हरिद्वार कुंभ मेला : कल्पवास के नियम

अनिरुद्ध जोशी| पुनः संशोधित शनिवार, 6 फ़रवरी 2021 (18:21 IST)
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का अर्थ होता है संगम के तट पर निवास कर वेदाध्ययन और ध्यान करना। कुम्भ मेले में कल्पवास का अत्यधिक महत्व माना गया है। कुंभ नगरियों में कल्पवास का बहुत महत्व है क्योंकि यहां कभी किसी काल में ऋषियों ने घोर तप किया था। तभी से तपोभूमि पर कुंभ और माघ माह में साधुओं सहित गृहस्थों के लिए कल्पवास की परंपरा चली आ रही है, जिसके माध्यम से व्यक्ति धर्म, अध्यात्म और खुद की आत्मा से जुड़ता है। कल्पवास के संदर्भ में माना गया है कि कल्पवासी को इच्छित फल तो मिलता ही है, उसे जन्म जन्मांतर के बंधनों से मुक्ति मिल जाती है। आओ जानते हैं कि क्या करना चाहिए कल्पवासियों को।



कुंभ नगरियों में कल्पवास का बहुत महत्व है क्योंकि यहां कभी किसी काल में ऋषियों ने घोर तप किया था। तभी से तपोभूमि पर कुंभ और माघ माह में साधुओं सहित गृहस्थों के लिए कल्पवास की परंपरा चली आ रही है, जिसके माध्यम से व्यक्ति धर्म, अध्यात्म और खुद की आत्मा से जुड़ता है। कल्पवास के संदर्भ में माना गया है कि कल्पवासी को इच्छित फल तो मिलता ही है, उसे जन्म जन्मांतर के बंधनों से मुक्ति मिल जाती है। आओ जानते हैं कि क्या करना चाहिए कल्पवासियों को।

1. कल्पवास की अवधि : एक रात्रि, तीन रात्रि, तीन महीना, छह महीना, छह वर्ष, 12 वर्ष या जीवन भर कल्पवास किया जा सकता है।
कल्पवास पौष माह के 11वें दिन से माघ माह के 12वें दिन तक रहता है। कुछ लोग माघ पूर्णिमा तक कल्पवास करते हैं।

2. कल्पवास का विधान : गंगा तट पर पहुंचकर यह संकल्प लें कि कल्पवास की अवधि में बुरी संगत और कुवचनों का त्याग करेंगे।
3. कल्पवास की दिनचर्या : संतों के अनुसार कल्पवास के नियमों का पालन करने से मन व शरीर का कायाकल्प हो जाता है।

4. कल्पवास में दान : प्रयाग में जिन 84 दान का उल्लेख मिलता है, प्रत्येक कल्पवासी को उसका पालन करना चाहिए।

5. कल्पवास के उद्यापन की विधि : कलश पर सफेद वस्त्र रखकर उस पर स्वर्ण प्रतिमा रखें। प्रतिमा की पूजा करें और यह मंत्र पढ़ें।



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