कमाल अमरोही : इक ख्वाब-सा देखा था जो पूरा न हुआ ..

Last Updated: मंगलवार, 2 फ़रवरी 2021 (16:41 IST)
महल, पाकीजा और जैसी भव्य कलात्मक फिल्मों से परदे पर काव्य की रचना करने वाले निर्माता-निर्देशक कमाल अमरोही का एक से बढ़कर एक अजीम शाहकारों से दर्शकों को रूबरू कराने का सिलसिला आखिरी समय तक जारी रहा था। अपने फिल्मी जीवन के आखिरी दौर में वह अंतिम मुगल नाम से फिल्म बनाना चाहते थे, लेकिन उनका यह ख्वाब अधूरा ही रह गया।

कमाल अमरोही का मूल नाम-सैयद आमिर हैदर था। कमाल को ऐसी शख्सियत के रूप में याद किया जाता है, जिन्होंने बेहतरीन गीतकार, पटकथा और संवाद लेखक तथा निर्माता एवं निर्देशक के रूप में भारतीय सिनेमा पर अपनी अमिट छाप छोड़ी और उसे एक दिशा देने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

17 जनवरी 1918 को उत्तर प्रदेश के अमरोहा में जमींदार परिवार में जन्मे कमाल अमरोही के मुम्बई की फिल्म नगरी तक पहुँचने और फिर कामयाबियों का इतिहास रचने की कहानी किसी फिल्मी किस्से से कम दिलचस्प नहीं है।

बचपन में अपनी शरारतों से वे पूरे गाँव की नाक में दम किए रहते थे। एक बार अपनी अम्मी के डाँटने पर उन्होंने वादा किया कि वह किसी दिन मशहूर होंगे और उनके पल्लू को चाँदी के सिक्कों से भर देंगे। इस दौरान एक वाकया ऐसा हुआ, जिसने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी। उनकी शरारतों से तंग होकर बड़े भाई ने एक दिन उन्हें गुस्से में थप्पड़ रसीद कर दिया तो कमाल अमरोही नाराजगी में घर से भागकर लाहौर पहुँच गए।
कमाल अमरोही के लिए लाहौर उनके जीवन की दिशा बदलने वाला साबित हुआ। वहाँ उन्होंने प्राच्य भाषाओं में मास्टर की डिग्री हासिल की और फिर एक उर्दू समाचार पत्र में मात्र 18 वर्ष की उम्र में ही नियमित रूप से स्तम्भ लिखने लगे। उनकी प्रतिभा का सम्मान करते हुए अखबार के सम्पादक ने उनका वेतन बढ़ाकर 300 रुपए मासिक कर दिया, जो उस समय काफी बड़ी रकम थी।

अखबार में कुछ समय तक काम करने के बाद उनका मन उचाट होने लगा और वे कलकत्ता चले गए और फिर वहाँ से मुम्बई आ गए। यह भी कहा जाता है कि लाहौर में उनकी मुलाकात प्रसिद्ध गायक, अभिनेता कुन्दनलाल सहगल से हुई थी, जो उनकी प्रतिभा को पहचानकर उन्हें फिल्मों में काम करने के लिए मिनर्वा मूवीटोन के मालिक निर्माता-निर्देशक सोहराब मोदी के पास मुम्बई लाए।
इसी दौरान उनकी एक लघुकथा ‘सपनों का महल’ से निर्माता-निर्देशक और कहानीकार ख्वाजा अहमद अब्बास प्रभावित हुए और उन्होंने इस कहानी पर फिल्म बनाने का विचार किया। फिल्म के लिए निर्माता भी तलाश लिया गया था लेकिन कुछ समय बाद उनकी हालत यह हो गई कि उन्हें बिना पैसे और यहाँ तक कि बिना भोजन के दिन गुजारने पड़े।

