चुनौतियों से जूझते दो पड़ोसी प्रजातंत्र

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पहले अफगानिस्तान को लें। अफगानिस्तान में पख्तून लोगों की बहुलता है जिनका इलाका पाकिस्तान की सरहद से काबुल और कांधार तक जाता है। दूसरी ओर ताजिक प्रजाति है जिनका इलाका रूस और ईरान की सीमा से सटा है। ये ईरानी मूल के फ़ारसी बोलने वाले लोग हैं जो अफगानिस्तान में तालिबान के विरुद्ध संघर्ष करते रहे और के विरुद्ध युद्ध में अमेरिका का साथ दिया। तालिबान सरकार को गिराने में इनकी अहम भूमिका थी।

सरकार गिरने के बाद अमेरिका ने हामिद करज़ाई को अफगानिस्तान का राष्ट्रपति बनाया था जो पख्तून मूल के थे। करज़ाई ने दस वर्षों तक शासन किया किन्तु न तो वे कभी सर्वमान्य पख्तून नेता बन सके और न ही कभी उन्हें ताजिकों का समर्थन मिला। पख्तून और ताजिक के बीच की खाई को भी पाटने में वे नाकामयाब रहे। राष्ट्र के विकास में भी उनका योगदान कुछ याद रखने लायक नहीं रहा। आरम्भ में तो अमेरिका ने उन्हें पूरा समर्थन दिया किन्तु कार्यकाल के अंतिम चरण में दोनों का एक-दूसरे से मोहभंग हो गया।

अप्रैल के चुनावों में पख्तून उम्मीद्वार थे अशरफ घानी और ताजिक उम्मीद्वार थे अब्दुल्लाह अब्दुल्लाह। प्राथमिक चरण की लड़ाई में तो और भी कई उम्मीद्वार थे किन्तु सर्वाधिक मतों के आधार पर दूसरे और अंतिम दौर की लड़ाई इन दोनों में हुई। प्राथमिक चरण की लड़ाई में ताजिक उम्मीदवार अब्दुल्लाह अब्दुल्लाह आगे थे किन्तु अंतिम लड़ाई में पख्तून नेता अशरफ घानी के आगे चलने के संकेत मिलने लगे हैं। इन संकेतों के मिलते ही ताजिक नेता ने मतों की गिनती में धांधली का आरोप लगाते हुए नतीजों को मानने से इंकार कर दिया और समानांतर सरकार गठन करने की घोषणा कर दी।

यह ऐसी स्थिति है जब अफगानिस्तान सीरिया की तरह तीन तरफ़ा गृहयुद्ध में उलझ सकता है जहां एक ओर है पख्तून सरकार, दूसरी ओर है ताजिक लड़ाके और तीसरी ओर तालिबान आतंकवादी। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए अमेरिकी रक्षा सचिव जॉन केरी तुरंत काबुल पहुंचे और 48 घंटों तक दोनों पक्षों से वार्ताएं कीं। जॉन केरी के प्रयासों से दोनों पक्ष मतगणना का ऑडिट करवाने पर सहमत हो गए हैं और इस तरह अफगानिस्तान गृहयुद्ध के मुहाने से थोड़ा पीछे लौटा है। सभी सम्बंधित पक्ष आतुर हैं शुभ अंतिम परिणाम देखने के लिए।

दूसरे चुनाव हुए संसार के तीसरे सबसे बड़े प्रजातान्त्रिक देश इंडोनेशिया में। सबसे बड़े प्रजातंत्र की सूची में भारत प्रथम, अमेरिका द्वितीय और इंडोनेशिया का तृतीय स्थान है। इंडोनेशिया जनसंख्या के मान से संसार का सबसे बड़ा मुस्लिम राष्ट्र है जिसमें मुस्लिम आबादी लगभग 90 प्रतिशत है। यह मुस्लिम राष्ट्र दुनिया में एक उज्ज्वल मिसाल है इस्लाम और लोकतंत्र के मेल की। यह राष्ट्र उन लोगों को जवाब है जो मानते हैं कि इस्लामिक राष्ट्र में लोकतंत्र सफल नहीं हो सकता। देश की जनता ने कट्टरवाद को खारिज कर धार्मिक स्वतंत्रता को आत्मसात किया।

