लता मंगेशकर से ऐसी बातचीत जो उन्होंने किसी से पहली बार ही की थी

Last Updated: रविवार, 6 फ़रवरी 2022 (18:17 IST)
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का यह इंटरव्यू 1988 में किया गया था। ऐसी बातचीत उन्होंने किसी से पहली बार ही की थी। यह ‘फिल्म‍ विशेषांक’ से लिया गया है।


हमारे अंधेरों और हमारी उदासियों को बेधकर एक महीन आवाज पिछले कई दशकों से कानों के जरिये हमारे खून में शामिल होती रही है- उसी आवाज का नाम है- लता मंगेशकर। दरअसल लता मंगेशकर एक नाम न होकर जीवित आश्चर्य था जिसमें हिंदुस्तान की कई पीढ़ियां अपनी आत्मा के अकेलेपन को खोजती हैं। उस अकेलेपन को जो पीड़ा की पवित्रता में छटपटाता रहता है। क्या आपको नहीं लगता, लता मंगेशकर को सुनते हुऐ कि सब कुछ ठहर गया है। सिर्फ एक स्वर चल रहा है, ठीक वहां उसे उठकर, जहां से शब्द अपना ‘अर्थ’ ग्रहण करते हैं। कम-ज-कम उनकी गाई हुई लोरियां सुनकर तो यही लगता है जैसे हम अपनी उम्र और अनुभवों को छोड़कर एक उनींदे बच्चे की देह में सिमट गए हैं। कदाचित्‍ आवाज की ऐसी ममतालु तरलता को पाकर ही पॉल वेलेरी ने लिखा होगा- ‘आवाज के भी हाथ होते हैं, जो हमारी आत्मा तक पहुंचते हैं।‘ बहरहाल, लता मंगेशकर का स्वर भावनाओं और संवेदनाओं की एक अमूर्त थपथपाहट है। इस स्वर में अतीत की स्मृतियों को पुनर्जीवित करने का अपरिभाषेय सामर्थ्य है और भविष्य के आकारों को गढ़ने की अद्भुित शक्ति। लता मंगेशकर को सुमम व लोकप्रिय संगीत की मोनालिसा कहा जा सकता है, इसलिए अद्वितीय भी। नई पीढ़ियां आएंगी और आती रहेंगी,और उन सबके बीच उनकी यह आवाज संगीत के संसार के एक अनश्वर नागरिक की तरह शताब्दियों तक हरदम बनी रहेगी।

लता जी का सुर संगीत के साथ तो सप्तम की सीमा पर पहुंचता है लेकिन बोलती हैं तो उनके शब्द एक धीमी गुनगुन आहट की तरह आपको अपनी आत्मीयता से घेर लेते हैं। इतनी मृदुल, मितभाषी और व्यस्ततम कलाकार से लंबी बातचीत सतर्कता की परीक्षा भी थी। मुंबई पहुंचकर उनके आवास पर यह बातचीत हुई। इसका बातचीत का संयोजन किया सर्वश्री सुरेश गावडे, श्रीराम ताम्रकर और अभय छजलानी ने।

दीदी फिल्मी दुनिया में प्रवेश किए आपको इतने साल हो चुके हैं। समय के लंबे इस दौर में कितनी ही गायक, गायिका, संगीतकार और गीतकार आए और पर्दे के पीछे चले गए। यह हमारा सौभाग्य है कि परिवर्तन के इस दौर की आप साक्षी हैं। संगीत का जीता जागता है इतिहास हैं आप। हम जानना चाहते हैं कि जब आपने फिल्मी दुनिया में कदम रखा तब कैसा माहौल था और कैसे थे लोग?
दरअसल फिल्मों में मेरा प्रवेश 1942 में हुआ है। उस समय तक मेरे पिताजी थे। उनके एक दोस्त थे जिनका नाम सदाशिवराव नेवरेकर था। उन्होंने मेरा गाना सुना था। मैं उन दिनों अपने पिताजी के साथ स्टेज पर क्लासिकल म्यूजिक के प्रोग्राम किया करती थी। जब मेरी उम्र 9 साल की थी तब गाना शुरू किया और मैं स्टेज पर गई। यह बात सबको मालूम थी कि मैं गाती हूं। सदाशिव राव ने जो कि मेरे पिताजी के साथ नाटकों में काम किया था उन्होंने आकर मेरे पिताजी को कहा कि लता उनके लिए एक गीत गाए।

