हिन्दी को 'खास' नहीं 'आम' तक पहुँचाना चाहते थे नेहरू

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-विनोद द. मुल
हिन्दी को जन-जन की भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने में हमारे देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। हिन्दी को राजभाषा का दर्जा देने का निर्णय यूँ तो सरकारी स्तर पर लिया ही गया था, परंतु हिन्दी को राजभाषा के साथ ही जन-जन की भाषा बनाने में भी नेहरूजी का विशेष जोर था।

हिन्दी के विकास हेतु नेहरूजी ने ही सर्वप्रथम हिन्दी के मूर्धन्य साहित्यकार डॉ. हरिवंशराय बच्चन को इलाहाबाद से दिल्ली बुलाया था। सरकारी कामकाज में अँगरेजी के साथ ही हिन्दी को बढ़ावा देने हेतु विदेश मंत्रालय में डॉ. बच्चन को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई।

नेहरूजी हिन्दी को क्लिष्टता के जाल में न फँसाते हुए उसे सामान्यजन की भाषा बनाने हेतु कितने सजग थे इसका उदाहरण डॉ. बच्चन के आत्मचरित्र 'दशद्वार' से 'सोपान तक' में हमें मिलता है। इस संबंध में डॉ. बच्चन ने एक बहुत ही रोचक किस्सा बयान किया है। संसद का बजट अधिवेशन शुरू होने वाला था। संसद की संयुक्त बैठक में राष्ट्रपति का संबोधन होने वाला था। उस समय डॉ. राधाकृष्णन राष्ट्रपति थे और वे अँगरेजी में बोलने वाले थे। नेहरूजी प्रधानमंत्री थे जिनके मार्गदर्शन में यह भाषण तैयार होने वाला था। डॉ. राधाकृष्णन अपना भाषण स्वयं ही तैयार करते थे जो उनकी विद्वत्ता के अनुरूप ही होता था।

भाषण की एक प्रति डॉ. बच्चन के पास अनुवाद हेतु पहुँची। डॉ. राधाकृष्णन के शब्द-चयन और वाक्य-संयोजन को देखकर डॉ. बच्चन के छक्के छूट गए। डॉ. बच्चन ने अपना सारा जोर और ज्ञान लगाकर अनुवाद किया जिसमें डॉ. राधाकृष्णन की विद्वत्ता के अनुरूप ही हिन्दी के स्तरीय शब्दों का प्रयोग किया गया। यह भाषण फिर उन्होंने नेहरूजी के पास अनुमोदन हेतु भेज दिया।

उसी दिन रात को 9 बजे त्रिमूर्ति भवन से डॉ. बच्चन को बुलावा आया। रात के भोजन के बाद नेहरूजी अपने अध्ययन कक्ष में बैठे डॉ. बच्चन के अनुवाद को देख रहे थे। डॉ. बच्चन को देखते ही नेहरूजी ने कहा- 'अनुवाद तो आपने अच्छा ही किया है परंतु शुद्ध हिन्दी के फेर में पड़कर भाषा को आपने बहुत ही क्लिष्ट बना दिया है।

फिर आपको मालूम है न हिन्दी अनुवाद कौन पढ़ने वाला है? -डॉ. जाकिर हुसैन' (उस समय डॉ. हुसैन उपराष्ट्रपति थे और संसद की परंपरा के अनुसार राष्ट्रपति का भाषण यदि अँग्रेजी में हो तो उसका हिन्दी अनुवाद उपराष्ट्रपति पढ़ते हैं।) नेहरूजी ने कहा- 'इस भाषण के अनेक शब्दों का उच्चारण करने में डॉ. हुसैन को दिक्कत होगी।'

डॉ. बच्चन को नेहरूजी का आशय समझ में आया। उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ। नेहरूजी चाहते थे कि अनुवाद ऐसा हो जिसे एक गैर हिन्दी व्यक्ति भी आसानी से पढ़ सके और उतनी ही आसानी से एक सामान्य व्यक्ति भी उस अनुवाद को समझ सके। नेहरूजी हमेशा कहते थे कि यदि हिन्दी को हम वास्तव में सरकारी कामकाज की भाषा बनाना चाहते हैं तो उसमें अधिक से अधिक साधारण बोलचाल के शब्दों का प्रयोग करना होगा। हिन्दी भाषा का प्रयोग करते समय यदि हमारे मन में पांडित्य प्रदर्शन की भावना आई तो हिन्दी क्लिष्टता के पंजे से मुक्त न हो सकेगी।

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हिन्दी दिवस के अवसर पर हिन्दी से संबंधित नेहरूजी के विचारों को ध्यान में रखते हुए यदि हम हिन्दी की वर्तमान स्थिति पर ईमानदारी से विचार करेंगे तो ही हमें वास्तविकता की अनुभूति होगी।



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