्य मनीषियों के उद्धरण दिए और श्रोताओं को मंत्रमुग्ध होकर सुनने को विवश कर दिया। उन्होंने तकनीकी खामियों का भी जिक्र किया कि आज भी श्रृंगार का श्रृ कई फोंट में टाइप नहीं हो पाता है।
डॉ. अंजलि का कहना था कि आज क्वॉन्टिटी अधिक है क्वॉलिटी कम हो रही है। हिन्दी में रचनात्मकता, गुणवत्ता और सहजता को बढ़ाना है तो
युवा, महिला लेखक, अनुवादक सभी को सकारात्मक सोच के साथ जोड़ कर सक्रिय करना होगा तभी हम अपने कदम मजबूती से आगे बढ़ा सकेंगे।

डॉ. अंजलि ने अपनी बात को सुंदर, संतुलित, सटीक लेकिन संक्षिप्त रूप से रखा। हिन्दी को लेकर वैश्विक चिंता और चिंतन को स्पष्टता से रेखांकित किया। सभी सत्रों में यह सत्र आशा की जगमगाती किरण देकर गया।



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