वह पहला गीत आपका प्लेबैक था या अपने अभिनय करते हुए गीत गाया था?
यह मुझे ठीक से याद नहीं है कि वह मेरा प्लेबैक था या मुझे काम भी करना था। यह बात मार्च 1942 की है। पिताजी ने बड़ी मुश्किल से इस बात की इजाजत दी क्योंकि वे लड़कियों के फिल्म या स्टेज पर काम करने के बहुत खिलाफ थे। वह बहुत कंजरवेटिव थे। उस वक्त तक हमारे घर में इस स्नो या पाउडर वगैरह मना था। उन्होंने सिर्फ एक गाने की इजाजत दी। वसंत जोगलेकर की फिल्म थी ‘किती हसाल’। उस फिल्म में मैंने पहला गाना गाया था। उसके बाद पिताजी की मृत्यु हुई तो बात वहीं रुक गई।

विनायक मास्टर जो अभिभावक की तरह आपके जीवन में आए उन से किस प्रकार संपर्क हुआ?
जब पिताजी जीवित थे उसी दौरान मास्टर विनायक को मैंने अपना गाना सुनाया था। यह बात मेरे पिताजी को बहुत खराब लगी थी। पिताजी के साथ काम करने वाले जोशी नामक एक व्यक्ति थे। यह पिताजी को बगैर बताए चुपके से मुझे मास्टर विनायक के यहां ले गए थे। उन्होंने गाना सुन कर कहा था कि हमारी फिल्म में काम करो। यह बात जब पिताजी को मालूम हुई तो वे बहुत नाराज हुए थे। उनकी मृत्यु के बाद फिर मुझसे पूछा गया और मजबूरन मुझे पिक्चर साइन करना पड़ी। मेरी पहली फिल्म थी नवयुग प्रिंस की ‘पहली मंगलागौर’। स्नेह प्रभा प्रधान इसकी हीरोइन थी और शाहू मोडक हीरो थे। फिल्म में स्नेहा प्रभा प्रधान की बहन का मैंने रोल किया था। यह मेरी एक्टिंग का पहला कदम था और दो-तीन गाने भी मैंने गाए थे। इसके बाद विनायकराव ने यह कंपनी छोड़ दी और वह कोल्हापुर आए। कोल्हापुर में उन्होंने प्रफुल्ल पिक्चर्स नाम से संस्था शुरू की उस कंपनी में मैं जनवरी 1943 में आई थी। एक तरह से वह हमारी नौकरी जैसी थी क्योंकि कंपनी की जितनी फिल्में बनती थीं उनमें हम सबको छोटे-छोटे रोल करना होते थे।

उन दिनों आप का मुख्य लक्ष्य गाना था या फिल्मों में अभिनय करना?
मेरा मुख्य आकर्षण तो गाना ही था। एक्टिंग तो तब भी पसंद नहीं थी और अब भी नहीं है। मैंने जितनी भी एक्टिंग की है सब मजबूरी में की है। वह सारा समय हमारे परिवार के लिए बहुत बुरा गुजरा है। मुझे मलेरिया हो गया। दो-तीन साल तक बीमार रही। बीमारी की हालत में मैं काम भी करती थी। मेरे परिवार ने इसके पहले बहुत अच्छे दिन देखे थे। 80 रुपये महीने में जैसे तैसे हम लोग गुजारा करते थे। हम 5बजे भाई बहन और मेरी मां का परिवार था। इस दौरान भाई भी काफी बीमार रहा।

कोल्हापुर से मुंबई आने के क्या कारण रहे?
मास्टर विनायक ने कोल्हापुर में अपनी फिल्म कंपनी बंद कर दी और वह मुंबई आ गए। 1944 के आखिर में हम लोग भी उनके पीछे-पीछे मुंबई चले आए। मुंबई आकर विनायक ने सुभद्रा तथा मंदिर जैसी दो तीन फिल्में बनाई। उन्होंने शांताराम जी की भी एक फिल्म जीवन यात्रा डायरेक्ट की थी जिसमें मैंने रोल किया था। मंदिर फिल्म के समय से विनायक बीमार रहने लगे थे। उसके पहले उन्होंने मुझे बाहर जाने की इजाजत दे दी थी। बसंत जोगलेकर की फिल्म थी आपकी सेवा में उसमें मैंने दो गाने गाए थे। विनायक की मृत्यु के दसवे दिन मुझे काम मिला संगीतकार हरिश्चंद्र बाली के निर्देशन में। मैंने पहली बार प्लेबैक दिया। इसके पहले श्री रामचंद्र की फिल्म शहनाई में मैंने गाया भी था।

