देव आनन्द : हर फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया...

समय ताम्रकर|
भारतीय सिनेमा में तीन अभिनेता अपने आप में एक्टिंग के स्कूल हो गए हैं। दिलीपकुमार/राजकपूर और देव आनन्द। इनमें से सिर्फ दिलीपकुमार हमारे बीच मौजूद हैं। राज साहब और देव आनंद भले ही विदा हो गए हों, लेकिन उनकी परछाइयाँ हमारे इर्द-गिर्द मौजूद हैं। इन तीनों अभिनेताओं ने अपनी प्रतिभा तथा लगन के आधार पर अभिनय के नए कीर्तिमान रचे और आने वाली पीढ़ियों को अभिनय का ककहरा सिखाया। उसे हम शाहरुख खान/अमिताभ बच्चन जैसे कलाकारों में महसूस कर सकते हैं। देव साहब का फिल्म कॅरियर छह दशक से अधिक लंबा रहा। इतना कालखंड एक इतिहास बनाने के लिए काफी है। आइए, हम देव साहब के जीवन के कुछ अनछुए दिलचस्प पहलुओं को जानें-
आशावादी सिनेमा
के सिनेमा का सबसे सुखद पहलू यह है कि उनकी फिल्में मनोरंजन और सिर्फ मनोरंजन करती हैं। उनमें गीत हैं, संगीत है, जीवन का उल्लास है और एक आशावादी दृष्टिकोण। उन्होंने अपनी बॉडी लैंग्वेज/रहन-सहन/चाल-ढाल/पोशाक और हावभाव के जरिये आजाद भारत के नौजवानों को स्मार्ट रहना सिखाया। वे हमेशा युवा वर्ग खासकर युवतियों से सदैव घिरे रहे, इसलिए उन्हें 'सदाबहार' भी कहा जाता है। उन्होंने अपनी फिल्मों में कई नई नवेली नायिकाओं को मौका दिया और बॉलीवुड में स्थापित किया।
जो भी प्यार से मिला
देव आनन्द ने फैशन के अनेक नए प्रतिमान कायम किए। वैसे वे धोती-कुरता पहनकर प्रभात फिल्म कंपनी की फिल्म ‘हम एक हैं’ से परदे पर प्रकट हुए थे, लेकिन जल्दी ही उन्होंने विलायती तानाबाना धारण कर लिया। सिर पर कई आकार-प्रकार के हेट। गले में स्कार्फ। बालों में गुब्बारे। शर्ट की सबसे ऊपरी बटन हमेशा बंद। हाथ में हंटर/कंधे झुकाकर और लंबे हाथों द्वारा खुले आसमान के नीचे हरी-भरी घाटियों तथा सड़कों पर अपनी मचलती नायिका के पीछे-पीछे गीत गाते देव आनन्द युवा वर्ग को लुभाते रहे। हम हैं राही प्यार के, हम से कुछ न बोलिए। जो भी प्यार से मिला हम उसी के हो लिए। या फिर आँचल में क्या जी, रुपहला बादल। बादल में क्या जी, अजब-सी हलचल। जैसे मदमस्त करने वाले गीतों के बीच देव साहब की चुहलबाजी दर्शकों के आकर्षण का केंद्र रही।
हर फिक्र को धुएँ में उड़ाते चले गए
देव आनन्द के सदाबहार रहने और अंतिम समय तक सक्रिय रहने के अनेक राज हैं। मसलन उन्होंने सिगरेट उतनी ही पी, जितनी अभिनय के लिए जरूरी थी। शराब को दवा की तरह पिया। सिर्फ एक जाम और वह भी पार्टियों में मेहमानों की शान रखने के लिए। देव साहब दादा मुनि यानी अशोक कुमार के शिष्य रहे हैं, इसलिए स्वास्थ्य के प्रति सदैव सजग रहे। उन्होंने फिल्मों से जो पैसा कमाया, उसे फिल्मों में ही लगाया। अपने बैनर नवकेतन के तले अपने बड़े भाई चेतन आनन्द के निर्देशन में उन्होंने यादगार फिल्मों का निर्माण किया। जब चेतन ने अपना प्रोडक्शन हाउस अलग कायम किया तो छोटे भाई विजय आनन्द को साथ लेकर ‘तेरे घर के सामने’ तथा ‘गाइड’ जैसी कालजयी फिल्में दर्शकों को उपहार में दी। आर.के. नारायण के उपन्यास पर बनी ‘गाइड’ ने अपने समय में देश में एक नई बहस को जन्म दिया था। आज फिर जीने की तमन्ना है, आज फिर मरने का इरादा है।
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