इसलिए विदा करना चाहते हैं हिन्दी

हिन्दी दिवस पर विशेष आलेख

दुनिया की हर भाषा की जिंदगी में एक बार कोई निहायत ही निष्करुण वक्त दबे पाँव आता है और 'उसको बोलने वालों' के हलक में हाथ डालकर उनकी जुबान पर रचे-बसे शब्दों को दबोचता है और धीरे-धीरे उनके कोमल गर्भ में साँस ले रहे अर्थों का गला घोंट देता है
ऐसे में बार-बार इतिहास के पन्नों में रामशलाका की तरह आज के प्रश्नों के भविष्यवादी उत्तर बरामद कर सकना असंभव है। हमारी सुनो, और जान लो कि इतिहास एक रतौंध है, तुमको उससे बचना है। हिस्ट्री इज बंक। वह बकवास है। उसे भूल जाओ। बहरहाल 'अगर मगर मत कर। इधर उधर मत तक। बस सरपट चल।'

भविष्यवाद यह नया सार्थक और अग्रगामी पाठ है। जबकि इस वक्त की हकीकत यह है कि हमारे भविष्य में हमारा इतिहास एक घुसपैठिए की तरह हरदम मौजूद रहता है। उससे विलग, असंपृक्त और मुक्त होकर रहा ही नहीं जा सकता। इतिहास से मुक्त होने का अर्थ स्मृति-विहीन हो जाना है।

सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से अनाथ हो जाना है। लेकिन वे हैं कि बार-बार बताए चले जा रहे हैं कि तुम्हारे पास तुम्हारा इतिहासबोध तो कभी रहा ही नहीं है। और जो है, वह तो इतिहास का बोझ है। तुम लदे हुए हो। तुम अतीत के कुली हो और फटे-पुराने कपड़ों में लिपटे हुए अपना पेट भर पालने की जद्दोजहद में हो, जबकि ग्लोबलाइजेशन की यूचर एक्सप्रेस प्लेटफार्म पर खड़ी है और सीटी बजा चुकी है

एक अल्प उपभोगवादी भारतीय प्रवृत्ति को पूरी तरह उपभोक्तावादी बनाने की व्यग्रता से भरने में जी-जान से जुट गए हैं, ताकि भूमंडलीकरण के कर्णधारों तथा अर्थव्यवस्था के महाबलीश्वरों के आगमन में आने वाली अड़चनें ही खत्म हो जाएँ और इन अड़चनों की फेहरिस्त में वे तमाम चीजें आती हैं, जिनसे राष्ट्रीयता की गंध आती हो।

इसका एक कारण तो यह भी है कि यह हिन्दुस्तान में संवाद, संचार और व्यापार की सबसे बड़ी भाषा बन चुकी है। दूसरे, इसको राजभाषा या राष्ट्रभाषा का पर्याय बना डालने की संवैधानिक भूल गाँधी की उस पीढ़ी ने कर दी
कहना न होगा कि इसमें इतिहास, संस्कृति और सभी भारतीय भाषाएँ शीर्ष पर हैं। फिर हिन्दी से तो 'राष्ट्रीयता' की सबसे तीखी गंध आती है। नतीजतन भूमंडलीकरण की विश्व-विजय में सबसे पहले निशाने पर हिन्दी ही है।

प्रभु जोशी| Last Updated: बुधवार, 1 अक्टूबर 2014 (22:08 IST)
भारत इन दिनों दुनिया के ऐसे समाजों की सूची के शीर्ष पर है, जिस पर बहुराष्ट्रीय निगमों की आसक्त और अपलक आँख निरंतर लगी हुई है। यह उसी का परिणाम है कि चिकने और चमकीले पन्नों के साथ लगातार मोटे होते जा रहे हिन्दी के कुछ दैनिक समाचार-पत्रों के पृष्ठों पर एकाएक भविष्यवादी चिंतकों की एक नई नस्ल अँगरेजी की माँद से निकलकर, बिला नागा, अपने साप्ताहिक स्तंभों में आशावादी मुस्कान से भरे अपने छायाचित्रों के साथ आती है, और हिन्दी के मूढ़ पाठकों को गरेबान पकड़कर समझाती है कि तुम्हारे यहाँ हिन्दी में अतीतजीवी अंधों की बूढ़ी आबादी इतनी अधिक हो चुकी है कि उनकी बौद्धिक-अंत्येष्टि कर देने में ही तुम्हारी बिरादरी का मोक्ष है। दरअसल कारण यह कि वह बिरादरी अपने 'आप्तवाक्यों' में हर समय 'इतिहास' का जाप करती रहती है और इसी के कारण तुम आगे नहीं बढ़ पा रहे हो। इतिहास ठिठककर तुम्हें पीछे मुड़कर देखना सिखाता है। इसलिए वह गति अवरोधक है, जबकि भविष्यातुर रहने वाले लोगों के लिए गर्दन मोड़कर पीछे देखना तक वर्ज्य है। एकदम निषिद्ध है।
इसका एक कारण तो यह भी है कि यह हिन्दुस्तान में संवाद, संचार और व्यापार की सबसे बड़ी भाषा बन चुकी है। दूसरे, इसको राजभाषा या राष्ट्रभाषा का पर्याय बना डालने की संवैधानिक भूल गाँधी की उस पीढ़ी ने कर दी, जो यह सोचती थी कि कोई भी मुल्क अपनी राष्ट्रभाषा के अभाव में स्वाधीन बना नहीं रह सकता। चूँकि भाषा सम्प्रेषण का माध्यम भर नहीं, बल्कि चिंतन प्रक्रिया एवं ज्ञान के विकास और विस्तार का भी हिस्सा होती है, उसके नष्ट होने का अर्थ एक समाज, एक संस्कृति और एक राष्ट्र का नष्ट हो जाना है। वह प्रकारांतर से राष्ट्रीय एवं जातीय अस्मिता का प्रतिरूप भी है। इस अर्थ में भाषा उस देश और समाज की एक विराट ऐतिहासिक धरोहर भी है। अतः उसका संवर्धन और संरक्षण एक अनिवार्य दायित्व है।



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