लेकिन फिल्मों में जिसे ब्रेक देना कहते हैं वह आपको संगीतकार गुलाम हैदर साहब से मिला?
जी हां जब मैं हरिश्चंद्र वाली साहब के यहां गाना गा रही थी तो वहां किसी ने मुझे सुना और गुलाम हैदर साहब को जाकर बताया कि एक नई आवाज है बहुत अच्छा गाती है। मास्टर गुलाम हैदर ने मुझे बुलाया। जब मैं उनसे मिलने गई तो उस समय उनकी फिल्म शहीद चल रही थी। उन्होंने मेरा गाना सुना उन्हें बहुत अच्छा लगा। दूसरे दिन आवाज टेस्ट करने के लिए बुलाया। उन दिनों आवाज टेस्ट करने का मतलब रिकॉर्ड करना था। आवाज रिकॉर्ड कर सुनी तो उन्हें अच्छी लगी। लेकिन फिल्मीस्तान के शशधर मुखर्जी साहब को आवाज अच्छी नहीं लगी और उन्होंने शायद यह कहा कि आवाज बहुत पतली है। नहीं चलेगी।

मुखर्जी साहब ने ऐसा शायद इसलिए कहा होगा कि उन दिनों मोटी आवाजों का चलन था जोहरा बाई नूरजहां सुरैया अमीरबाई का जमाना था वह।
नूरजहां तो चली गई थी उस वक्त तक। मगर जोहराबाई शमशाद भाई वगैरह ऐसे गीत गाती थी। इसलिए उन्होंने कहा कि यह आवाज तो बहुत पतली है। यह सही भी था क्योंकि मेरी उम्र भी बहुत छोटी थी। वैसे भी मेरी आवाज बहुत पतली थी। जो हीरोइन के लिए नहीं चलती। मास्टर गुलाम हैदर साहब ने लोकल ट्रेन के एक स्टेशन पर मुझसे गवाया और 555 सिगरेट के टीन पर उन्होंने ठेका दिया। यह किस्सा मैं कई बार बतला चुकी हूं और बहुत से लोगों को मालूम भी होगा।

कौन सा था वह पहला गाना?
मास्टर गुलाम हैदर साहब के लिए पहला गाना मैंने फिल्म मजबूर के लिए गाया था- दिल मेरा तोड़ा मुझे कहीं का ना छोड़ा, यह फिल्म 1948 में रिलीज हुई थी। इसके बाद मुकेश भैया मेरे पास आए और कहा कि नौशाद साहब तुम्हें लेना चाहते हैं। मैंने मुकेश भैया से साफ कहा था कि मैं गाना नहीं सुनाऊंगी।
हर जगह ट्रायल देना मुझे पसंद नहीं है। मुकेश जी ने पलटकर कहा था कि तुम्हारी ट्रायल कौन लेगा। उन्होंने शायद नौशाद साहब को यह बात बता दी होगी। दूसरे दिन नौशाद साहब से मुलाकात हुई। उन्होंने बड़ी खुशी जाहिर की और कहा कि अच्छा हो आप दो लाइन हमें भी सुना दे। हम आपकी आवाज सुनना चाहते हैं। मैं समझ गई थी कि यह ट्रायल ही है। मैंने कुछ कहा नहीं और एक गाना सुना दिया। फिर उन्होंने गजल सुनाने को कहा। शायद यह देखना चाह रहे थे कि उर्दू के मेरे उच्चारण कैसे हैं। मैंने उन्हें वह गजल सुनाइ जो श्याम सुंदर जी के लिए फिल्म लाहौर में गा रही थी। उसके बाद नौशादजी ने मुझे अपनी फिल्म के लिए गाना गाने का निमंत्रण दिया। उनके लिए पहला गाना मैंने फिल्म चांदनी रात के लिए गया था। वो युगल गीत था। जब गाना रिकॉर्ड हो रहा था तो नौशाद साहब बीमार पड़ गए। उनके असिस्टेंट थे गुलाम मोहम्मद साहब। उन्होंने गाना रिकॉर्ड किया। उसके बाद मैंने दुलारी पिक्चर में गाने गाए और फिर अंदाज में। इसी बीच लाहौर बाजार में श्याम सुंदर जी के साथ, खेमचंद प्रकाश जी के साथ जिद्दी और आशा नामक फिल्म में भी मैंने गाने गाए। हुस्नलाल भगत राम के लिए फिल्म बड़ी बहन में यह गाने गाए थे चले जाना नहीं नैन मिलाके और चुप चुप खड़े हो जरूर कोई बात है।