कमाल अमरोही के सितारे गर्दिश में थे कि उन्हें पता चला कि सोहराब मोदी को एक कहानी की तलाश है। वह तुरन्त उनके पास पहुंचे और उन्हें 300 रपए के मासिक वेतन पर रख लिया गया। उनकी कहानी पर आधारित फिल्म ‘पुकार’ (1939) सुपर हिट रही। नसीम बानो और चंद्रमोहन अभिनीत इस फिल्म के लिए उन्होंने चार गीत लिखे- धोया महोबे घाट हे हो धोबिया रे.., दिल में तू आँखों में तू मेनका.., गीत सुनो वाह गीत सैयां.., काहे को मोहे छेड़े रे बेईमनवा.. जो बेहद मकबूल हुए। इनमें अंतिम गीत दो अलग-अलग स्वरों में हैं। पहली बार इसे नसीम और शीला से तथा दूसरी बार सरदार अख्तर से गवाया गया।
इसके बाद तो फिल्मों के लिए कहानी, पटकथा और संवाद लिखने का उनका सिलसिला चल पड़ा और उन्होंने जेलर (1938), मैं हारी (1940), भरोसा (1940), मजाक (1943), फूल (1945),
शाहजहाँ (1946), (1949),
दायरा (1953), दिल अपना और प्रीत पराई (1960), मुगले आजम (1960), पाकीजा (1971), शंकर हुसैन (1977)
और रजिया सुल्तान (1983) जैसी फिल्मों के लिए कहानी, पटकथा और संवाद लिखने का काम किया।

कमाल अमरोही ने बेहद चुनिंदा फिल्मों के लिए काम किया, लेकिन जो भी काम किया, पूरी तबियत और जुनून के साथ किया। उनके काम पर उनके व्यक्तित्व की छाप रहती थी। यही वजह है कि फिल्में बनाने की उनकी रफ्तार काफी धीमी रहती थी और उन्हें इसके लिए आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ता था।

की फिल्म ‘महल’ कमाल अमरोही के करियर का महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई। इस फिल्म के निर्देशन का जिम्मा उन्हें सौंपा गया। रहस्य और रोमांस के ताने-बाने से बुनी, मधुर गीत-संगीत और ध्वनि के कल्पनामय इस्तेमाल से बनी यह फिल्म सुपरहिट रही और इसी के साथ बालीवुड में हॉरर और सस्पेंस फिल्मों के निर्माण का सिलसिला चल पड़ा। फिल्म की जबरदस्त कामयाबी ने नायिका मधुबाला और गायिका लता मंगेशकर को फिल्म इंडस्ट्री में स्थापित कर दिया।
महल फिल्म की कामयाबी के बाद कमाल अमरोही ने 1953 में कमाल पिक्चर्स और 1958 में कमालिस्तान स्टूडियो की स्थापना की। कमाल पिक्चर्स के बैनर तले उन्होंने अभिनेत्री पत्नी मीना कुमारी को लेकर दायरा फिल्म का निर्माण किया, लेकिन भारत की कला फिल्मों में मानी जाने वाली यह फिल्म बॉक्स आफिस पर नहीं चल पाई।

इसी दौरान निर्माता-निर्देशक के.आसिफ अपनी महत्वाकांक्षी फिल्म मुगल-ए-आजम के निर्माण में व्यस्त थे। इस फिल्म के लिए वजाहत मिर्जा संवाद लिख रहे थे, लेकिन आसिफ को लगा कि एक ऐसे संवाद लेखक की जरूरत है, जिसके लिखे संवाद दर्शकों के दिमाग से बरसों बरस नहीं निकल पाएँ और इसके लिए उन्हें कमाल अमरोही से ज्यादा उपयुक्त व्यक्ति कोई नहीं लगा। उन्होंने उन्हें अपने चार संवाद लेखकों में शामिल कर लिया। उनके उर्दू भाषा में लिखे संवाद इतने मशहूर हुए कि उस दौरान प्रेमी और प्रेमिकाएँ प्रेमपत्रों में मुगले आजम के संवादों के माध्यम से अपनी मोहब्बत का इजहार करने लगे थे। इस फिल्म के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ संवाद लेखक का फिल्म फेयर पुरस्कार दिया गया।
‘पाकीजा’ कमाल अमरोही का ड्रीम प्रोजेक्ट थी, जिस पर उन्होंने 1958 में काम करना शुरू किया था। उस समय यह ब्लैक एंड व्हाइट में बनने वाली थी। कुछ समय बाद जब भारत में सिनेमास्कोप का प्रचलन शुरू हो गया तो उन्होंने 1961 में इसे सिनेमास्कोप में बनाना शुरू किया। लेकिन कमाल अमरोही का अपनी तीसरी पत्नी मीना कुमारी से अलगाव हो जाने के कारण फिल्म का निर्माण कुछ वर्षों के लिए बंद रहा। बाद में किसी तरह उन्होंने मीना कुमारी को फिल्म में काम करने के लिए राजी कर लिया और आखिरकार 1971 में जाकर यह फिल्म पूरी हुई तथा फरवरी 1972 को रिलीज हुई।
बेहतरीन संवाद, गीत-संगीत, दृश्यांकन और अभिनय से सजी इस फिल्म ने रिकार्डतोड़ कामयाबी हासिल की और आज यह फिल्म इतिहास की क्लासिक फिल्मों में गिनी जाती है। उन्होंने इस फिल्म के लिए एक गीत मौसम है आशिकाना भी लिखा था, जो बेहद मकबूल हुआ था।

