ब्लॉग की दुनिया का हबीब साहब को सलाम

हबीब की रचनात्मकता को श्रद्धांजलि

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को याद करना सिर्फ से जुड़े एक व्यक्ति को याद करने की तरह नहीं है। दसों दिशाओं से टकराते उस व्यक्ति की कल्पना कीजिए, जिसके सिर पर टूटने को आसमान आमादा हो, धरती पाँव खींचने को तैयार बैठी हो और कुहनियाँ अन्य दिशाओं से टकराकर छिल रही हों, और वह व्यक्ति सहज भाव से सजगता तथा बेफ़िक्री दोनों को एक साथ साधकर चला जा रहा हो।

अब तक कुछ ऐसा ही जीवन रहा है हबीब तनवीर का। भारतेन्दु के बाद भारतीय समाज के सांस्कृतिक संघर्ष को नेतृत्व देनेवाले कुछ गिने-चुने व्यक्तित्वों में हबीब तनवीर भी शामिल हैं। भारतेन्दु का एक भी अब तक मंचित न करने के बावजूद वे भारतेन्दु के सर्वाधिक निकट हैं।

उन्होंने लोक की व्यापक अवधारणा को अपने रंगकर्म का आधार बनाते हुए अभिव्यक्ति के नये कौशल से दर्शकों को विस्मित किया है। यह कहना है ऋषिकेश सुलभ का। यह पोस्ट सबद पर पढ़ी जा सकती है और हबीब साहब के रंग कर्म यह एक सारगर्भित टिप्पणी है। वे शायद भारतीय रंगमंच पर एक अकेले व्यक्तित्व थे जिन्होंने सिर्फ और सिर्फ लोक भूमि से अपना आसमान रचा और उसे उसकी गंध से महका दिया था।

नौ जून को उनकी मृत्यु की खबर फैलते ही ब्लॉग दुनिया में उनके रंगकर्म को विश्लेषित करने और उन्हें श्रद्धांजलि देने का दौर शुरू हो गया जो इस बात का गवाह की पल पल की खबर रखते हैं और उस पर अपनी त्वरित प्रतिक्रिया भी देते हैं।

इसी तरह से एक और टिप्पणी पर गौर करें जो उनके किसी साक्षात्कार का हिस्सा है- जो छोड़कर फिल्मों, सीरियलों की तरफ जा रहे हैं, वहाँ काम की तलाश में जूतियाँ चटकाते हैं। कुछ चापलूसी, कुछ जान-पहचान काम करती है। मुझे उनसे कुछ शिकायत नहीं है। क्या करें पेट पर पत्थर रखकर काम मुश्किल है। हमारे जमाने में दुश्मन बहुत साफ नजर आता था। साम्राज्यवाद से लड़ाई थी। एक मकसद (सबका) - अंग्रेजों को हटाओ, रास्ते कितने अलग हों (भले ही)। अब घर के भीतर दुश्मन है, उसे पहचान नहीं सकते। विचारधारा बँटी है।

हबीब तनवीर
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पार्टियों की गिनती नहीं, हरेक की मंजिल अलग-अलग। इस अफरातफरी में क्या किसी से कोई आदर्श की तवक्को करे। हाँ, मगर लिबरेलाइजेशन, ग्लोबलाइजेशन, नए कालोनेलिज्म के खिलाफ आवाजें उठ रही हैं सब तरफ से। खुद उनके गढ़ अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन में भी। तो ये उम्मीद बनती है। यह कहना था हबीब तनवीर का।

रवींद्र व्यास|
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यह उस इंटरव्यू का हिस्सा है जब वे दिल्ली में सहमत ने कुछ लोग के बीच बातचीत रखी थी। यह उसी बातचीत का एक हिस्सा है। इसे धीरेश सैनी के ब्लॉग एक जिद्दी धुन पर पढ़ा जा सकता है यह महसूस किया जा सकता है कि देश के किन मुद्दों पर उनका सोच और चिंताएँ क्या थीं।



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