प्रिया राजवंश : चेतन आनंद की हीर

प्रिया राजवंश
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प्रिया का जन्म शिमला में हुआ था। उसका बचपन का नाम वीरा था। उसके पिता सुंदरसिंह वन विभाग के कंजरवेटर के पद पर सेवारत थे। अपनी स्कूली तथा कॉलेज की शिक्षा प्रिया ने शिमला में पूरी की। पढ़ाई के दौरान कई अँग्रेजी नाटकों में हिस्सा लिया। वे बचपन से बहुत खूबसूरत थीं। तीखे नाक-नक्श। ऊँचा कद। लम्बे बाल। उसे देखते ही हॉलीवुड तारिका ग्रेटा गारबो की याद ताजा हो जाया करती थीं। संस्कार उसमें इतनी अच्छी तरह समाए हुए थे कि जिंदगी भर वे मितभाषी-मृदुभाषी और सभ्यता का आचरण करती रही।

जब उनके पिता संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से ब्रिटेन भेजे गए, तो लंदन की प्रतिष्ठित संस्था रॉयल अकादमी ऑफ ड्रामेटिक आर्ट में प्रिया को प्रवेश दिलाया गया। परफारमिंग आर्ट की यही शिक्षा-दीक्षा उन्हें फिल्मों में खींच लाई।

प्रिया ने अपनी ओर से फिल्मों में आने की कोई कोशिश नहीं की थी। जब वे बाइस साल की आकर्षक और खूबसूरत लड़की थी, तब लंदन के एक फोटोग्राफर ने उसकी तस्वीर उतारी। वे तस्वीर किसी तरह भारत आ गई। चेतन आनंद ने अपने एक दोस्त के घर उस तस्वीर को देखा, तो देखते ही रह गए।

उन दिनों चेतन को अपनी नई फिल्म के लिए नए चेहरे की तलाश थी। 20 अक्टोबर 1962 को चीन ने भारत पर हमला कर दिया था। भारतीय सेना को भारी नुकसान के साथ पीछे हटना पड़ा। इस थीम पर चेतन आनंद फिल्म बनाना चाहते थे। उन्होंने फौरन प्रिया को नायिका के रूप में चुन लिया।

सपना बना हकीकत
Priya Rajvansh
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नाटकों में काम करने वाली प्रिया ने कभी तारिका बनने का सोचा होगा। सपना खुद हकीकत में बदलने उनके पास चलकर आ गया। फिल्म हकीकत (1964) हिन्दी सिनेमा की बहु-प्रचारित पहली युद्ध फिल्म है। इस फिल्म निर्माण के दौरान प्रिया ने चेतन की हर स्तर पर मदद की। संवाद लेखन, पटकथा लेखन, निर्देशन, अभिनय और सम्पादन में उनकी दखल बनी रही।

चेतन आनंद ने उन दिनों अपनी पत्नी उमा से तलाक लिया था। अकेले हम, अकेले तुम स्टाइल में दोनों मिले और जिंदगी भर साथ रहने का मन बना लिया। कभी शादी का विचार आया नहीं क्योंकि जिंदगी की गाड़ी आखिरी वक्त तक सरपट दौड़ती रही। प्रिया उम्र में चेतन से बाइस साल छोटी थी, लेकिन उम्र का यह अंतर भी उनके कभी आड़े नहीं आया।

चेतन की हीर : रांझा की नहीं
हकीकत के बाद प्रिया की दूसरी फिल्म 1970 में हीर-रांझा आई। इस फिल्म में संवाद गद्य के बजाय पद्य में बोले गए थे। इस लिरिकल फिल्म के गीत-संवाद कैफी आजमी ने लिखे थे और उस समय के सुपरस्टार हैसियत वाले राजकुमार इसके नायक थे। फिल्म को भारी सफलता मिली। चेतन ने यह फिल्म प्रिया को फोकस कर बनाई थी। उनकी प्रत्येक फिल्म की नायिका हमेशा प्रिया ही बनी रही। इस तरह वह चेतन की हीर साबित हुई।

ऐसा नहीं हुआ कि प्रिया को बाहरी निर्माताओं के ऑफर नही मिले। उन्होंने चेतन के अलावा किसी और के निर्देशन में काम करना उचित नहीं समझा। प्रिया की फिल्मोग्राफी बहुत छोटी है- हकीकत और हीर रांझा के अलावा हिन्दुस्तान की कसम (1973), हँसते जख्म (1973), साहेब बहादुर (1977), कुदरत (1981) और हाथों की लकीरें (1986)।

प्रिया का फिल्मी सफर 1964 में शुरू हुआ और बाइस साल बाद 1986 में उस पर पूर्ण विराम लग गया। अपने सौंदर्य और व्यवहार की बदौलत प्रिया फिल्मी दुनिया में लोकप्रिय बनी रही। पहले वह और चेतन साथ-साथ एक ही घर में रहते थे। बाद में उन्होंने अपना बंगला अलग बनवा लिया। दिन में दो बार वह चेतन से मिलने जाया करती थी। दोपहर में लंच और रात में ड्रिंक्स के साथ डिनर।

दोनों पति-पत्नी की तरह रहते, झगड़ते, मनमुटाव होता, फिर मेल-मिलाप का सिलसिला इतने स्वाभाविक ढंग से चला कि उनकी नजदीकी लोगों, दोस्तों, रिश्तेदारों को यह कभी महसूस नहीं हुआ कि दोनों ने शादी नहीं की हैं।

बंगला बना मौत का सबब
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सन 1997 में चेतन आनंद नहीं रहे। प्रिया अकेली रह गईं। बड़ा बंगला प्रॉपर्टी के बढ़ते दामों की वजह से बेशकीमती हो गया। चेतन आनंद की पहली पत्नी के बेटे केतन आनंद, विवेक आनंद, नौकर माला एवं अशोक ने एक दिन लालच में आकर प्रिया की बर्बरतापूर्वक 27 मार्च 2000 को हत्या कर दी। चारों को आजीवन कारावास की सजा मिली। इस तरह एक रोशन सितारे का अवसान हो गया।

कुछ वर्ष बाद उमा और केतन आनंद की एक किताब चेतन आनंद के जीवन पर आई थी। उसमें तमाम अध्याय शामिल हैं, लेकिन जिंदगी भर पहले पेज से आखिरी पेज तक जुड़ी रही प्रिया का जिक्र उसमें नहीं के बराबर है। का यह अमानवीय चेहरा कभी भी किसी का प्रिय नहीं हो सकता।
समय ताम्रकर|
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और को यदि आप नहीं जानते हों तो देवआनंद को तो जरूर पहचानते होंगे। चेतन आनंद इस सदाबहार अभिनेता के बड़े भाई थे। देवआनंद, चेतन आनंद की बदौलत ही फिल्म इंडस्ट्री में आ सके। प्रिया राजवंश फिल्म डायरेक्टर चेतन आनंद की सहयात्री थीं। दोनों जिंदगी भर साथ-साथ रहे। शादी नहीं की और उसकी जरूरत भी नहीं समझी। बाहरी दुनिया के लोग उन्हें पति-पत्नी मानते रहे जैसे वी.शांतराम और संध्या के बारे में प्रचलित है। यानी इन लोगों ने लिव-इन-रिलेशनशिप के जरिये साथ निभाया।
शिमला से मुंबई वाया लंदन

पेश है प्रिया राजवंश पर फिल्माया गया गीत ‘मिलो ना तुम तो’ फिल्म हीर रांझा से।




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