पुष्पा द राइज फिल्म समीक्षा: कहानी से ज्यादा किरदार दमदार

समय ताम्रकर| Last Updated: शनिवार, 15 जनवरी 2022 (16:08 IST)
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Pushpa The Rise फिल्म समीक्षा: बाहुबली की ऐतिहासिक सफलता के बाद बड़े बजट की ऐसी फिल्मों की संख्या बढ़ गई जिसमें कहानी पर भारी कैरेक्टर होता है। केजीएफ में रॉकी के रूप में ऐसा किरदार नजर आया और अब 'पुष्पा द राइज' में ने पुष्पा राज नामक ऐसा किरदार निभाया है जिसकी अकड़ ही फिल्म की जान है। पुष्पा द राइज़ की कहानी केजीएफ जैसी ही लगती है, सिर्फ बैकड्रॉप बदल दिया गया है। यहां पर जंगल और चंदन की लकड़ियों की तस्करी है। शेषांचलम के जंगलों से ये लकड़ियां चेन्नई, चीन होती हुई जापान तक पहुंचती है। इस काम में करोड़ों का फायदा है, लेकिन कई तरह के जोखिम भी हैं। पुलिस को चकमा देना है, अपराधियों का सिंडीकेट है जिसमें धोखे की पूरी संभावना है, नेता और पुलिस का कट है और हमेशा जान का जोखिम बना रहता है। 
फिल्म का नाम है - पुष्पा द राइज, तो इस काले धंधे में पुष्पा का उदय कैसे होता है, कुछ नहीं से वह बहुत कुछ कैसे बनता है, यह फिल्म के पहले भाग में दिखाया गया है। कुछ दिनों बाद इस फिल्म का दूसरा भाग भी रिलीज होगा। पुष्पा के किरदार पर खासी मेहनत की गई है। उसके पास कुछ भी नहीं है, लेकिन उसकी अकड़ किसी राजा-महाराजा से कम नहीं है। वह किसी को कुछ नहीं समझता। उसके बैठने का एक खास अंदाज है। एक कंधा वह ऊंचा रखता है। शर्ट की आड़ लेकर बीड़ी सुलगाता है। बाल उसके ऐसे हैं जैसे उसने कभी कंघी न की हो। कपड़े ऐसे पहनता है जो कभी धुले ही न हो। वह नाजायज बच्चा है और यह बात उसे बचपन से कचोटती रहती है क्योंकि उसकी मां को कभी सम्मान नहीं मिला। हां, दिमाग उसका बहुत तेज चलता है और वह लकड़ी की तस्करी के ऐसे गुर सिखाता है कि बरसों से यह अवैध धंधा कर रहे लोग गच्चा खा जाते हैं। इसके बल पर वह मजदूर से पार्टनर बन जाता है। 
 
पुष्पा को फिल्म में बहुत मजबूत दिखाया है। पुलिस वाले उसे मार-मार कर पानी-पानी करने लगते हैं, लेकिन वह हंसता रहता है। उसका स्टाइल और अकड़ कभी कम नहीं होती। उसकी इस अकड़ को लेकर कई मनोरंजक सीन रचे गए हैं जिन्हें अल्लू अर्जुन ने अपने अभिनय से देखने लायक बनाया है। अपनी तरकीबों के बल पर वह पुलिस और दूसरे अपराधियों को किस तरह से चकमा देता है ये घटनाएं बार-बार दिखाई गई है। दूध की टंकी में अवैध लकड़ियां ले जाना या पुलिस के छापे के पहले गोडाउन से सारी लकड़ियां पानी में फेंक कर बांध से फिर इकट्ठा करना जैसे सीन भले ही लार्जर देन लाइफ हैं, लेकिन जबरदस्त हैं। 
इंटरवल तक पुष्पा का किरदार स्थापित कर दिया गया और उसकी होशियारी के सारे किस्से दिखा दिए गए। इसके बाद फिल्म पटरी से उतर जाती है। दोहराव दिखने लगता है। मजा इसलिए भी नहीं आता है कि पुष्पा के लिए कोई चुनौती ही नहीं दिखती। बड़ी आसानी से वह जैसा चाहे वैसा कर लेता है। रेड्डी ब्रदर्स जिन्हें फिल्म में बेहद खतरनाक दिखाया गया है पुष्पा के सामने बौने नजर आते हैं। चूंकि इस फिल्म को दूसरे भाग में भी ले जाना है इसलिए पहले भाग की लंबाई बढ़ाने के लिए इसमें पुष्पा की लव स्टोरी भी डाल दी गई है जो ज्यादा अपील नहीं करती। 5000 रुपये में लड़की पुष्पा को 'किस' देने के लिए तैयार हो जाती है जैसे बचकाने सीन भी इसमें डाले गए हैं, हालांकि बाद में इन बातों को जस्टिफाई करने की कोशिश भी की गई है। 
 
महिला किरदार या तो शोषित हैं जैसे की पुष्पा की मां या फिर पान चबाती हुई विलेन है जो अपने पति का गला रेत देती है। पुष्पा की प्रेमिका श्रीवल्ली का किरदार भी कमजोर है। वह पुष्पा जैसे अपराधी को क्यों प्यार करने लगती है? यह नहीं बताया गया है। केवल पुष्पा उसे रोज घूरता था इस बात पर ही वह उसे दिल दे बैठी। पुष्पा इतना निर्दयी क्यों है? अचानक उसे सब कुछ हासिल करने की क्या आवश्यकता क्यों पड़ गई? इन बातों के जवाब नहीं मिलते। माना कि वह नाजायज है, उसे इज्जत और पैसे नहीं मिले, लेकिन फिर इतने साल तक वह इन्हें हासिल करने के लिए क्या कर रहा था? वह अपने पिता के परिवार वालों के आगे इतना मजबूर क्यों है? 
 
