हिन्दी के समकालीन संकट

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-कन्‍हैयालानंद

हिन्दी का सबसे बड़ा संकट उसे मातृभाषा के रूप में बोलने वालों द्वारा अपनी अस्मिता से न जोड़ने का है। एक चलताऊ फिकरा चलन में है कि भाषा कैसी भी हो, संप्रेषण हो जाना चाहिए। इस धारणा ने हमारी भाषा के प्रति गौरव भाव को तो नष्ट किया ही है, उसकी शुद्धता को भी लांछित किया है।

स्वतंत्र भारत का एक और हिन्दी दिवस आ गया। एक बार फिर कर्मकांड की तरह हिन्दी का गुणगान, उसकी क्षमताओं और ऐतिहासिक योगदान का समूह गान, हर सरकारी संस्थान के हिन्दी अधिकारी की साँसत कि वह किस बड़े साहित्यकार को अपने यहाँ आमंत्रित करने में सफल हो जाए और फिर वही अधिकारी पूरे साल अपने संस्थान में अपने अस्तित्व के खतरे से टकराए... यही क्रम लगातार चलता है और चलता आ रहा है। धीरे-धीरे यह संकट और बढ़ रहा है। इसे लेकर देश की संसद में कोई ज्यादा हायतौबा मचेगी, अब इसकी भी उम्मीद नहीं रही।
मेरी दृष्टि में हिन्दी का सबसे बड़ा संकट उसे मातृभाषा के रूप में बोलने वालों द्वारा अपनी अस्मिता से न जोड़ने का है। एक चलताऊ फिकरा चलन में है कि भाषा कैसी भी हो, संप्रेषण हो जाना चाहिए। इस धारणा ने हमारी भाषा के प्रति गौरव भाव को तो नष्ट किया ही है, उसकी शुद्धता को भी लांछित किया है। इसीलिए हिन्दी का, मेरी दृष्टि में, समकालीन दूसरा संकट उसकी शुद्धता के हनन का है। भाषा की शुद्धता के प्रति भाषा के बोलने वालों में आग्रह नहीं रह गया।
आज की बोलचाल की भाषा में हिन्दी का एक पूरा वाक्य हिन्दी शब्दों से पूरा नहीं किया जाता, अँग्रेजी शब्दों की छौंक लगी होती है, बिना अँग्रेजी के मिश्रण के हिन्दी बोल पाना असंभव होता जा रहा है। सरेआम बच्चे कहते सुने जा सकते हैं कि 'मेरे फादर इन्सिस्ट करते हैं कि मैं प्योर हिन्दी में कनवर्सेशन किया करूँ। यार, दिस इज माई बेसिक सिरदर्द।' यह है आज की पीढ़ी की बोलचाल की हिन्दी!
इसी के साथ हिन्दी का संकट नंबर तीन यह है कि हिन्दी सारे देश में बोली जाती है। इतने बड़े देश में उसके अपने क्षेत्रीय प्रभाव से भिन्न-भिन्न स्वरूप हैं जो गुजराती हिन्दी, मराठी हिन्दी, पंजाबी हिन्दी, दक्षिण भारतीय हिन्दी (जिसे आम फहम रूप में मद्रासी हिन्दी भी कह दिया जाताहै) के नाम से पहचानी जाती है। इससे भाषा का स्वरूप बिगड़ा है और हिन्दी की शुद्धता नष्ट हुई है।
हिन्दी का संकट नंबर चार है वह मानसिकता, जिसके चलते भाषा का मसला साहित्यकारों के जिम्मे डाल दिया गया। किसी भी भाषा के लिए मात्र उसके साहित्यकार जिम्मेदार नहीं हो सकते, उसके बोलने वाले उसके लिए बराबर के हिस्सेदार और जिम्मेदार होते हैं। भाषा साहित्य के लिए एक वाहक है, लेकिन इससे भाषा का मसला सिर्फ साहित्य या साहित्यकारों का मसला नहीं हो जाता।
हिन्दी का संकट नंबर पाँच मेरी दृष्टि में अनुवाद से जुड़ा हुआ है। विभिन्न भाषाओं से अनुवाद करने वाले धीरे-धीरे कम होते जा रहे हैं। जो हैं वे उन भाषाओं के प्रचलित मुहावरे में नहीं, व्याकरण के नियमों में बँधा अनुवाद करते हैं। इसमें शरीर तो हिन्दी का दिखता है, लेकिन आत्मा का रसात्मक आनंद खो जाता है।

हिन्दी का संकट नंबर छः आज की कम्प्यूटरी संस्कृति में शब्दों के संक्षिप्तीकरण का है, जहाँ व्यावसायिक ही नहीं, संज्ञाओं को भी संक्षिप्तीकरण का शिकार होना पड़ता है। वहाँ अब 'सिद्धार्थ' सिर्फ 'सिड' रह गए हैं। इससे सिद्धार्थ नाम के साथ जो गौतम बुद्ध के नाम का अर्थ-वलय साथ उभरता था, वह 'सिड' में समाकर ठंडा हो गया। इस संकट से केवल भारतीय भाषाएँ ही नहीं, अँग्रेजी तक संकट में आ गई है। यह संकट सार्वभौम संकट है, जो भावी संप्रेषण के लिए एक गंभीर खतरा है। भावी पीढ़ी उस संक्षिप्त शब्दावली को समझे बिना अपना काम नहीं चला पाएगी।
हिन्दी का संकट नंबर सात यह भी है कि अगर कोई राजनीतिज्ञ साहित्य के संदर्भ में या भाषा के संदर्भ में कोई उचित आंदोलन खड़ा करने की सोचता है तो वह शंका की निगाह से देखा जाता है। साहित्य और राजनीति के बीच एक अलंघ्य खाई पैदा हो गई लगती है।

...और हिन्दी का सबसे बड़ा संकट कि हिन्दी वाले हिन्दी में अपने दस्तखत नहीं करते।
काश कि इन संकटों पर हम गंभीरता से विचार कर हिन्दी को अपना सही सम्मान देने की ओर अग्रसर हो सकें।



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