उल्लेखनीय है कि यहां की मुद्रा पर गणेशजी का चित्र है जो धार्मिक सहिष्णुता का सर्वोत्तम प्रमाण है। यह भी सत्य है कि प्रजातंत्र वहीं सफल होता है जहां धर्मों, वर्गों और जातियों में समभाव हो अन्यथा सन् 1998 में तीस वर्षों की सुहार्तो की तानाशाही के पश्चात इंडोनेशिया में इतना शीघ्र प्रजातंत्र का स्थापित होना आसान नहीं था। यहां भी राष्ट्रपति पद की लड़ाई दो उम्मीदवारों के बीच थी। पूर्व जनरल प्रबोवो और जकार्ता के गवर्नर जोको विडोडो के बीच कड़ा मुकाबला था। जोको विडोडो एक सुधारक के रूप में जाने जाते हैं वहीं प्रबोवो, सुहार्तो युग के हैं और उन पर सुहार्तो के अन्याय में सहयोग देने के आरोप भी हैं।

इंडोनेशिया कोई 17 हज़ार द्वीपों का एक समूह है और 6 हज़ार द्वीपों से ज्यादा पर मतदान केंद्र हैं। ऐसे में मतगणना में कई सप्ताह लग जाते हैं। आधिकारिक नतीजे 22 जुलाई तक घोषित हो सकते हैं। चुनाव नतीज़ों के पूर्वानुमान के आधार पर दोनों उम्मीदवारों ने अपनी-अपनी जीत के दावे करके अपने आप को राष्ट्रपति घोषित कर दिया है, यही एक चिंता का विषय है। आरोप-प्रत्यारोपों का सिलसिला चुनावों के बाद भी थमा नहीं है। उम्मीदवारों की हाल की बचकानी हरकतें अभी भी प्रजातंत्र के अपरिपक्व होने का संकेत देती हैं। (इस सन्दर्भ में भारत में चुनावों के दौरान जिम्मेदार नेताओं द्वारा कभी-कभी की गई बचकानी टिप्पणियां भी याद आकर मन को खट्टा कर देती हैं )

अंतरराष्‍ट्रीय समुदाय के सामने कठिन चुनौती है अफगानिस्तान को प्रजातंत्र की पटरी पर चलाने की और इंडोनेशिया के प्रजातंत्र को पटरी से उतरने से बचाने की। एक तरफ अफगानिस्तान का समाज विभिन्न प्रजातियों में विभाजित एक अशिक्षित समाज है जिसे प्रजातंत्र की बारीकियों या उसके लाभों का कोई ज्ञान नहीं है। वहीं दूसरी ओर इंडोनेशिया का समाज एक शिक्षित समाज है जहां वयस्क साक्षरता दर 93 प्रतिशत तक है। यहां की समस्या सुहार्तो के समय से चले आ रहे भ्रष्ट तंत्र की है जो प्रजातंत्र के मार्ग को अवरुद्ध करने का कोई अवसर नहीं छोड़ेगा।

शरद सिंगी|
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अप्रैल माह में, दक्षिण एशिया में के साथ दो अन्य देशों में भी चुनाव हुए थे। एक और दूसरा इंडोनेशिया। दोनों ही देश प्रजातान्त्रिक होने का दावा तो करते हैं किन्तु अलग-अलग कारणों से इन देशों की चुनाव प्रक्रिया पर प्रश्न चिन्ह लगे हैं। नतीजे अभी तक घोषित नहीं हुए हैं परन्तु दोनों ही देशों के प्रमुख उम्मीद्वारों ने अपनी अपनी जीत की घोषणा कर दी है और स्वयं को भावी राष्ट्रपति भी घोषित कर दिया है।
हमारी मान्यता है कि विश्व के प्रजातान्त्रिक देश यदि बिना अपना हित साधे इन देशों के साथ थोड़ा सहयोग करें, थोड़ा मार्गदर्शन करें तो ये सही मार्ग पर चलकर एक सशक्त प्रजातंत्र बन सकते हैं अन्यथा अधम हाथों में देश की बागडोर जाने में समय नहीं लगता। यह तथ्य मानवता के हितचिंतकों को नज़रों से ओझल नहीं होने देगा।



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