डॉली की डोली : फिल्म समीक्षा

लुटेरी दुल्हन की यदि कहानी हो तो कॉमेडी और रोमांच की अपेक्षा बढ़ जाती है क्योंकि ऐसी फिल्मों में दर्शक विशुद्ध मनोरंजन की मांग करता है। 'डॉली की डोली' मनोरंजन करती है, लेकिन कुछ हिस्सों में। ज्यादातर हिस्सों में बोरियत झेलना पड़ती है और यही इस फिल्म की सबसे बड़ी कमी है। 
 
कुछ महीनों पहले 'दावत-ए-इश्क' आई थी, जिसमें दहेज के लोभियों को सबक सिखाने के लिए लड़की और उसका पिता लड़के वालों को शादी के नाम पर मूर्ख बना पैसे ऐंठ चलते बनते हैं। 'डॉली की डोली' की डॉली अपने गैंग के साथ लड़कों को फांस कर शादी रचाती है। सुहागरात के समय पूरे परिवार को नशीला दूध पिला बेहोश करती है और नकद, ज्वैलरी और कीमती सामान पर हाथ साफ कर लेती है। 
 
डॉली ऐसा क्यों करती है, इसके पीछे कोई ठोस कारण नहीं है। न तो वह आदतन बदमाश है और न ही उसे इस तरह की हरकत करने में मजा आता है। इसलिए फिल्म का ड्रामा कमजोर लगता है। फिल्म के अंत में एक ट्विस्ट देकर बताने की कोशिश की गई है कि डॉली ऐसा क्यों करती है, लेकिन ये अधपका कारण लगता है। 
सोनू सहलावत (राजकुमार राव) नामक हरियाणवी छोकरे को डॉली अपने जाल में फंसाती है और शादी कर उसके घर से माल लेकर भाग जाती है। फिर मनजोत सिंह चड्ढा (वरुण शर्मा) के साथ वह यही हरकत करती है। पुलिस में शिकायत भी जाती है, लेकिन डॉली या उसके परिवार के किसी सदस्य का फोटो किसी के पास नहीं होता। ये बात सोच में डालती है कि आजकल हर हाथ में कैमरा मौजूद है, जगह जगह कैमरे लगे हैं, लेकिन डॉली या उसके परिवार का कोई फोटो नहीं खींचता। 
 
इस कहानी में कुछ फिजूल की बातें भी घुसाई गई है। जैसे, डॉली के नकली भाई का रोल मोहम्मद जीशान अयूब ने निभाया है और वह डॉली को दिल दे बैठता है, यह ट्रेक बाद में दिशाहीन हो जाता है। फिल्म का क्लाइमैक्स सहूलियत के हिसाब से लिखा गया है। 
 
 
उमाशंकर सिंह और अभिषेक डोगरा ने मिलकर कहानी लिखी है जो बेहद सरल है। बड़ी-बड़ी बातों को वे इग्नोर कर गए। स्क्रीनप्ले मनोरंजक होता तो ये बातें बर्दाश्त की जा सकती थी, परंतु फिल्म में मनोरंजन का अभाव है लिहाजा ये बातें खटकती हैं। दुल्हन बन कर ठगने वाले किस्से को लेकर अच्छा हास्य पैदा किया जा सकता था, जिसमें लेखक पूरी तरह सफल नहीं हो पाए। 
 
राजकुमार राव और वाला ट्रेक अच्छा है क्योंकि राजकुमार बेहतरीन अभिनेता हैं और अपने अभिनय से वे दर्शकों की रूचि बनाए रखते हैं। वरुण शर्मा 'फुकरे' से बाहर ही नहीं आ पा रहे हैं। उन्हें फिर उसी अंदाज में पेश किया गया। पुलकित सम्राट ने जमकर बोर किया। वे सलमान खान बनने की कोशिश करते रहे और उनका ट्रेक ठीक से लिखा भी नहीं गया है। 
 
सोनम कपूर ने सेंट्रल रोल निभाया है और उन्होंने अपना काम अच्छे से किया है। फिल्म की सपोर्टिंग कास्ट अच्छी है। अर्चना पूरनसिंह, ब्रजेंद्र काला, मनोज जोशी, राजेश शर्मा ने छोटे-छोटे किरदारों में उम्दा अभिनय किया है। मलाइका अरोरा खान ने एक गाने में हॉट अदाएं दिखाई हैं। सैफ अली खान गेस्ट अपियरेंस में चौंकाते हैं।  
 
अभिषेक डोगरा का निर्देशन अच्छा है, लेकिन स्क्रिप्ट का साथ न मिलने से वे फिल्म को चुस्त नहीं बना सके। कई जगह फिल्म बोझिल हो जाती है। फिल्म मात्र सौ मिनट की है, लेकिन यह समय भी लंबा लगने लगता है। 
 
साजिद-वाजिद का एक भी गाना हिट नहीं है और इस तरह की फिल्मों में हिट गाने की सख्त जरूरत होती है। 
 
कुल मिलाकर 'डॉली की डोली' में वो मसाला नहीं है जिसके लिए दर्शक इस तरह की फिल्मों के टिकट खरीदते हैं। 
 
बैनर : प्रोडक्शन्स
निर्माता : अरबाज खान, मलाइका अरोरा खान
निर्देशक : अभिषेक डोगरा
संगीत : साजिद वाजिद 
कलाकार : सोनम कपूर, राजकुमार राव, पुलकित सम्राट, वरुण शर्मा, मलाइका अरोरा खान
सेंसर सर्टिफिकेट : यूए * 1 घंटा 40 मिनट
रेटिंग : 2/5



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