सफलता का यह सारा सिलसिला तेजी से एक संयोग बनकर आप से जुड़ गया। इसे किस तरह स्वीकार किया आपने?
जी हां, एक सफलता एक साथ सफलता का यह सिलसिला शुरू हुआ। पहले मजबूर रिलीज हुई। उसके बाद अंदाज और बरसात का नंबर आ गया। शंकर जयकिशन से मुलाकात हुई। अनिल विश्वास जी के साथ भी गाने शुरू किए। गर्ल स्कूल उनके साथ पहली फिल्म थी। उसके दो गाने रिकॉर्ड हुए थे कि निर्माता से अनिल जी का झगड़ा हो गया। उन्होंने यह पिक्चर छोड़ दी। उसके बाद खिड़की फिल्म आई। यहां तक आते-आते लगभग सभी संगीत निर्देशकों के साथ मैं गाने लगी थी, लेकिन अंदाज रिलीज होने के साथ ही मेरा नाम खूब हुआ और बरसात से तो मैं चोटी पर चली गई। इस सफलता को पाने में ज्यादा देर नहीं लगी। 1947 में विनायक की मृत्यु हुई किंतु 1949 तक पूरा देश मुझे पहचानने लग गया। गानों के ऑफर इतने मिलने लगे कि सुबह यहां, दोपहर को वहां, शाम को और कहीं। मैं सुबह घर से छह बजे निकलती थी और रात को 3-4 बजे घर पहुंची थी। ज्यादातर ट्रेन में बैठ कर जाना पड़ता था कभी-कभार किसी से लिफ्ट ले लिया करती थी।

दीदी यह बताइए कि उन तमाम संगीतकारों का क्या हुआ जो आपकी आवाज को पतली बताते थे और कहते थे कि हीरोइन को सूट नहीं होगी?
वह सब के सब तेजी से बदल गए। मेरी आवाज सबसे अलग थी इसमें कोई शक नहीं। शायद आवाज की ताजगी को संगीतकारों ने महसूस किया होगा। वैसे उस समय के गाने वालों की अपनी शैली थी। जैसे गीता दत्त की आवाज बड़ी टिपिकल थी। सब से नुकीली आवाज शमशाद बाई की थी। हर गाने का उनका अपना ढंग था। जोहरा बाई की आवाज काफी मोटी थी। इन सब ने मेरी आवाज बिल्कुल अलग थी।

यदि यह कहा जाए कि हीरोइन आपकी आवाज से पहचानी जाने लगी और आपकी आवाज एक स्टैंडर्ड बन गई तो कैसा लगेगा आपको?
यह तो आप लोगों पर निर्भर है कि आप क्या सोचते हैं। मगर मेरे आने के बाद काफी कुछ जो परिवर्तन हुआ वो यह संगीतकार मेरे लिए अलग से गाने बनाने लगे। जैसे शंकर जयकिशन के संगीत का बहुत बड़ा रेंज था। उन्होंने हर टाइप के गाने दिए। संगीत में अलग-अलग स्टाइल को अपनाया। सिर्फ राज कपूर की फिल्में ही नहीं उनके अलावा उन्होंने जितनी फिल्मों में संगीत दिया एक से बढ़कर एक था। उनका संगीत सचमुच में अनोखा था। अनिल विश्वास अपना अलग प्रकार का संगीत लेकर आए थे। नौशाद साहब के संगीत में क्लासिकल टच के अलावा लखनवी नजाकत भी मिलती है। वसंत देसाई सलील चौधरी बर्मन दादा रोशन मदन मोहन जयदेव जी जैसे तमाम संगीतकारों के संगीत का अपना ढंग और अपनी शैली थी।

