हिन्दी कविता: वह सुहानी शाम

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 निशा माथुर   
जिंदगी की जद्दोजहद, अपने हिस्से का आसमां तलाशती हूं, 
मायूस-सी मेरी सूरत, सांवरे की वो भीगी पलकें संवारती हूं ।
मेरे मुकाम के लिए जो फना हो जाए, वो मुकद्दर तलाशती हूं,  
घटाओं- सी घनेरी इन जुल्फों की फिर बिजलियां संवारती हूं ।
वो सुहानी शाम, सुरमयी, सुरमयी...> मैं अपनी मांग सजा लेती हूं ।।>  
 
काले बादलों में उमड़ती-छिपती, रौशनी की किरण तलाशती हूं  
मंदिर में उस संगमरमर से, मैं उसके वजूद का हिसाब मांगती हूं।
मेरी धड़कन से निकली दुआओं, आरजुओं की रवानगी मांगती हूं, 
हताश, निराश भोले मन संग हंसती कुछ किरदार निभा लेती हूं।
वो सुहानी शाम, सुरमयी, सुरमयी...
मैं अपनी मांग सजा लेती हूं ।।



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