प्रजामंडल से सत्ता तक

Last Updated: बुधवार, 25 मई 2022 (20:48 IST)
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-बाबूलाल पाटोदी

मैंने (बाबूलाल पाटोदी) सबसे पहले बाबूजी को तब देखा था, जब इंदौर में महात्मा गांधी आए थे, दूसरी बार 1935 में। गांधीजी हिन्दी साहित्य समिति में आए थे। बाबूजी उस समय काफी कार्यक्षम थे, मेरी उम्र भी 15 वर्ष की ही थी। मैं जैन समाज के स्वयंसेवक मंडलों में काम करता था, मिश्रीलालजी गंगवाल के नेतृत्व में। वर्ष 1939 में इंदौर शहर में ऑक्ट्रॉय और पानी के मीटर लगाने का प्रस्ताव आया। प्रधानमंत्री कैप्टन ढंडा थे। उन्होंने निश्चय किया कि यदि इंदौर शहर को यशवंत सागर का पानी देना है, तो मीटर लगाना होगा। यदि इंदौर नगर पालिका की आर्थिक स्थिति सुधारना है, तो हमें ऑक्ट्रॉय भी लगाना होगा। इंदौर में इसका काफी विरोध हुआ। नौ दिन तक हड़ताल चली। मल्हारगंज में जहां आज टीबी क्लिनिक है, वहां एक बड़ा मैदान था, तात्या की बावड़ी का। बाबू लाभचंदजी मीटिंग में आया करते थे और दूर साइकल पर खड़े होकर मीटिंग देखा करते थे। जब हड़ताल खत्म हुई तो बाबूजी क्लॉथ ब्रोकर एसोसिएशन के ऑफिस (गोवर्धन चौक) पर मुझसे मिले और कहा कि तुम के लिए काम करो। बाबू बैजनाथजी महोदय उसके अध्यक्ष बनकर आ रहे हैं।

लोग दूर बैठकर सुनते थे सभा

वर्ष 1939 में रानी सराय में प्रजामंडल का प्रथम अधिवेशन हुआ था। प्रजामंडल के अधिवेशन में मैंने हिस्सा लिया और मैं प्रजामंडल का सदस्य बना। वर्ष 1939 में प्रजामंडल में तब लोग सामने आने में बहुत डरते थे। महोदयजी, परांजपेजी, खोड़े साहब, सरवटे साहब, कोठारी साहब, गंगवालजी का यह आदेश था कि अब हमे प्रजामंडल को फैलाना है। हमने पूरे इंदौर राज्य का दौरा किया। लोग दूर बैठकर प्रजामंडल की सभाओं को सुनते थे। लाउडस्पीकर वगैरह थे नहीं। घंटी बजाकर खुद ही ऐलान करते थे और खुद ही सभाएं करते थे। बाबूजी का जहां तक संबंध है, वे कभी किसी पद पर रहे नहीं, लेकिन कोई काम ऐसा नहीं रहा कि जिसमें उन्होंने आगे आकर हिस्सा नहीं लिया हो और सुचारू रूप से चलाया नहीं हो। वर्ष 1941 में व्यक्तिगत सत्याग्रह चलाया गया। वर्ष 1940-41 के दौरान बाबू लाभचंदजी और दोनों राजकुमार मिल में काम करते थे। धूत साहब राजकुमार मिल की कपड़ा दुकान में काम करते थे और बाबू लाभचंदजी मिल के अंदर।
स्वदेशी आंदोलन की प्रेरणा से वर्ष 1930 में उन्होंने मिल में स्वदेशीको-ऑपरेटिव स्टोर खुलवाया। हालांकि वे इसमें किसी पद पर नहीं रहे। यानी उसकी नींव का पत्थर बाबू लाभचंदजी ही थे। कर्नल दीनानाथ उस समय प्रधानमंत्री थे और उन्होंने बाबू लाभचंदजी और धूत साहब को पकड़कर कन्नाौद की जेल में डाल दिया, क्योंकि ये दोनों ही उसके पीछे प्रमुख हस्ती थे। उनका सोचना था कि यदि इन्हें दबा दिया गया तो आंदोलन समाप्त हो जाएगा और अपनी जीत हो जाएगी। जब कर्नल दीनानाथ ने मिल से दोनों को निकलवाना चाहा तो आर.सी. जाल का स्पष्ट उत्तर था कि मिल के काम में इनकी कोई शिकायत नहीं है। बाहर वे क्या करते हैं, इससे मिल का कोई वास्ता नहीं हैं। मैं इनको नौकरी से नहीं निकाल सकता। बाद में रायबहादुर हीरालालजी कासलीवाल पर कर्नल दीनानाथ ने दबाव डालकर दोनों को मिल से निकलवा दिया।
बाबूजी को इंदौर जेल में रखा गया