लेकिन दीदी आज तो सब कुछ बदल गया है। नए चेहरे आ गए हैं। नए वाद्य यंत्र और नई नई शैलियां चल पड़ी है। क्या आप भी इस बदलाव को महसूस करती हैं?
आज मैं तो यह महसूस करती हूं कि संगीतकारों के दायरे सीमित हो गए। 2-4 म्यूजिक डायरेक्टर ही ऐसे हैं जो पुरानी परंपराओं को कायम रखे हुए हैं। कुछ वेस्टर्न म्यूजिक पर चल रहे हैं। कोई है जो शंकर जयकिशन जैसा लगे या बर्मन दादा जैसा? गायकों में भी यही स्थिति है। मुकेश रफी किशोर जैसा भी कोई नहीं। मैं तो यह मानती हूं कि ईश्वर किसी को बनाता है तो एक ही बनाता है। यदि हजार मुकेश निकले तो फिर मुकेश को कोई पूछेगा नहीं। रफी साहब जैसे गाने वाले आजकल बहुत हैं पर रफी कोई नहीं है। कोई अगर कहता है कि रफी साहब उन्नीस गाते थे तो कोई ऐसा भी आ सकता है जो बीस या इक्कीस हो। मगर उन्नीस कोई नहीं आएगा। यही जाकर हम ईश्वर को मानते हैं।

आप लोग मुंबई में बैठकर ओरिजिनल धून बनाते हैं। गीत गाते हैं। बार-बार रिहर्सल करते हैं। लेकिन दिल्ली में बैठे नए गायक गायिका उनकी गीतों तथा धुनों की नकल कर कवर वर्शन के नाम पर संगीत को प्रदूषित कर रहे हैं।इससे श्रोताओं की नई पीढ़ी गुमराह हो रही है। आप लोग मिलकर इसे रोकने की कोशिश क्यों नहीं करते?
मैं आपको असल बात बताऊं। ऐसे प्रयासों से कुछ लोगों ने हमारे म्यूजिक को बहुत ही गंदा कर दिया है। उसने पायरेसी से बहुत पैसा कमाया। पैसा कमाना बुरी बात नहीं है पर आप किसी का नुकसान कर जब पैसा कमाते हैं तो वह पैसा आज अगर फल भी रहा हो तो आगे फलेगा नहीं। आप अगर देवी के भक्त हैं तो आप वही काम कीजिए जो एक भक्त को शोभा देता है। व्यवसाय के ऐसे तरीकों ने एचएमवी का नुकसान किया है। नुकसान हमारा भी हुआ है लेकिन मेरा नुकसान बहुत बड़ा नुकसान इसलिए नहीं है कि मैं और भी फिल्मों में गाती हूं। पर जो छोटे-छोटे आर्टिस्ट है उनका तो नुकसान हुआ है। उनका सत्यानाश किया है इन लोगों ने। हम इन से लड़ाई क्या लड़ सकते हैं जब कोई रोकने वाला ही नहीं है। ऐसे व्यवसाई इतना ओपनली कहते हैं कि अच्छा आप हमारे यहां नहीं गाएंगे तो हम आप के बाहर के गानों की पायरेसी करके उसे बेचेंगे। एचएमवी यदि आप का रिकॉर्ड रुपये 80 में बेचती है तो हम एकदम कम मूल्य में बेचेंगे। यानी देखिए कितने नीचे आदमी आ सकता है इससे मालूम होता है। यह लोग हमारे साथ यह कर रहे हैं कि गाना कोई भी आर्टिस्ट गा रहा है कैसेट के ऊपर में फोटो मेरी है। मेरे पास ऐसे कैसेटो के सबूत हैं। ऐसे व्यवसायियों के लिए मैंने भी गाया है पर हमने गाने नए बनाकर गाएं हैं।

