अपने ही घर में बेगानी हूँ

प्रियंका पांडेय|
अपने ही घर में बेगानी हू
अपने ही लोगों के बीच

जाने-पहचाने लोगों में
लगता है कि अनजानी हूँ।

मेरे स्वजन प्यार से मुझे
हिन्दी कहकर पुकारते हैं
मगर घर में जब भी कोई
विशेष मेहमान आता ह
तो कोने के कमरे में छिपाकर ‘स्टेट’ के ताले के भी
तरबंद कर देते हैं मुझको...

राष्ट्रभाषा मानते हैं वो
कहते हैं कि मैं उनकी शोभा हू
अपनी सरकारी दुकानों में
नुमाइश करते हैं अपनी शोभा की
और अपने बच्चों को घर में हिन्दी बोलने पर भी डाँटते हैं...
सच ही, अपने ही घर में बेगानी हूँ

दुकानों के बोर्ड पर टूटती हूँ,
सस्ते साहित्यों में बिकती हूँ
खुद की विद्वता पर मचलने वालों के
मुख से मैं जब भी निकलती हूँ
तो यकीन कीजिए, ऐसा लगता है कि सौ बार टूटकर बिखरती हूँ...
अपने ही देश में अपनी-सी नहीं लगती हूँ.
वे आँखे बंद करते हैं
स्वप्न भी हिन्दी में देखते हैं
वे जागते हैं
और अपने स्वप्न को
अँगरेजी की शक्ल में
बयाँ करके तसल्ली पाते हैफिर कैसी राष्ट्रभाषा हूँ?
किसकी अपनी हूँ?
सच ही है
अपने घर में ही बेगानी हूँ



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