बाबू लाभचंदजी ने वर्ष 1939 में प्रजामंडल के अधिवेशन में भाग लिया था, तब तक वे नौकरी छोड़ चुके थे। जेल में बंद कर कर्नल दीनानाथ प्रजामंडल के आंदोलन को कुचलने की पुरजोर कोशिश कर रहे थे और उन्होंने प्रजामंडल के मुकाबले प्रजासंघ भी स्थापित किया था। इसमें कई बड़े-बड़ेलोग थे। एक बार भानुदासजी शाह बजाज खाना चौक में सभा कर रहे थे, तब भरी सभा में बाबूलाल शुक्ला नाम के एक महाशय ने उन्हें दो तमाचे मार दिए। इस घटना के खिलाफ उस जमाने में इंदौर में पूरी तरह शांत हड़ताल की गई। यह संभवतः वर्ष 1945 की घटना थी। इसका नतीजा यह हुआ कि कर्नल दीनानाथ और प्रजासंघ को राजनीतिक नक्शे से मिटा दिया गया। 15 सितंबर 1942 को हम लोगों के घरों से रात को गिरफ्तार कर लिया गया। तब मैं प्रजामंडल का सचिव था।
बाबूजी को इंदौर जेल में रखा गया। उस समय जेल में इतने लोगों को एक साथ रखना और उनकी व्यवस्था करना कठिन कार्य था। तब मैंनें बाबूजी का वह रूप देखा था। उनमें मां का हृदय था। ऐसे-ऐसे नौजवान आए थे, जो दुःखी थे। कुछ आर्थिक रूप से, कुछ अपनी आदतों की वजह से। बाबूजी ने उन नौजवानों को सवा साल तक प्यार दिया, दुलार दिया। उनके खाने पीने की व्यवस्था, उनके कपड़े आदि की व्यवस्था उनके परिवार की व्यवस्था आदि सब बाबूजी किया करते थे। जेल के अंदर बैठकर भी उन्होंने बाहर से 'प्रजामंडल' पत्रिका का संचालन करवाया था। जेल में विभिन्न-विभिन्न विचारों के लोग (नरम और गरम दल के) संघर्ष करते थे।
उस वक्त में ही मजदूर संघ के नेता थे द्रविड़ साहब और रामसिंह भाई वर्मा। बाबूजी शक्कर बाजार में रहते थे। एक दिन अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सचिव श्री मोहनलाल गौतम यहां आए हुए थे। तब मजदूर संघ और प्रजामंडल के बीच पटती भी नहीं थी। प्रजामंडल पर वे पूरी तरह से कब्जा करना चाहते थे, फिर हमने देखा कि प्रजामंडल के अंदर भी उन लोगों ने काफी जोर-अजमाइश की। प्रजामंडल पर कब्जा करने का प्रयत्न भी उन्होंने किया। 8 मार्च 1945 को इंदौर नगर प्रजामंडल के चुनाव में बाबूजी की योजना के अनुसार कृष्णकांत व्यास अध्यक्ष, बसंतीलाल सेठिया प्रधानमंत्री तथा मैं कोषाध्यक्ष चुना गया। अप्रैल 1945 में इंदौर राज्य प्रजामंडल के रामपुरा अधिवेशन की सारी व्यवस्था बाबूजी ने संभाली थी।
बाबू लाभचंदजी मीटिंग में आया करते थे और दूर साइकल पर खड़े होकर मीटिंग देखा करते थे। बाबूजी का जहां तक संबंध है, वे कभी किसी पद पर रहे नहीं, लेकिन कोई काम ऐसा नहीं रहा कि जिसमें उन्होंने आगे आकर हिस्सा नहीं लिया हो और सुचारू रूप से चलाया नहीं हो। प्रजामंडल के कार्यकर्ताओं के साथ बाबूजी भी गिरफ्तार किए गए थे। सभी को इंदौर जेल के बंदीगृह में रखा था।

जेल में भी बाबूजी अपने साथियों का बहुत ही ध्यान रखते थे। बाबूजी का वह रूप देखकर हमें ऐसा अहसास होता था कि उनमें मां का हृदय है। मई 1947 को उत्तरदायी शासन के लिए शहर में एक आंदोलन के तहत जुलूस अपनी मांगों को लेकर माणिकबाग गया था। यहां जुलूस पर हार्टन के आदेश पर लाठीचार्ज किया गया। इस आंदोलन के पीछे बाबूजी का हाथ था। बाबूजी स्वयं इस आंदोलन में शामिल नहीं हुए थे, वे कभी होते भी नहीं थे। वे तो दूर खड़े होकर देखते थे, क्योंकि अगर वे जुलूस में शामिल होते और गिरफ्तार हो जाते तो बाद में आंदोलन कौन चलाता?



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