दीदी जैसा कुछ देर पहले आपने कहा कि रफी होंगे तो एक ही होंगे या मुकेश होंगे तो एक ही होंगे आपके बारे में भी तो यह बात कही जा सकती है कि भगवान ने आपको आवाज का उपहार दिया बदले में आप ने आवाज को उपहार बनाकर भगवान को अर्पित कर दिया इस बारे में आप क्या कहना चाहेंगी?
मैं तो यह मानती हूं कि जो आवाज भगवान ने मुझे दी है। वह उनकी नियामत है जो आवाज बख्शी है मुझे। उसके जरिए तो मैंने पैसा कमाया है फिल्मों में गाने गाए हैं। कभी चीप गाने भी गाए होंगे कभी अच्छे गाने भी गाए होंगे पर मैं अपनी तरफ से कोशिश यह करती हूं कि जो उसने मुझे यह उपहार बख्शा है उसके जरिए मैं उसको भी कभी-कभी याद करूं। मुझे वाकई भजन गाने में ज्यादा अच्छा लगता है। जब मैं गाना गाती हूं तो यह नहीं देखती कि मुझे पैसे कितने मिलेंगे। पहले पैसे लाओ फिर गाना गाओ यह मैंने आज तक कभी किया नहीं और मैं यह समझती हूं कि यह सब उसने मुझे दिया है। जब उसकी इच्छा होगी सब एक साथ वसूल कर लेगा। इसलिए मैं अपना कोई बड़प्पन नहीं समझती। मैं तो कुछ नहीं हूं। जब तक उसकी इच्छा है वह मुझसे गवाएगा। जिस दिन उसकी इच्छा नहीं होगी यह बात नहीं रहेगी। रहेगा हमेशा उसका नाम मेरा नहीं। लोग आगे भी यही कहेंगे कि भगवान ने लता को आवाज का उपहार दिया था। मैं अपने मां बाप का आशीर्वाद समझ सकती हूं। उनकी वजह से मैंने दुनिया देखी है या भगवान की भी इच्छा रही होगी कि मैं इतना काम करूं या इससे भी ज्यादा काम। मैं यह मान कर कर रही हूं कि मैं कुछ नहीं हूं।

सन 1945 से लेकर 1965 तक इन 20 सालों में हिंदी फिल्मों का गीत संगीत अच्छा चलता रहा। उसमें मेलोडी बनी रही। भाव भी कायम रहे। इसके बाद के वर्षों में इलेक्ट्रॉनिक रिवॉल्यूशन हुआ। नए वाद्य यंत्र आए। ऑर्केस्ट्रा का विकास हुआ। इससे गायक गायिकाओं की स्थिति में बदलाव आया। उन्हें कम महत्व दिया जाने लगा। इसके साथ ही फिल्म संगीत का स्तर भी गिरता चला गया। गीतों की संख्या कम हो गई। अच्छे गायक भी नहीं रहे। रेडियो टीवी या एचएमवी कंपनी भी उन्हीं 20 सालों के गाने ज्यादा बाहर ला रही है या गीत-संगीत का स्वर्ण युग इसी दौर में सिमट कर रह जाएगा?
जी हां या मेरा भी अनुभव है। मैं जहां कहीं बाहर जाकर प्रोग्राम करती हूं श्रोताओं की जो फरमाइश आती है वह सब पुराने गीतों की होती है। पुराने गाने हम गाते हैं तो लोग एक बार नहीं 10 बार सुनना पसंद करते हैं। नए गानों की बहुत कम फरमाइश होती है। लेकिन संगीत की दुनिया में जो पहले नहीं हुआ है वह अब हुआ है। मैं इसके लिए किसी को दोष नहीं देती। किसी संगीतकार को दोष नहीं देती क्योंकि उनको भी सब करना पड़ता है। उन्हें कहा जाता है कि भाई हमें ऐसा चाहिए तो वह ऐसा दे देते हैं। संगीतकार भी बहुत कम हो गए। अच्छे संगीतकार जो थे वे अब इस दुनिया में नहीं है। जो है उनके पास काम भी नहीं है। मैंने हाल में सुना कि किसी म्यूजिक डायरेक्टर ने नौशाद साहब के बारे में बहुत खराब बातें कही है। मुझे बड़ा दुख हुआ। उन्होंने यह कहा कि नौशाद साहब तो एक गाना रिकॉर्ड करने के लिए 15 या 20 दिन लगाते थे। तब गाना बनता था और हम हैं कि आज 20 दिन में 20 पिक्चरों का म्यूजिक कर लेते हैं और वो यह कहते समय यह भूल गया कि नौशाद साहब का एक गाना जो होता था वह 20 साल तक लोग सुनते थे और इनकी जो 20 फिल्में बनती है वह लोग 20 दिन भी नहीं सुनते बल्कि 20 मिनट भी सुनना पसंद नहीं करेंगे। नौशाद साहब के म्यूजिक या अनिल बिश्वास, सलिल चौधरी, मदन मोहन या बर्मन दादा जैसे जो भी बड़े संगीतकार थे वो लोग अपनी आत्मा के संगीत में डालकर संगीत रचना करते थे और यह लोग दूसरे लोगों के रिकॉर्ड लाकर उन्हें सुनते हैं और कॉपी करते हैं।



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