इस फिल्म के बाद कमाल अमरोही का फिल्मों से कुछ समय तक नाता टूटा रहा। 1983 में उन्होंने फिर फिल्म इंडस्ट्री की तरफ रूख किया और ‘रजिया सुल्तान’ फिल्म से अपनी निर्देशन क्षमता का लोहा मनवाया। हालाँकि भव्य स्तर पर बनी यह फिल्म बॉक्स आफिस पर कामयाब नहीं रही और वे इसकी नाकामयाबी से कुछ समय तक सदमे की हालत में रहे।
इससे उबरने के बाद कमाल फिर एक फिल्म बनाने का सपना संजोए थे। वे अंतिम मुगल नाम से फिल्म बनाना चाहते थे, लेकिन उनका यह ख्वाब हकीकत में नहीं बदल पाया। अपने कमाल से दर्शकों को बाँध देने वालर यह अजीम शख्सियत 11 फरवरी 1993 को इस फानी दुनिया को अलविदा कह गई।

कमाल अमरोही ने तीन शादियाँ कीं। उनकी पहली बीवी का नाम बानो था, जो नर्गिस की माँ जद्दन बाई की नौकरानी थी। बानो की अस्थमा से मौत होने के बाद उन्होंने महमूदी से निकाह किया। कमाल अमरोही ने तीसरी शादी अभिनेत्री मीना कुमारी से की, जो उनसे उम्र में लगभग पंद्रह साल छोटी थीं। दोनों की मुलाकात एक फिल्म के सेट पर हुई थी और उनके बीच प्यार हो गया।

1952 में दोनों ने विवाह कर लिया लेकिन यह संबंध ज्यादा दिन तक नहीं चल पाया और उनका अलगाव हो गया। वास्तव में मीना कुमारी, कमाल अमरोही की प्रतिभा और कविताओं की कायल होकर उनके प्रेम में पडी थीं, लेकिन जैसे-जैसे मीना कुमारी आत्मनिर्भर होती चली गईं, कमाल का सम्मोहन टूटने लगा। उनके बीच तकरार शुरू हो गई और तनाव बढ़ने के साथ दूरियां भी बढने लगीं और बात तलाक तक पहुँच गई।

हालाँकि कमाल अमरोही, मीना कुमारी को तलाक देकर काफी पछताए और उन्होंने अपने सचिव बाकर के साथ मीना कुमारी का छिपे तौर पर निकाह करवा कर उनसे दोबारा निकाह करने का इंतजाम किया था। यही एक रास्ता था कि पहले कोई व्यक्ति मीना कुमारी से निकाह करने के बाद उन्हें तलाक दे दे तभी दोनों का दोबारा निकाह हो सकता था, लेकिन इसी दौरान धर्मेन्द्र, मीना कुमारी के जीवन में आ गए और पाकीजा में मीना कुमारी ने नायक की भूमिका के लिए की सिफारिश कर दी।
कमाल अमरोही भांप गए कि मीना कुमारी, धर्मेन्द्र में ज्यादा ही दिलचस्पी लेने लगी हैं। उन्होंने पाकीजा के मुहूर्त के बाद धर्मेन्द्र के स्थान पर राजकुमार को नायक की भूमिका दे दी। कहा जाता है कि इसके बाद उनके बीच जमकर झगड़ा हुआ और गुस्से में कमाल अमरोही ने मीनाकुमारी को जोरदार तमाचा रसीद कर दिया। उसी दौरान एक निर्माता अनजाने में वहाँ पहुँचा तो मीना कुमारी ने कमाल अमरोही से चिल्लाकर कहा ‘मुझे छूने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई? तुम तो कानूनी रूप से मेरे शौहर भी नहीं हो।‘ वास्तव में मीना कुमारी की बात सही थी क्योंकि बाकर ने तब तक उन्हें तलाक नहीं दिया था।
हालांकि मीना कुमारी के प्रति कमाल अमरोही का प्रेम शायद आखिर तक बरकरार रहा। तभी तो उन्हें मौत के बाद एक ईरानी कब्रिस्तान में मीना कुमारी की कब्र के बगल में दफनाया गया।(वार्ता)



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