इस फिल्म में सारे किरदार अपराधी किस्म के हैं। काले कारनामे करने के पहले कुछ भी नहीं सोचते। डीएसपी शत्रु ही एकमात्र ईमानदार ऑफिसर नजर आता है जो फिल्म के शुरुआती हिस्से में तो पुष्पा के लिए मुश्किलें हासिल करता है, लेकिन फिर उसके किरदार को एकदम गायब ही कर दिया। ये स्क्रिप्ट के झोल हैं जो इंटरवल के बाद उभर कर आते हैं। फिल्म खत्म होने के चंद मिनट पहले एसपी भंवर सिंह शेखावत की एंट्री होती है जिससे पता चलता है कि फिल्म के दूसरे भाग में इसकी पुष्पा से जोरदार टक्कर होगी। 
फिल्म के निर्देशक सुकुमार की मेकिंग जबरदस्त है। फिल्म के आधे हिस्से तक तो उन्होंने फिल्म को इस कदर दौड़ाया है कि दर्शकों को सांस नहीं लेने देते। पुष्पा के किरदार को पहली फ्रेम से वे दर्शकों में दिमाग में इस तरह बैठा देते हैं कि पुष्पा की लार्जर देन लाइफ हरकतें आपको पसंद आने लगती है। उन्होंने वाइस ओवर के जरिये भी फिल्म को आगे बढ़ाया है इसके लिए जो सीन शूट किए गए हैं उसमें मेहनत नजर आती है। फिल्म में खूब हिंसा है, लेकिन मनोरंजन के स्तर को भी बनाए रखा है। पुष्पा बड़े आराम से पूरे स्वैग के साथ अपना काम करता है और यह बात दर्शकों को पसंद आती है। सेकंड हाफ में लेखक सुकुमार चूके गए हैं। 
 
फिल्म के सिनेमाटोग्राफर (Mirosław Kuba Brożek) का काम शानदार है। उनके कैमरा एंगल ने निर्देशक की कल्पनाओं को आसान बनाया है। फिल्म के संपादन का भार कार्तिका श्रीनिवास और रूबेन ने उठाया है और उनका संपादन बेजोड़ है। 'स्लो मोशन' का उन्होंने कई बार इस्तेमाल किया है जिससे मसाला फिल्मों का असर बढ़ जाता है। कब और कहां ये करना है ये वे खूब जानते हैं। फिल्म की लंबाई लगभग तीन घंटे है जो कई बार अखरती है, लेकिन इसमें दोष संपादन का नहीं है, दरअसल निर्देशक ने ही इतने सारे सीन रखे हैं कि एडिटर्स कुछ नहीं कर सकते थे। फिल्म का तकनीनी पक्ष मजबूत है। एक्शन जबरदस्त है। 
 
गीत-संगीत के मामले में फिल्म कमजोर इसलिए लगती है क्योंकि दक्षिण भाषा में बने ओरिजनल सांग को हिंदी में उसी धुन पर बनाना आसान नहीं रहता है। कुछ गाने कम किए जा सकते थे। 
 
अल्लू अर्जुन की एक्टिंग शानदार है। कई बार उनकी एक्टिंग में ओवर डू नजर आता है, लेकिन कैरेक्टर की मांग ही ऐसी थी। अल्लू पहली फ्रेम से पुष्पा के जो भाव, स्वैग और एटीट्यूड पकड़ते हैं तो अंत तक नहीं छोड़ते। उनका अभिनय भी इस फिल्म को दिलचस्प बनाता है। निश्चित रूप से इस फिल्म के बाद अल्लू की लोकप्रियता हिंदी बेल्ट में बढ़ जाएगी। रश्मिका मंदाना को कम सीन मिले। मेकअप की नकली सा लगता है इसलिए वे विशेष प्रभाव नहीं छोड़ पाई। अजय घोष, धनंजय विलेन के रूप में थोड़ा असर डालते हैं। शत्रु की एंट्री तो जोरदार थी लेकिन बाद में उन्हें वैसे सीन नहीं मिले। फरहदा फासिल का जलवा शायद दूसरे भाग में देखने को मिलेगा। 
 
पुष्पा खराब फिल्म नहीं है। वही कहानी है जिसे आप कई बार देख चुके हैं, उसको नए ट्विस्ट, बड़े बजट, प्रोडक्शन वैल्यू के जरिये निखार दिया गया है। आधे से ज्यादा समय तक यह आपको बांध कर रखती है और दूसरे भाग के लिए उत्सुकता जगाती है। 
  • निर्देशक : सुकुमार 
  • संगीत : देवी श्री प्रसाद 
  • कलाकार : अल्लू अर्जुन, रश्मिका मंदाना, शत्रु, फहाद फासिल, धनंजय, अजय घोष 
  • ओटीटी प्लेटफॉर्म : अमेजन प्राइम वीडियो 
  • सेंसर सर्टिफिकेट : यूए * 2 घंटे 56 मिनट
  • रेटिंग : 3/5 



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