1 मई को क्यों मनाया जाता है अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस, जानिए इतिहास

- प्रथमेश व्यास
हर साल 1 मई का दिन के रूप में मनाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य है मजदूरों की भलाई के लिए काम करना व मजदूरों में उनके अधिकारों के प्रति जाग्रति लाना। इसे या भी कहा जाता है। इस दिन राष्ट्र निर्माण में श्रमिकों की भागीदारी को याद किया जाता है तथा विभिन्न सेमिनारों और रैलियों के माध्यम से मजदूरों के हक़ में आवाज उठाई जाती है। दुनिया के 80 देशों में इस दिन छुट्टी दी जाती है। मजदूर दिवस दुनिया में पहली बार 1 मई 1886 में मनाया गया, वहीं भारत में इसे पहली बार 1 मई 1923 को मनाया गया। तो आइए जानते है ..


मजदूर दिवस का इतिहास :
बात है 1886 की, जब शिकागो में मजदूरों ने बड़ी हड़ताल की। उनकी यह मांग थी कि काम करने की अवधि आठ घंटे हो और सप्ताह में एक दिन छुट्टी दी जाए। प्रदर्शन के दौरान एक व्यक्ति ने बम फोड़ दिया, जिससे उस जगह अफरातफरी मच गई और स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने मजदूरों पर गोलियां चलानी शुरू कर दी। इस घटना में कई मजदूरों के साथ कुछ पुलिस अफसर भी मारे गए। यह मामला कोर्ट में गया, जिसके फैसले के बाद चार मजदूरों को सरेआम फांसी पर चढ़ाया गया। ये घटना विश्व भर के लोगों के आक्रोश का कारण बनी। जहां फांसी दी गई, उस जगह को हेमार्केट कहा जाता था,इस जगह पर बाद के वर्षों में कई प्रदर्शनों के माध्यम से शहीदों के बलिदानों को याद किया गया। बाद में पेरिस की अंतराष्ट्रीय महासभा में एक प्रस्ताव पारित किया गया कि 1 मई को अंतराष्ट्रीय मजदूर दिवस के रूप में मनाया जाए, तब से दुनिया के 80 देशों में मई दिवस को अवकाश के रूप में मनाया जाने लगा।
भारत में पहली बार कब मनाया गया मजदूर दिवस :
पहली बार 1 मई 1923 को चेन्नई में मनाया गया था। इसकी शुरुआत लेबर किसान पार्टी ऑफ हिन्दुस्तान के नेता कामरेड सिंगरावेलू चेट्यार ने की थी। चेट्यार की अध्यक्षता में मद्रास हाई कोर्ट के सामने एक बड़ा प्रदर्शन किया गया और यह संकल्प लिया गया कि आज के दिन मजदूर दिवस मनाया जा रहा है। इसके बाद से ही भारत में एक कानून को पास करके यह सहमति बनाई गई कि इस दिवस को भारत में श्रमिक दिवस के तौर पर मनाया जाएगा। उस वक्त से हर साल देशभर में मजदूर दिवस मनाया जाता है। इस दिन भारत में राष्ट्रीय अवकाश होता है।
करीब 150 वर्षों के बाद भी पूरा नहीं हुआ है। भारत की बात की जाए तो आज भी मजदूरों के अधिकारों का हनन किया जाता है। लॉकडाउन के समय मजदूरों की आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो गई थी कि उन्हें सैकड़ों किलोमीटर दूर पलायन करके अपने गांवों को जाना पड़ा था। गांवों में खेती के प्रति लोगों का रुझान कम होने की वजह से अधिकांश मजदूर शहरों में आकर बस गए, जहां ना उन्हें सही वेतन मिलता है और ना ही उनके रहने-खाने का सही इंतज़ाम हो पाता है। प्राइवेट कंपनियों में मज़दूरों से 12-12 घंटे बिना ब्रेक के काम करवाया जाता है। सरकार मजदूरों की बेहतरी के लिए कई योजनाएं शुरू करती है, लेकिन देश में व्याप्त इतने भयंकर भ्रष्टाचार के कारण मजदूरों को इन योजनाओं का लाभ कभी नहीं मिल पाता। मजदूर संगठनों के साथ-साथ आम जनता को मिलकर मजदूरों में उनके अधिकारों के प्रति जागरूकता लाने के विषय में कार्य करना चाहिए।




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