इलाहाबाद का वह शर्मीला नौजवान

jitendra|
बातचीत के दौरान जब उन्हें पता चला कि यह अमिताभ हरिवंश राय बच्चन का बेटा है तो उन्हें थोड़ा संकोच हुआ। बोले, तुम्हारे पिता से पूछकर बताऊँगा, लेकिन जब अमिताभ ने उन्हें यह यकीन दिलाया कि इसमें पिता की भी राजी है और मैं कोई घर से भागकर थोड़े न आया हूँ, तब कहीं जाकर वे संतुष्ट हुए।

तो इस तरह से 'सात हिंदुस्तानी' के जरिए उस लंबे-दुबले और शर्मीले नौजवान ने हिंदी फिल्मों में शुरुआत हुई।

यह फिल्म सफल नहीं हुई और उसके बाद आई और कई फिल्में भी। ऋषिकेश मुखर्जी की 'आनंद' जरूर हिट थी, पर फिल्म की सफलता का सारा श्रेय मिला राजेश खन्ना को। उसके बाद तनूजा के साथ 'प्यार की कहानी' और 'परवाना' फिल्में भी बुरी तरह पिट गईं।
फिल्में तो मिल रही थीं, पर संघर्ष के दिन अभी खत्म नहीं हुए थे। उन दिनों अमिताभ हिंदी फिल्मों के कॉमेडियन महमूद के यहाँ रह रहे थे। एक दिन दोस्त राजीव गाँधी अमिताभ से मिलने वहाँ आए। दोनों की दोस्ती काफी गहरी थी। राजीव खूबसूरत और आकर्षक तो थे ही। बस, महमूद को भा गए। महमूद ने उन्हें फिल्म में काम करने का प्रस्ताव तक दे डाला। राजीव हँस पड़े। बोले, मेरे दोस्त को कोई काम दे दीजिए।
उसके बाद बी.आर. इशारा की फिल्म 'एक नजर' में अमिताभ ने काम किया, जिसमें उनकी हिरोइन जया भादुड़ी थीं। यहीं से दोनों के प्रेम की शुरुआत हुई। फिल्में पिट रही थीं, मन टूट रहा था, और ऐसे में अमिताभ को जया का ही सहारा था। जया के बारे में हरिवंश राय बच्चन ने अपनी आत्मकथा में लिखा है, 'जया कद में नाटी, शरीर से न पतली, न मोटी, रंग से गेहुँआ। उसकी गणना सुंदरियों में तो न की जा सकती थी, पर उसमें अपना एक आकर्षण था, विशेषकर उसके दीप्त-दीर्घ नेत्रों का, और उसके सुस्पष्ट मधुर कंठ का।'
इसका बाद की कहानी भी बहुत लंबी है, लेकिन प्रकाश मेहरा की फिल्म 'जंजीर' ने अमिताभ को रातोंरात सितारा बना दिया था, एक ऐसा सितारा जो आज भी बॉलीवुड के आकाश में जगमगा रहा है और जिसकी चमक आज तक फीकी नहीं पड़ी है।

(हरिवंश राय बच्चन की आत्मकथा 'दशद्वार से सोपान तक' के आधार पर)



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